KAVY KUSUM SAHITYA

Inspirational


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काशी जाएँ कि काबा

काशी जाएँ कि काबा

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"रामू उठ भोर हो गया कब तक सोते रहोगे ,जो सोता है वो खोता है जो जागता है पाता है "रामू के कानो में ज्यो ही पिता केवल के शब्द सुनायी दिये गहरी निद्रा से जागा उसे ऐसे लगा वह एक नई ऊर्जा के साथ जिंदगी के एक नई सुबह कि शुरुआत पिता के आशीर्वाद से प्रारम्भ कर रहा है।रामू तुरंत दैनिक क्रिया से निबृत्त होकर अपने अध्ययन में जुट गया। यही प्रक्रिया उसके जीवन कि शैली थी प्रतिदिन पिता केवल उसे चार बजे ब्रह्म बेला में लगभग चार बजे उठाते और वह सात बजे तक अध्ययन करता और आठ बजे तक तैयार होकर उसे स्चूल जाना होता और पिता के केवल अपनी दिहाड़ी मजदूरी पर निकलते।दिन इसी तरह से बीतता पिता केवल जब भी खुद खाली होते रामू को पास बैठते और उसके बचपन के कोमल मन मस्तिष्क पर एक सशक्त सफल इंसान बनने के लिये उसे धार देते रहते।

 हमेशा उसे यह बताने से नहीं चूकते कि वो एक मजदूर हैं, उनके पिता ने उन्हें पढाने लिखाने कि बहुत कोशिश कि मगर उनका मन बचपन कि शरारतों में रमा रहा और पढाई लिखाई में मन नहीं लगा पाया और पिता के शिक्षा सपनों को चूर चूर कर दिया। आज उन्हें याद कर पछतावा होता है और कभी कभी पश्चाताप के आंसू भी बहने लगते हैं। बेटे रामू तेरे स्वर्गीय दादा जी अपने समय के आठवीं जमात पास थे और पूरे गावँ में वही आठवी जमात पास थे सारा गावँ उनके पास अपनी समस्याओं को लेकर सुझाव और निराकरण के लिए आता और संतुष्ट होकर जाता।उनका कहना था कि शिक्षा इंसान कि ताकत और जिंदगी के संग्रमों के लिये धारदार हथियार होती है अतः जो गलती मैंने कि अपने पुज्ज दादा जी के नसीहतों को मानकर बेटा रामू तुम ऐसी गलती मत दोहराना ताकि मेरी तरह पछतावा और जिंदगी में अपमान का प्रतिदिन घूंट पीना पड़े।

मुझे देखो मैंने अपने जीवन में अपने पिता कि नसीहतों को नज़र अंदाज़ किया जिसके कारण आज मुझे दुनिया का प्रत्येक आदमी नसीहत देता है ।जब मै काम पर जाता हूँ तो जिसकी मजदूरी करता हूँ उसका गुलाम बनकर रहना पड़ता है उसकी जलालत सहनी पड़ती है गालियां सुननी पड़ती है कभी कभी तो ऐसा लगता है कि हम इंसान न होकर जानवर हो गए है यही तुम्हें बताना चाहते है कि तुम्हे जलालत अपमान का घूंट पिने के लिये जिंदगी विवस न करे।

इंसान अपने मान अपमान के लिये खुद जिम्मेदार होता है खुद अपने जीवन के आदर्शो मूल्यों का निर्धारक होता है यह सिख मैंने मजदूर होकर उसकी समाज में स्तिथि और पीडा से अनुभव कि है मजदूर इंसान अवश्य होता है लेकिन उसके पास उसकी इज़्ज़त सिर्फ दो जून कि रोटी उसके जज्बात गुलामी कि निष्ठा और उसकी जिंदगी निरंतर जानवर कि तरह न थकने वाली जिंदगी और मौत बेरहम कभी कफ़न नसीब तो कभी बदनसीबी को मिटटी का ही कब्र कफ़न शमसान और अपने पीछे छोड़ जाता है न समाप्त होने वाला मजबूर जिंदगी के मजलूम मजदूरों का सिलसिला ।मई चाहता हूँ बेटे रामू इस सिलसिले को तोड़ कर तमाम मजदूरों और उनकी नस्लो को नसीहत दो।मासूम रामु के दिल दिमाग पर बापू केवल कि बात पथ्थर कि लकीर कि तरह बैठ चुकी थी कभी कभी रामू का कोमल मन बापू के जीवन कि कड़वी सच्चाई को समाज के तिरस्कार का नतीजा मानता लेकिन रामु कृत संकल्पित था कि वह अपने बापू के नसीहतों को अपने जीवन का आदर्श बनाकर प्रमाणित करेगा।रामू अपने पिता कि नसीहतों को अपने लिये जीवन का मूल मन्त्र और पिता को आदर्श मानकर प्राण पण से अपने कठिन लक्ष्य कि चुनौती के विजय पथ पर सहस हिम्मत और हौसलो से आगे बढ़ाता गया दसवी कि परीक्षा में अव्वल रहा जिसके बाद उसे वजीफा मिलने लगा पिता केवल पर बोझ कुछ कम हुआ फिर इंटरमीडिएट कि परीक्षा में अब्बल रहा और बी एस सी में विश्वविद्याल प्रयाग में दाखिला लिया पिता केवल को बेटे कि सफलता पर अहंकार कम भगवान् का आर्शीवाद और बेटे कि मेहनत पर विश्वाश था।रामू जब बी एस सी द्वितीय वर्ष कि परीक्षा का परिणाम आया तब बापू केवल ने कहा बेटा रामू अब हमे विश्वाश हो चूका है कि तुम मेरे पिता कि इच्छा जो मैं उनका पुत्र होने के नाते नहीं कर सका वह तुम पूरा करोगे। केवल उस दिन बहुत खुश था वह बेटे को ढेर सारा प्यार आशीर्वाद देकर घर से काम पर गया लेकिन कुदरत को तो और कुछ मंजूर था।

 दोपहर में खबर आई कि केवल जिस भवन निर्माण कार्य में मजदूरी कर रहा था वह भवन धारासाही हो गया और केवल उसके निचे दब दब गया है। खबर मिलते ही केवल के घर अफरा तफरी मच गयी ।रोते विलखते केवल कि पत्नी सुगना दो पुत्रिया रीमा नीमा वहाँ पहुँच गयी जहाँ केवल मजदूरी करता था वहाँ पहुचने पर दृश्य देखकर रीमा नीमा सुगना का लगभग आवाक अचेत रोती कुछ समझ में नहीं आ रहा था की क्या करे क्या न करे । चूंकि केवल लखनऊ में परिवार के साथ रहता था गाँव उसका बिहार के हज़ारी बाग़ में था गाँव में खेती बारी थी नहीं जीविकोपार्जन का भी मजदूरी ही थी। उसने सोचा बाहर जाकर कुछ अच्छा कमा सकेंगे मगर कुदरत को कुछ और ही मंजूर था ।रोती विलखति सुगना ने मलबा के पास खड़े एक व्यक्ति से कहा आरे तनि हमारे बाबू के कोइ खबर पंहुचा दो अपने बाप के देख लिहे और के बा इनकर। उस व्यक्ति ने पूछा कि तुम्हारे बाबू कहा रहते है उनसे बात करने का कोइ माध्यम सुगना ने सिर्फ इतना ही कहा इलहाबाद इंवर्सिटी में पढ़त हउअन इनकी जियत जिनगी के प्राण जिस व्यक्ति से सुकना अपने बाबू को बुलाने कि बात कर रही थी वह पुलिस विभाग में उपपुलिस अधीक्षक था पूछा नाम क्या है तुम्हारे बाबू का सुगना ने कहा रामू उस समय मोबाइल का ज़माना नहीं था अतः उपाधीक्षक सोमपाल सिंह ने हॉट लाइन से अलाहाबाद विश्वविद्याल के कुलपति महोदय के आवास पर पूरी जानकारी देते हुये रामू को तुरंत भेजने का अनुरोध किया । कुलपति ने कहा सोमपाल जी रामू मेरे विश्वविद्यालय का शौर्य सूर्य है यहाँ का प्रत्येक छात्र् प्रत्येक सुबह खुद को रामू जैसा होने का भगवान से प्रार्थना करता है। मई उसे अपनी कार से अबिलम्ब भेजने की व्यवस्था करता हूँ।कुलपति तोताद्री ने रामु को अपनी कार ड्रॉवर कार भेज कर बुलवाया और पांच हज़ार रूपये पास से दिये और कहा घबराओ नहीं तुम्हारे पिता केवल कि तवियत ख़राब है अतः तुम्हारा जाना आवश्यक है।रामू चार पांच घंटे में लखनऊ पंहुचा तो माँ बहनो कि दशा देखकर स्वयं अनियंत्रित होने लगा फिर खुद को संभालते हुये पोस्ट मार्टम हाउस से पिता केवल का शव प्राप्त कर अंतिम संस्कार किया।उसके बाद केवल उस ठीकेदार के पास गया जिसकी बिल्डिंग को बनाते समय उसकी पिता केवल कि मृत्यु हुयी थी ठीकेदार ने रामू को जलील करते हुये जान से मारने कि धमकी देते हुये कहा "मजदूर का बेटा है जा कहीं मजदूरी कर अपनी माँ बहनो का पेट पाल उस पर भी काम न चले तो अपनी जवान बहनो को धंधे पर बैठा देना, बडा आया साला हराम का हर्जाना माँगने।" रामू को लगा कि उलझना ठीक नहीं है अतः वह वहाँ से चला गया ।अब माँ बहनो का लखनऊ रहने का कोइ औचित्य नहीं था अतः बहन माँ को लेकर अलाहाबाद लेकर चला आया और गंगा नदी के किनारे झोपडी बनाकर उसमे माँ बहनो के साथ रहने लगा उसने यह बात किसी को नहीं बताई ।पहले उसका खर्च वजीफा और कुछ पिता केवल के सहयोग जो कभी कभार होता से काम चल जाता ।लेकिन अब उसके पास बहनो कि पढाई और माँ सहित भरण पोषण के साथ साथ अपने पढाई का खर्चे का सवाल था। रामू ने इसके लिये मेहनत पर भरोसा किया और सुबह आठ बजे से एक बजे तक विश्वविद्यालय में क्लास करता दो बजे से तीन बजे तक आराम करता तीन बजे से आठ बजे तक ठेले पर सब्जी बेचता और आठ बजे से बारह बजे रात तक शहर में छुपकर रिक्सा चलता फिर दो बजे रात से चार पांच बजे तक स्वाध्ययन करता सब्जी रिक्सा चलते खाली समय भी अध्ययन करता।इस तरह उसने अपने जीवन को मानव मशीन बना दिया था।बी एस सी में विश्वविद्यालय में प्रथम स्थान और एम एस सी गोल्ड मेडलिस्ट होकर विश्वविद्याल को गौरवान्वित किया।फिर रामू ने भारतीय प्रशासनिक सेवा में आवेदन किया और प्रथम प्रयास में ही चयनित हो गया सक्षताकार में उससे पूछा गया कि देश में मज़दूरों कि हालत सुधारने के क्या सार्थक पहल होने चाहिये रामू का जबाब था "मैं मजदूर स्वर्गीय केवल का बेटा हूँ मेरे पिता मजदूरी करते बिल्डिंग के नीचे दब कर मर गए। उन्हें मलवे के कबाड़ कि तरह कचरे कि ढेर में फेक दिया गया और मुझे लावारिस बनाकर सड़क पर जलील होने के लिये ।मैंने अपने पिता के सपनो कि हकीकत के लिये सड़को पर रिक्सा चलाया ठेले पर सब्जिया बेचीं और जलालत का जहर पिया। मैं मजदूर के खून पसीने की बूँद कतरा हूँ जो किसी करिश्मे के विश्वस में जीता है साक्षात्कार कमेटी हतप्रध रह गयी ।उसे प्रशिक्षण में जाने से माँ बहनो के लिये किराये का मकान लेकर रखा।प्रशिक्षण समाप्त होने पर उसकी नियुक्ति लखनऊ में ही ।

 केवल का हर सहयोगी मजदूर बड़े फक्र से अपने बेटो को रामू कि राह पर चलने कि नसीहत देता है जैसे केवल हर मजदूर कि आत्मा और रामू साहब उनकी संतान इंकलब के जिंदबाद है।।


 


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