काली माऊ
काली माऊ
सुगंधाको मायकेसे उसके भाईके नवजात बच्चीके नामकरणके अवसरपर बुलावा आया। वो मायके आई। उसीकी तरह दूसरे रिश्तेदारभी आये। नामकरण विधीके बाद बच्चीको बुआकी गोदमें दिया गया। उसे देखते ही सबके सामने सुगंधा अपने गौरवर्णीय होनेपर गुमान करते हुए बोल पडी " हमारे परिवारमें तो सबके सब गोरे-चिट्टे है ,फिर ये "काली माऊ" कहांसे आई ? मैं,मेरी माँ,मेरे ,दोनों भाई और तो और भाभी भी गौरवर्ण है। "
तब उसकी फुफेरी बडी बहन निरजाको इसतरह नन्हीसी कृष्णवर्णिय बच्चीको लेकर फिकरे कसना अच्छा नहीं लगा। ये तो अच्छा हुआ कि उसके भाई-भाभी उस वक्त वहाँ नहीं थे वरना न जाने उनको कितना बुरा लगता। एक तो वो दोनों वैसेभी उसबात को लेकर दुखी थे। ऐसा सबके सामने कहना भी अच्छा नहीं था। निरजासे रहा नहीं गया उसनेभी सुना ही दिया "तेरे पापाभी तो गौरवर्ण नहीं है, तो तुम पापाकोभी ऐसेही बोलोगी " सुनकर सुगंधा शर्मिंदा हो गई। कुछ देर बाद बिना किसीको कुछ कहे वो चुपचाप चली गई।
दिन बीते गये सालभी बीत गये वो नन्ही बच्ची समयके साथ बडी हो गई और शुभांगीने अपना ग्रॅजुएशन पुरा कर लिया। वो सुंदर तो थी पर सीर्फ रंगकी वजहसे मार खा चुकी थी। पर उसमें खुबीयाँ बहुत थी। उसमें सफल करियर बनानेके आवश्यक गुण थे और साथ-साथ नृत्यमें भी उसकी विशेष रुचि थी जिसमें वो निपूण थी। स्कूल,कॉलेजके वार्षिक उत्सवसे लेकर दफ्तरके वार्षिक उत्सवोंमेंभी उसके नृत्यकी प्रस्तूति हरवर्ष रहती।
पर सुगंधाको अपने और बच्चोंके रंगपर इतना घमंड था कि उसे दूसरी सारी अच्छाईयाँ नजरही नहीं आती। जब कि न उसमें और न उसके बच्चोमें ऐसा कुछभी नहीं था। उसको सीर्फ किसीकीभी कमियोंपर फिकरे कसनेके अलावा और कुछ नहीं आता।
सुगंधा जबभी किसीभी पारिवारिक समारोहमें मिलती तो शभांगीको अक्सर "कालीमाऊ" कहकरही बुलाती थी। पर उसके बच्चे इन बातोंपर ध्यान नहीं देते। वो बचपनसे उसके साथ खुब खेलते और जबभी मिलते हंसी खुशीसे मिलते। शुभांगीका सिलवर जुबली जनमदिन बडे धुमधामसे मनानेका प्लान उसके पापाने बनाया। ये उसकेलिए एक सरप्राईज था। जब शामको उसने घरमें कदम रखा तो चौंक गई। सजा-सजाया घर का हॉल, घरमें बहुत सारे मेहमान और परिवारके दूसरे सदस्यभी आये थे। जिसमें उसकी बुआ और फुफेरी बुआभी थी। वैसे निरजा और सुगंधा की आपसमें अच्छी बनती।पर उसकी कुछ बातें निरजाको पसंद नहीं थी फिरभी वो उसकी बातोंको नजरअंदाज कर देती थी। आज तो उसने हद ही कर दी। केक कटिंगके बाद निरजा और सुगंधा उसे तोहफा देने साथ साथ ही गये। शुभांगीको तोहफा देते समय वो नकली मुस्कुराहटके साथ बोल ही दी " हॅपी बर्थ डे टू काली माऊ" सुनकर निरजा,हैरान रह गई। उससे रहा नही गया। निनिरजा बोलही पडी ," अरे! सुगंधा जरा सोचकर तो बोल अब वो नन्ही दूधमुही बच्ची नहीं रही ,बडी हो गई है। सोच, उसे सब समझता है। अच्छा है सुमित और अमृता आज भी यहाँ नहीं है और उसदिन भी नहीं थे। जब उसका नामकरण था ,सोच वरना उनको कितना बुरा लगता। यह जानकर कि तू उनकी बेटीको अक्सर"काली माऊ" बोलती है,और बार-बार ऐसा बोलकर उसका मुड क्युँ खराब करती है ? " उसने निरजासे कहा- अरे मैं तो मजाक कर रही थी। देख उसे बुरा नहीं लगता पर तुझे क्युँ बुरा लगा ?" निरजा बोली "नहीं सुगंधा ,किसी पर ताना कसना अच्छी बात नहीं है। तुम तो इतनी पढीलीखी हो, किसीका दिल दुखाना अच्छी बात नहीं है।"
निरजाको अपनी तरफसे बोलते देख, शुभांगी मन ही मनमें खुश हुई पर , आँखोमें आँसू लिये ही मुस्कुराते हुए "जाने दो निरजा बुआ, मेरी बुआने मेरा नामकरण ऐसा कर दिया है तो मेरा यही नाम लेगी ना, आपभी बुरा मत मानो, मुझे तो अब यह सुनकर आदत हो गई है। बिल्कुल बुरा नहीं लगता। इनके " कालीमाऊ "कहने का।
