ख्वाबों की बारात
ख्वाबों की बारात
बात उस समय की है जब मै कॉलेज मे अपनी थर्ड ईयर की पढ़ाई कर रहा था। कॉलेज की ओर से एक ट्रिप रखी गयी थी जिसमे हमे कई हेरिटेज जगहों पे घुमने का मौका मिला था। हमारे साथ चार पाँच कॉलेज के बच्चे और थे। हर कॉलेज से पंद्रह बच्चे उस ट्रिप मे थे। सभी कॉलेज हमारे राज्य के नामी थे।
हमसब ने एक साथ सफ़र शुरु किया। हमलोगो की बस अभी कुछ दूर बढ़ी ही थी की मैनें उसे देखा। अब तो पूरे छह साल बीत चुके थे जब मैने उसे आखिरी बार देखा था। हाँ वो रोशनी ही तो थी। वही आंखें वही मुस्कान वहीं नाक नक्श। सबकुछ बिलकुल वही तो था जैसा मैने छह साल पहले देखा था। मगर वो मेरे कॉलेज मे तो नही थी। फिर किस कॉलेज से? हमने खुद से पुछा ये जानते हुए भी की हमे इसका जवाब नहीं मालुम था।
आज अचानक से उसे देख कर दिल फिर से बेचैन हो गया। वो कसक फिर से जग गयी जिसे कुछ साल पहले मैने गुमराह करके दबाने की नाकाम कोशिश की थी। उसकी एक झलक ने मेरी सारी कोशिशो को आन्धियों की तरह उडा दिया। मै एकटक उसे देखता रह गया। मुझे नहीं पता उसने उस पल मुझे देखा या नहीं पर उसकी उस झलक ने मुझे सालो पिछे ले जाकर पटक दिया।
जब मै चौथी क्लास मे था तब रोशनी हमारे स्कुल मे आयी थी। भोली, सुन्दर, तेज़ सब गुण थे उसमे। भला कोई क्यूँ ना आकर्षित होगा। हम तो यू ही कुर्बान हो चुके थे। मगर हम ठहरे झिझक वाले आदमी बोलेंगे नहीं। कभी अपनी बात कह नहीं पाये आजतक।
पढ़ने मे तो हम भी कमजोर नहीं थे। आये दिन किसी बात पे मोहतरमा से नोकझोंक हो जाती थी की तू सही या में । हम तो बहस मे भी बोल नहीं पाते थे जनाब। मगर इन झगड़ों मे ही कही इकरार छिपा था ये हम दोनो समझते थे। मेरे दिल ने कई बार कहा उठ शेखर अब बोल भी दे मगर ये दिमाग हिम्मत ही नहीं करता था। वैसे भी उसे और क्लास की दो तीन लड़कियो को छोड़कर मै दूसरी लड़कियों का नम तक नही जानते था। दूसरे सेक्सन की तो बात दूर थी।
फिर वही हुआ जिसका डर था। आठवीं क्लास मे उसने स्कूल छोड़ दिया। हम दिल में मलाल लेकर रह गये की काश, काश हिम्मत कर के बोल दिया होता। मगर दिमाग दिलासा देने मे लगा हुआ था की वैसे भी उसने ना ही बोला होता। कई बार यही खयाल घूम घूम कर मन मे आते रहता है। और मै बेबस सा उससे लड़ने की नाकाम कोशिश करता रहता हूँ।
मै यूँ ही उसके यादों मे खोया रहता की अचानक ड्राईवर ने जोरदार ब्रेक लगाया और मै खयालो की दुनियाँ से बाहर खीच लाया गया। मेरा दिल फिर से चित्कारे मारने लगा शेखर आज तो तुझे बोलना ही होगा। मगर वही दिमाग उल्टी गंगा बहाने लगा,मान लो उसे किसी से प्यार हो गया हो, उसकी शादी ठीक हो गयी हो, वो कभी तुम्हे पसंद ही ना करती हो। और गर यहाँ सबके सामने उसने मना किया तो क्या इज़्जत रह जायेगी।
मन इन्ही सब विचारों मे था की कब नींद लग गयी पता हाय नहीं चला। निंद खुली तो हम सब एक होटल पे रुकने वाले थे। रात हो चुकी थी और सब को भूख लग गयी थी। हमने खाना खाया और फिर सब सो गये।
जब हमारी बस अपने पहले पड़ाव पहुंची तो मेरे एक दोस्त ने मुझे जगाया।मै आँख मलता हुआ बस के दरवाजे पर पहुंचा तो देखा की वो सामने ही खड़ी है। इस बार मै दावे से कह सकता हू, उसने मुझे देख लिया था। मेरा दिल जोरो से धड़क रहा था। मैने उसके आंखो मे उत्सुकता देखी। शायद वो भी हमे पहचान गयी थी और उसे लगा होगा की हम उससे बात करेंगे। मगर हम और हमारा ये दिमाग। हम नीचे उतरे और दुसरी ओर चल दिये।
इस बार भी सोच और संभावनाओ के बारे मे सोच सोच कर हमने एक मौका गवां दिया। मै चल रहा था और सोच रहा था की इस ट्रिप मे तो उसे अपनी दिल की बात बता ही देनी हैं। हमसब आगरा के ताजमहल मे थे और अपने दिल की चाहत को बयाँ करने के लिए इससे अच्छी जगह नही हो सकती। मगर हम करे भी तो क्या उसकी सहेलियाँ एक पल को भी उसका साथ नहीं छोड़ रही थी। हमने उसके आस पास घुमना शुरु किया। शायद वो समझ गयी और अपनी सहेलियों को छोड़ कर दुसरी तरफ आ गयी। हम भी उसकी ओर गये मगर बात शुरु करे कैसे?
फिर मैने हिम्मत की और पूछा,"पहचाना?" उसने कहाँ,"पहचानूंगी क्यूँ नहीं इतने साल साथ में पढ़ाई की है हमने।" में हल्के से मुस्कुरा दिया। "और बताओ क्या चल रहा है आजकल?",उसने पूछा । "बस पढ़ाई ही चल रही है।",मैने कहा। इससे पहले की हम कुछ पूछते उसने ही पुछ लिया,"कोई गर्लफ्रेंड है?"। नहीं।
"क्यूँ झूठ बोलते हो शेखर कोई तो होगी ही।"उसने कहा। "अरे सच में नहीं है कोई, तुम बताओ कोई बॉयफ्रेंड है क्या?"मैने कहा।
"नहीं शेखर, तुम तो जानते हो इन सब चीजों ने मुझे कोई दिलचस्पी नहीं है।"वो बोली।
मिली तो इतने सालो बाद थी पर फिर भी ऐसे दिखा रही थी जैसे इतने दिनो में कुछ हुआ ही ना हो। और हमारा दिल उसने तो सपने सजाना शुरु भी कर दिया। हमें लगा उसके दिल में कहीं हमारे लिए जगह आज भी है।
फिर वो अपने सहेलियों के पास चली गयी और हम अपने दोस्तो के पास मगर हमारा दिल लगातार सपने देख रहा था और दिमाग ये सोच रहा था की अपनी बात कहे कैसे।
हमने बहुत हिम्मत की और एक स्टाल से एक गुलाब का फूल खरीद लाये। हमने फिर उसके आगे पीछे चक्कर लगाना शुरु किया और मौका देखते ही उसे एक इशारा भी किया। आज ना जाने कहाँ से इतनी हिम्मत आ गयी मुझमे।
आखिर वो आयी। मेरा दिल तो इतनी जोरो से धड़क रहा था की पुछो मत। मैने धीरे से कहा,"तुमसे कुछ बात करनी है जरा मेरे साथ आओगी।" "हाँ",उसने कहा।
हम दोंनो बगीचे मे चले गये। मैने उसकी ओर देखा और बोला,"रोशनी मै तुमसे बहुत प्यार करता हूँ। आज से नही तभी से जब तुम्हे पहली बार देखा था। जब पहली बार तुम्हारी आवाज़ सुनी थी। जब पहली बार तुम्हारी भोली मुस्कान को देखा था। तभी से हा तभी से मै तुम्हे प्यार करता हू।" वो एकटक मुझे देखे जा रही थी। शायद उसने ये सोचा भी ना होगा या फिर शायद सोचा भी हो।
में घुटनो पर बैठ गया और गुलाब उसकी ओर बढ़ाते हुए बोला,"शादी करोगी हमसे?" उसने गुलाब ले लिया और धीमे से मुस्कुराते हुए अपना सर हिला दिया।
