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Varsha abhishek Jain

Drama

3  

Varsha abhishek Jain

Drama

खर्च भी बचत भी

खर्च भी बचत भी

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"रोहित तुम अब मुझे ग़लत समझ रहे हो। मैं सिर्फ तुम्हें इतना कह रही हूँ कि भविष्य में क्या होने वाला है किसी को कुछ नहीं पता, कब कोई मुसीबत आ जाए उसके लिए तैयारी तो अभी से करनी होगी।"

"प्रीति सीधे सीधे कहो ना तुम्हें माँ को रुपये भेजने अच्छे नहीं लगते !"

"हाँ नहीं लगते, इसलिए नहीं कि वो माँ हैं तुम्हारी, इसलिए कि तुम फिजूल के पैसे बर्बाद कर रहे हो दिखावे के लिए। अब माँ बड़े भैया के घर रहती हैं, वो भी उनका घर है पर तुम्हें तो दिखावा करना है अपने भाई के सामने कि तुम माँ की ज़्यादा चिंता करते हो। बड़े भैया के घर पैसे भेजने की क्या जरूरत है ? तुम यहीं बुला लो ना माँ को ! बिट्टू को भी स्कूल डालना है, दो साल का हो गया है। आज कल स्कूल में लाखों तो डोनेशन देना पड़ता है। बचत करोगे तो अपने परिवार के ही काम आएगा। हर महीने दीदी बच्चों को गिफ्ट भेजते हो, हर चीज़ मोके पर ही अच्छी लगती है। राखी होली दिवाली पर दो या दीदी जब यहाँ आती है तो दो। ये हर महीने का तुमने क्या लगा रखा है ? फिर कुछ बोलती हूँ तो बुरी बीवी बुरी भाभी बन जाती हूँ कि बहन को देने से मना कर रही हूं ! फिर तुम्हारे दोस्त तुम्हें बढ़ा-चढ़ा कर तुम्हें बेवकूफ़ बना रहे हैं और तुम उन पर पैसे लुटाते हो अपनी बनावटी शान के लिए।"

"अब मैं किसे कितना भी दूँ ! तुम्हारे और बिट्टू को तो कोई कमी नहीं रखी, फिर तुम्हें क्या दिक्कत है ?" रोहित ने झुंझलाते हुए कहा।

"तुम तो ऐसे बोल रहे हो जैसे हर महीने मैं नए कपड़े लाती हूँ या हर साल तुम मुझे गहने बनावा कर देते हो ! शादी के बाद आज तक कहीं घूमने गए हैं या कभी मैंने कुछ मांगा है तुमसे ?"

"तो किसने मना किया है ? जाओ जितनी खरीदारी करनी है करो" बोल के रोहित ऑफिस चला गया। 

प्रीति ने सोचा कुछ तो करना ही पड़ेगा। आज तक मैंने इनसे कुछ मांगा ही नहीं इसलिए इन्हें भी लगता है कि मुझे कोई शौक ही नहीं। मैं ही हर बार ये कह कर मना कर देती हूँ इतने कपड़े पड़े हैं और क्या करूँ नए लाकर ! घर पर ही तो रहती हूँ। वही कपड़े बार बार पहन लेती हूँ सोच कर कि क्यूँ पैसे बरबाद करूँ ! पैसे तो वेसे भी बर्बाद हो ही रहे हैं। अब मैं भी अपने सारे शौक पूरे करुँगी, खुद पर भी थोड़ा ध्यान दूँगी। जब पैसे ही नहीं रहेंगे जिम्मेदारी बढ़ेगी तो अपने आप फिजूल खर्च बंद हो जाएगी।

"रोहित मुझे 15000 चाहिए, जिम शुरू कर रही हूं" रोहित ने खुशी से पैसे दे दिए।

दो दिन बाद फिर "रोहित 5000 देना, मुझे कुछ अपने लिए और बिट्टू के लिए कपड़े लेने हैं"।

रोहित मना भी नहीं कर सकता था क्योंकि उसने खुद ही कहा था।

इस तरह हर महीने बीस तीस हजार रुपये मांग लेती, कभी खिलौने कपड़े के लिए कभी कीट्टी के लिए। रोहित के पास भी अब कम पैसे बचते, वो अब सोच समझ कर खर्च करता, सब चीज़ों में कटौती करनी पड़ती।

एक रात अचानक फोन की घंटी बजी, रोहित ने फोन उठाया पता चला माँ को हार्ट अटैक आया है। डॉक्टर ने ऑपरेशन के लिए बोला है ओर भैया के पास अभी इतने पैसे नहीं हैं, उन्होने पैसे का इंतजाम करने को बोला है। रोहित सोचने लगा कहाँ से लाऊँ 5 लाख रुपये ? काश पहले से थोड़ी बचत की होती तो आज ये परेशानी नहीं होती।

"लो रोहित ये तीन लाख रुपये हैं" प्रीति ने रोहित को पैसे थामते हुए कहा।

"तुम्हारे पास कैसे ? मुझे तो लगता था कि तुम हर महीने शॉपिंग पार्लर में पैसे लगा रही हो ? ये तो तुम्हारे पैसे हैं तुम्हें तो माँ को पैसे देना अच्छा नहीं लगता था ना फिर क्यूँ ?"

"रोहित, आज फिर मुझे ग़लत समझा आपने। मुझे माँ को पैसे देने में कोई परेशानी नहीं, बस मैं चाहती हूं कि छोटी मोटी बचत की आदत तुम डालो कि ऐसे बुरे वक्त में काम आये। और मैं तुमसे खर्चे के लिए पैसे लेती थी और खर्च भी करती थी, लेकिन औरत हूँ पैसे खर्च करके भी बचा ही लेती हूँ।'


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