STORYMIRROR

Suraj Singh

Romance

3  

Suraj Singh

Romance

किनारे का पत्थर

किनारे का पत्थर

4 mins
341

माना कि शाम उस किनारे पर बड़ी ही मनोहारी होती है।पर उस सुबह वहां की हवा में कुछ अलग ही बात थी । वो किनारे पर बनी हुई कंक्रीट की सीमा जिस पर सूर्य की किरणे बड़ी बड़ी इमारतों के बीच में होकर आती हो,मानो जैसे किसी आम के बाग में धूप, पत्तो के बीच से आती हो। हालंकि इस प्रकाश में वो शीतलता तो नहीं थी ,फिर भी सुबह ७:३० की धूप और इमारतों की मौजूदगी मौसम को ठंडक प्रदान कर रही थी ।

शायद ...शायद मौसम उस समय का भी हर दिन की तरह साधारण ही था ।शायद वह धूप भी उतनी ही तेज थी जितनी रोज होती थी। पर उसके इस अद्भुत सौन्दर्य का कारण किसी शख्स की मौजूदगी थी । वो जो मुस्कुराती तो कलियां शर्मा जाती ,वो जो एक नजर उठाती तो प्रकाश बिखर जाता ,जिसकी खुशबू किसी कस्तूरी से कम न थी ।माना कि कोई इतना खूबसूरत भी नहीं हो सकता, पर मेरी नज़र तो हमेशा उसे इसी तरह देखती थी।

आज सुबह ही हम दोनों साथ समुन्द्र किनारे घूमने आए थे या यूं कहा हा सकता है, मैं आज अपने दिल की बात करने यहां आया था ।यह बताना चाहता उसे की वो कितनी जरूरी है मेरे जिंदगी में ,किस तरह सिर्फ उसकी जगह है मेरे दिल में,बस एक उसके पाने से मै कितना संतुष्ट हो जाऊंगा ,एक उसकी मुस्कान मेरे हर दुख का पूरक है ,उसकी आंखें किस तरह मेरी तीरगी को खत्म कर देती है ।

आखिर समंदर की लहरों को सांझा करके हम दोनों उस किनारे पर बैठे। अब मै उससे बात करने की कोशिश करने लगा, जैसे कोई बालक अपने घर आए अथितियों के आगे पीछे घूमता है, ताकि उनके लिए लायी गयी मिठाइयां उसे मिल सके । ये सच बात है कि वह जानती थी मेरे वहां उसके साथ बैठने कारण क्या है? आज भी मैं सोचता हूं जब वो जानती थी मेरे मन की बात फिर भी वह वहां मुझसे मिलने क्यों आती।

मैने कहा ," हेल्लो ,क्या तुम जानती हो हम यहां क्यों आए है ?"

 उसने जवाब दिया " हां,आप कुछ कहने वाले थे "

"बस यही कि मैं तुम्हे बहुत पसंद करता हूं "हर बार की तरह मैंने बाते सजाने की जगह फेक कर रख दी।

" वह देखो वो पत्थर कैसे पानी में डूबने वाला है ।"

" यह मेरे प्रश्न का जवाब नहीं है" मैंने उदास होकर कहा।

" मै नही साथ दे सकती हमेशा के लिए आपका। "

" क्यों? "

" आप जानते हो शायद क्यों। "

" नहीं मै नही जानता, आप बताओ... "

सुबह का समय था और समंदर का पानी धीरे धीरे चढ़ रहा था, और वह पत्थर जो हमारे सामने था वो अपने अस्तित्व से जूझ रहा था।

" आप उस पत्थर को क्यों नहीं देखते, कैसे धीरे धीरे डूबता चला जाता है। "

इस समय मुझे यह पत्थर वाली बात बड़ी असहज महसूस हुई। कुछ सोच कर मैंने कहा

" ठीक मेरी उम्मीद ही की तरह... "

" हाँ " हंसकर उसने कहा।

हालांकि मुझे पता नहीं यह बात उसके मन मे भी थी या नहीं पर आज उसकी बात मे दर्शन का एक स्वरूप दिखाई दिया।

" उम्मीद पर तो लोग जिंदा है। "मैंने फिल्मो से कुछ उधार ली हुई पंक्तिया सुना दी।

जैसे जैसे दिन चढ़ता गया पानी के नीचे वह पत्थर डूब सा गया।

यह देख कर वह बोली," यही होना है, अंत मे डूब जाना है सारी अभिलाषाओं को। "

इस तरह के तर्क का कोई जवाब मेरे पास ना था। आखिर मैंने अपनी हार स्वीकार कर ली। हालांकि मन अभी भी कहता था," चाहे तो कुछ भी हो सकता है।"परंतु अभी मै किसी भी तर्क का यथोचित उत्तर नहीं दे सकता था।जब सूर्य प्रकाश हमारे सिरो को छूता हुआ सागर मे परछाइयाँ बनाने लगा तब हम दोनों उठ कर चल दिए।

अब भी मेरे मन मे उस पत्थर ने जगह बना रखी थी। क्या उसे बचाया नहीं जा सकता। क्या पत्थर डूब जाना नियति है।

आज मै यहाँ बैठा हूँ तुमसे कई मीलों दूर और कह सकता हूं, सांझ होगी वापस वही पत्थर ऊपर आ जाएगा। पुनः एक उम्मीद जागेगी, बस जरूरत है तो बस एक साथ की जो तुम दे सकती थी।

मै आज भी उस किनारे का पत्थर बना हुआ हूँ। रोज डूबता हूँ, रोज उभरता हूँ, तेरी तलाश मे, तेरी उम्मीद में, आज भी मै यहाँ तेरा इंतज़ार करता हूँ।


विषय का मूल्यांकन करें
लॉग इन

Similar hindi story from Romance