Mirza Hafiz Baig

Drama Romance


4.1  

Mirza Hafiz Baig

Drama Romance


ख्वाब, हक़ीक़त और अफ़साना

ख्वाब, हक़ीक़त और अफ़साना

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1.

ख्वाब

"तुम बहुत खूबसूरत हो।" किसने उसके कानों में कहा। दिल के तार झनझना उठे। दफ़अतन फूल खिल उठे। दरख्त झूम उठे। पत्ते मुस्कुराने लगे। परिंदे गाने लगे। सारा ने चौंक कर अपने आस पास देखा। कोई नहीं है। दूर दूर तक कोई नज़र नहीं आता। वह भागते हुए कभी इस पेड़ तक जाती है, कभी उस चट्टान तक। कभी झाड़ियों के पीछे झांकती है, तो कभी वादियों में। वह बेकरार हुई जाती है। वह उसे देखना चाहती है, बस एक नज़र, एक नज़र। बेकरारों की दवा एक नज़र...

लेकिन हर नज़र, बेकरार... लौट आती है नाकाम... बिछी जाती है, उसकी राह में। वह कहीं नज़र तो नहीं आता लेकिन, हर जगह वह मौजूद हो जैसे। सारा ने महसूस किया जैसे कोई मुस्कुराया है उसे यूं हैरान देखकर । वह बेशक नज़र नहीं आता लेकिन उसकी मुस्कान से फुलझडियां छूटती हुई, उसने महसूस की है।

तभी उसके कूल्हे पर किसी ने जैसे एक चपत जड़ दी। वह पीछे मुड़कर देखना चाहती है; लेकिन वह जैसे किसी जादू की गिरफ्त में आकर जम गई है। जिस्म जैसे पत्थर का होगया हो। क्या मैं किसी तिलिस्म में कैद हूं....

"उठो शहजादी साहिबा ! कॉलेज का वक़्त हो रहा है।" उफ्फ! यह तो अम्मी की आवाज़ है।

तो यह एक ख्वाब था।

वह आइने के सामने खड़ी हो, खुद को निहारती है।

सचमुच यह ख्वाब ही था वरना ये मुंह और मसूर की दाल? सच तो कहती है अम्मी, सूरत चुड़ैल की और मिजाज़ पारियों का !

उसे क्या हक है इस मामूली सी शक्ल आे सूरत के साथ इस किस्म के ख्वाब देखने का।

'बाप पर गई है, मरी। क्या हो जाता अगर मां की शक्ल आे सूरत ले आती?' अम्मी का तो जैसे ये तकिया कलाम बन चुका है।

2.

हकीक़त

कहते हैं, हक़ीक़त कड़वी होती है।

सच है। यह मज़ा ही खराब कर के रख देती है। तभी तो हक़ीक़त सारा को भी पसंद नहीं। उसे तो बस ख्वाब पसंद है। वह तो बचपन से ही ऐसी है, ख्वाबों के जहां में खोई रहने वाली। वह ख़्वाबों में जीती है, इसीलिए जीती है; वरना हक़ीक़त का ये जहर उसे कब का ख़तम कर देता। हां, बचपन के ख्वाब कुछ अलग तरह के होते थे। उनमें एक खूबसूत शहजादा हुआ करता जो घोड़े पर सवार होता। उसके पास एक खूबसूत महल होता, जहां वह सारा को ले जाता। उसे दादी अम्मी न कहती थीं, "मेरी पोती किसी शहजादी से कम नहीं, उसे ब्याहने तो कोई शहजादा ही आएगा। और शहजादे होते कैसे हैं?

लेकिन यह सब तो बचपन की बातें हैं। अब उसकी तरह उसके ख्वाब भी सयाने हो गए हैं। घोड़े की जगह शानदार कार ने लेली है और आलीशान महल की जगह बंगले ने। दादी अम्मी भी न रही। अब तो बस अम्मी की हुकूमत रह गई है, और अम्मी क्या जाने ख्वाब व्वाब। बिल्कुल बदजौक हैं। उन्हें तो बड़ा घमंड है न अपने हुस्न का। वैसे अब न हुस्न रहा न जवानी। हां, उन्हें देख कर यह ज़रूर लगता है कि अपने वक़्त में इमारत बुलन्द रही होगी। अब तो खंडहर बचे हुए हैं, इमारत नहीं रही...

"तैयार हो जा जल्दी, निक्की पहुंचती होगी। अपने बराबर बेचारी बच्ची का वक्त भी खराब करती है।" अम्मी ने सदा लगाई।

हुंह, निक्की का बड़ा ख्याल रहता है। और खुद अपनी बेटी तो दुनियां जहान से बदतर....

आप तो समझ ही गए होंगे.... निक्की यानि सारा की बेस्ट फ्रेंड। हमराह और हमराज। हमराह इस करके कि दोनों बरसों से स्कूल और अब कॉलेज साथ साथ आती जाती हैं।

सारा तकरीबन तैयार ही थी कि अम्मी ने आवाज़ लगाई, "अरे जल्दी कर, निक्की आ गई है। कितना वक्त लगती है यह लड़की आइने के सामने। पता नहीं अगर अल्लाह ज़रा रंग रूप दे देता तो क्या क़यामत ढाती फिरती।" अम्मी की जली कटी सुनती हुई वह नीचे पहुंची तो निक्की बार बार अपने नए कीमती मोबाईल की स्क्रीन आन कर करके वक्त देख रही थी।

सब नाटक है, सारा ने दिल में कहा, अभी रास्ते में कैंटीन चलने कहूंगी तो, वक़्त का ख्याल ही नहीं रहेगा मैडम को।

उसे देखते ही निक्की ने मोबाईल रखा और स्कूटी स्टार्ट की...

हक़ीक़त सिर्फ कड़वी ही नहीं होती, बाज वक़्त वह अजीब भी होती है। कभी कभी हसीन भी। इस बात का अहसास तो सारा को आज ही हुआ जब प्रिया ने पूछा, "हे ई, आजकल तू किसी पेंटर वगैरह के लिए मॉडलिंग तो नहीं कर रही?"

"वाह! किसका दिमाग़ खराब हुआ है, जो मुझे मॉडल बनाए।" वह बोली।

"अरे, आजकल नेहरू आर्ट गैलरी में हैदर की पेंटिंग्स की एग्जिबिशन लगी हुई है। वहां एक पेंटिंग तो बिल्कुल तेरी ही पेंटिंग लग रही थी। अरे, इतनी अच्छी तरह ..."

"चल न, तुझे और कोई नहीं मिला बनाने को?" सारा ने चिढ़ते हुए कहा। हद होती है किसी को चिढ़ाने की भी। उसे प्रिया के इस मज़ाक से बहुत बुरा लगा था।

"हे, मैं मज़ाक नहीं कर रही। मैं तो यह पूछ रही थी कि वो हैदर तेरे कोई रिश्तेदार तो नहीं। क्या पेंटिंग्स हैं यार! मैं तो फैन हो गई हूं उसकी।" प्रिया ने फिर कहा तो सारा के सब्र का बांध टूट गया।

"देख प्रिया, मज़ाक की भी हद होती है। मैं तुम लोगों जैसी भले नहीं हूं, लेकिन इतनी बदसूरत भी नहीं कि मेरी इतनी इंसल्ट करो।" दूसरी फ्रेंड्स ने भी सारा का साथ दिया। प्रिया को इस तरह इन्सल्ट नही करनी चाहिए बेचारी सारा की।

"सॉरी, लेकिन मैं कोई इंसल्ट नहीं कर रही। हो सकता है मुझे धोका हुआ हो। लेकिन सारा, तुझे पता है मैं तेरी इंसल्ट नहीं कर सकती। कम ऑन हम लोग अच्छे फ्रेंड्स हैं यार।" प्रिया ने कहा, "और यकीन नहीं तो एक बार खुद देख आओ।"

जितने मुंह उतनी बातें, सच है सारा जैसी आम शक्ल आे सूरत के साथ कोई किसी पेंटर की इंस्पिरेशन कैसे हो सकती है। हसने की बात तो है। प्रिया तो ....

"नहीं नहीं," निक्की ने कहा, "प्रिया ऐसा क्यों कहेगी? वो इस तरह की लड़की ही नहीं। और फिर इतनी अच्छी फ्रेंड है।"

"हां यार तू सच कह रही है। प्रिया इस सच ए गुड फ्रेंड एंड ए नाईस पर्सन।" सारा ने कबूल किया।

"तो, चलें?"

"कहां?"

"वहीं। नेहरू आर्ट गैलरी। दूध का दूध और पानी का पानी हो जाएगा।"

"ठीक है, हाथ कंगन को आरसी क्या और पढ़े लिखे को फारसी क्या?"

3.

अफसाना

"सच में, ये तो तू ही है।" निक्की एक्साइटमेंट से चीख उठी।

"जी नहीं, ये आप नहीं हैं।"

निक्की, सारा और प्रिया तीनों ने चौंक कर देखा। वह एक स्मार्ट, हैंडसम नौजवान था। पता नहीं कब वहां आकर खड़ा हो गया था। हैरत की बात तो ये है, कि वे लोग जितने ध्यान से तस्वीर को देख रही थीं, कुछ उतना ही ध्यान वह सारा पे लगाए था। कितना बदतमीज है। इसे लड़कियों से किस तरह पेश आना चाहिए, यह भी पता नहीं।

"आप से मतलब?" निक्की ने चिढ़कर कहा।

"जी मुझे लगा आप लोगों को तस्वीर के बारे में कुछ जानकारी चाहिए।"

"क्यों, क्या आप इस आर्ट के कोई एक्सपर्ट हैं?" इस बार प्रिया ने मोर्चा सम्हाल लिया।

"जी नहीं। बन्दे की इतनी औकात नहीं..."

"देन, गेट लॉस्ट।"

"जी, वैसे ज़रूरत पड़े तो याद कीजिएगा। मैं यहीं हूं, सामने...."

"वेरी गुड, नाऊ प्लीज़ लीव।"

वह चला गया। सारा ने राहत की सांस ली।

"अब तुझे क्या हुआ? ये तेरी ही तस्वीर है। वो झूठ बोल रहा था।" निक्की ने कहा।

"लेकिन ये कैसे हो सकता है? मैंने तो कभी...." सारा रुआंसी सी हो गई। लेकिन उसे एक अनजानी सी खुशी ने घेर रखा था। दरअसल कई तरह के जाने अनजाने अहसासात से वह दो चार थी। वह किसी तरह अपनी कैफियत बताना चाहती, लेकिन बता नहीं सकती। छुपाना चाहती और छुपा नहीं सकती।

"इसकी कीमत क्या होगी?" वह जैसे अपने आप से पूछ रही हो।

"क्या?" निक्की हैरानी से बोली, "खरीदेगी?"

"हे, इन पेंटिंग्स की कीमत तो लाखों में होती है।" प्रिया ने जोड़ा।

"नहीं, मैं तो ऐसे ही..." इससे ज़्यादा सारा से कहा गया।

"है, एक बात नोटिस की? सभी पेंटिंग्स में रेट टैग्स हैं, लेकिन इसपर नहीं है।" प्रिया बोली।

"इसलिए कि ख्वाबों पे रेट टैग्स नहीं लगते। ख़्वाबों को कोई खरीद नहीं सकता।" वहीं नौजवान था। बड़ा बेशरम है। लड़कियों ने दिल में कहा।

"आप? फिर...." प्रिया की बात अभी पूरी भी नहीं हुई के वह बीच में बोल पड़ा।

"जी माई सेल्फ हैदर..."

"ओ आे आे, don't tell me आप हैं।" निक्की घबराते हुए जैसे चीख ही पड़ी। प्रिया की तो बोलती ही बन्द हो गई।

"अपने किसकी इजाजत से मेरी तस्वीर बनाई है?" सारा ने नाराज़गी का दिखावा किया।

"जी, मैंने कहा न; ये तस्वीर आपकी नहीं है। ये तस्वीर तो एक ख्वाब की है, और आप तो माशाअल्लाह हकीकत हैं। फिर यह आपकी किस तरह हुई?" उसने कहा।

"बातें मत बनाइए। मै कोई ख्वाब नहीं हूं।" सारा ने कहा।

"जी, लेकिन आप तो मेरे ख्वाब की ताबीर है। वह ख्वाब जिसे मैं जाने कबसे देखता आ रहा हूं।"

"अब आपने अपने ख्वाब की ताबीर देख ली? अब इस तस्वीर को फौरन यहां से हटा दीजिए।"

"जी। वैसे भी अब इसे यहां लगाने की ज़रूरत नहीं रही।"

"क्या मतलब?"

"जी, अपने ख्वाब की ताबीर ढूंढने के लिए इसे है नुमाइश में रखता था, वरना यह तस्वीर कोई नुमाइश की चीज नहीं। अब ये सिर्फ आपकी है, आपके लिए। आप अपना नाम पता बता दें, इसे आपके घर पहुंचा दूंगा।"

"इसकी ज़रूरत नहीं।"

"Sorry?"

"जी, आपको इसकी ज़रूरत नहीं। आप अपने ख्वाब की ताबीर पा सकते हैं, तो मेरा पता भी पा सकते हैं।"

"आपको यकीन है?"

"क्यों, आपको नहीं है?"

"आम तौर पर ऐसा अफसानों में होता है।"

"तो, हकीकत को अफसाना बनते देर नहीं लगती।"

"जी हां, जब ख्वाब हकीकत बन सकते है, तो हकीकत अफसाना क्यों नहीं बन सकती।"

"ठीक है, खुदा हाफ़िज़।" कहते हुए सारा तेज कदमों से बाहर की तरफ लपकी। उसकी दोनो फ्रेंड्स तकरीबन भागती हुई सी उसके पीछे लपकी।

अचानक सारा को लगा जैसे उसके कदमों पर मनो बोझ पड़ा हो। उसका वजूद थरथराने लगा है। यही है यही है वो। उसका तेजी से धड़कता दिल कह रहा है।

सुनिए उसे हैदर की आवाज़ बिल्कुल अपने कानो के पास सुनाई दी। उसने पीछे मुड़कर देखा, हैदर उसके बिल्कुल पीछे खड़ा है।

"आप बहुत खूबसूरत हैं।" उसने कहा और सारा को हैरान देखकर मुस्कुरा उठा। सारा ने देखा उसकी मुस्कान से फुलझडियां छूट रही हैं।


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