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Archana Saxena

Fantasy


4.5  

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जन्म जन्मान्तर का प्यार

जन्म जन्मान्तर का प्यार

11 mins 254 11 mins 254

बात सैकड़ों वर्ष पुरानी है। राजा वीरभद्र की सबसे छोटी सन्तान थी राजकुमारी फूलमती। चार भाइयों की इकलौती बहन और सबसे छोटी होने की वजह से घर भर की लाड़ली भी थी वह और अत्यधिक लाड़प्यार ने थोड़ा उच्छृंखल बना दिया था उसे। जब राजकुमारी युवावस्था में पहुँची तो दूर दूर तक उसके सौंदर्य के चर्चे होने लगे। राजा ने मित्र राज्य के राजकुमार के साथ अपनी प्रिय पुत्री को विवाह बंधन में बाँध दिया। राजकुमारी भी जीवनसाथी के रूप में राजकुमार पुष्पेन्द्र को पाकर बहुत प्रसन्न हुयी। 

एक दिन दोनों पावन नदी गंगा में नौका विहार के लिए निकले। गंगा नदी में एक साधु स्नान पश्चात सूर्य देवता को जल चढ़ा रहे थे। उन्हें देख कर पुष्पेन्द्र ने कहा 

 "वह कोई सिद्ध पुरुष प्रतीत होते हैं। हमें उधर चल कर उनसे आशीर्वाद लेना चाहिए।"

राजकुमारी फूलमती यह सुनकर जोर से खिलखिलाई और बोली

  "सिद्ध पुरुष ? मुझे तो वह कोई ढोंगी प्रतीत होते हैं। हमें इनके आशीर्वाद की आवश्यकता नहीं है। सुहावना मौसम है। समय नष्ट क्यों करना?"

  साधु ने यह सुना तो क्रोध से उनकी त्योरियाँ चढ़ गयीं और उन्होंने जोर से कहा

  "फूलमती! बहुत अभिमान है न तुझे स्वयं पे? तू तो मेरे आशीर्वाद के लिए उपयुक्त ही नहीं है। तुझे तो मैं श्राप देता हूँ कि कि जिस प्रेम के वशीभूत होकर तू एक क्षण भी गँवाना नहीं चाहती उस प्रेम की प्राप्ति के लिए तू जन्म जन्मांतर तक भटकेगी पर हर जन्म में आसपास रहने पर भी तू उसे प्राप्त नहीं कर सकेगी। तू हर जन्म में उसे पहचान लेगी, यही नहीं अपने और रिश्ते नाते भी पहचान लेगी पर याद दिलाने पर भी तुझे कोई नहीं पहचान सकेगा।"

  यह सुनते ही फूलमती और पुष्पेन्द्र दोनों के होश उड़ गये। साधु अगर सिद्ध पुरुष नहीं होते तो बिना परिचय दिये उसका नाम नहीं बता सकते थे। और सिद्ध पुरुष से मिला श्राप तो अवश्य पूर्ण होता है। 

 पास पहुँच कर पुष्पेन्द्र ने साधु के चरण पकड़ लिये। फूलमती ने रो रो कर क्षमा याचना की। उन्हें गिड़गिड़ाते देख साधु का हृदय पिघला परन्तु अब कुछ अधिक नहीं किया जा सकता था अतः उन्होंने कहा कि वह अपना श्राप वापस तो नहीं ले सकते परन्तु कुछ कम करने का प्रयास अवश्य करेंगे। इतना कह कर उन्होंने मंत्र पढ़ कर जल फूलमती पर छिड़क कर कहा कि 

  "तेरे इस जन्म के पश्चात तीन जन्मों तक श्राप का प्रभाव ज्यों का त्यों रहेगा परन्तु चौथे जन्म में पुष्पेन्द्र तुझे पहचान लेगा और तुम दोनों श्रापमुक्त हो जाओगे। इससे अधिक मैं चाह कर भी कुछ नहीं कर सकता।"

अनहोनी तो हो गयी थी और अब इसे परिवर्तित कर पाना किसी के वश में नहीं था। निराश पति पत्नी राजमहल लौट आए। फूलमती का कोमल हृदय ये आघात सहन नहीं कर पा रहा था और उसनें बिस्तर पकड़ लिया। बड़े से बड़े वैद्य बुलाये गये किन्तु हर औषधि निष्फल हो जाती थी। एक दिन उसने सदा के लिए संसार से विदा लेली। इस आघात को पुष्पेन्द्र भी नहीं झेल सका और कुछ समय बाद वह भी चल बसा।

उन्हीं दिनों भारतवर्ष ने इंग्लैण्ड की कम्पनी ईस्ट इंडिया कम्पनी से व्यापार समझौता किया।

इसी कम्पनी में एक प्रमुख पद पर माइकल भी एक थे। उनके घर में इंग्लैण्ड में बेटी ने जन्म लिया। प्यार से उसका नाम सोफिया रखा गया। माइकल का अक्सर ही भारत आना जाना रहता था परन्तु परिवार इंग्लैण्ड में ही था। सोफिया के जन्म के चार वर्ष बाद माइकल की पत्नी ने बेटे को जन्म दिया।  सोफिया भाई टॉम से बहुत प्रेम करती थी। सब ठीक चल रहा था कि पड़ोस में एक अन्य परिवार रहने आया। टॉम तब तक दो वर्ष का हो चुका था। उस परिवार में उसकी हमउम्र जेनिफर नाम की लड़की थी। परिचय के लिये जेनिफर की माँ पुत्री को लेकर सोफिया के घर आई। उसे देखते ही छः वर्ष की सोफिया उछल कर उसके पास पहुँची और उसे अपनी माँ कह कर संबोधित करने लगी। यही नहीं उसके बाद उसने टॉम को भी अपना पिता बताना प्रारंभ कर दिया। सोफिया की माँ ने पहले तो इसे बालपन की एक शरारत समझा लेकिन बहुत समझाने पर भी जब उस पर असर नहीं होता था तो वह और माइकल बहुत परेशान हो जाते थे।

जेनिफर की माँ भली महिला थीं। उन्होंने कभी सोफिया को उसके साथ खेलने से नहीं रोका। अब सोफिया ने हिन्दी में और भी कुछ बोलना प्रारंभ कर दिया था जो किसी को समझ में नहीं आता। उसे डॉक्टर को दिखाया गया। बहुत टेस्ट हुये। सब ठीक आया था। इलाज भी हुआ पर यह कोई रोग था ही नहीं। अब वह युवावस्था में कदम रख चुकी थी। टॉम और जेनिफर भी किशोरावस्था में थे। वह दोनों सोफिया से प्यार तो करते पर जब भी वह कुछ ऐसा अजीब कहती तो वह कभी उसका मजाक उड़ाते तो कभी चिढ़ जाया करते। समय के साथ उसकी पिछले जन्म की यादें मजबूत होती जा रही थीं पर जब वह देखती कि इन बातों से सब परेशान हो जाते हैं तो उसने कुछ कहना छोड़ दिया। अब वह खोयी खोयी रहती। सबसे बात करना कम कर दिया उसने। माता पिता उसे चुप देख कर चिन्तित हुये। तब तक माइकल कम्पनी का भारत का काफी कार्यभार सम्हाल चुके थे और उन्हें लगा सोफिया को बदलाव की आवश्यकता है। वह सपरिवार कुछ समय के लिये भारत आ गये।

भारत आकर सोफिया इतनी प्रसन्न हुयी जैसे बहुत समय पश्चात अपने घर वापस लौटी हो। संयोग से वह उसी राज्य में आई जहाँ की वह राजकुमारी थी। उसने अपनों के बारे में पता लगाने का प्रयत्न किया लेकिन उसे मिलता भी कौन? इतने बरस बीत चुके थे उस पीढ़ी का कोई बाकी नहीं था। उस पर वीरभद्र का राज्य किसी और के आधीन हो चुका था। अगली पीढ़ी कहाँ रह रही है पता नहीं चल सका। 

वह निराश घर लौट आई। पर वह खुश थी कि भारत में है। एकदिन माइकल ने खाना बनाने के लिए नया रसोइया बुलवाया। उसको देखते ही सोफिया कुछ पल के लिये जैसे जड़वत हो गयी। फिर धीरे से बुदबुदाई 'पुष्पेन्द्र'

इस बात को कोई सुन नहीं सका और रसोइया सोमनाथ अगले दिन से काम पर आने लगा। सोफिया किसी न किसी बहाने आसपास रहती और उसे देखती रहती। इससे सोमनाथ काफी असहज अनुभव करता। एकदिन सोफिया ने उसे याद दिलाने की चेष्टा की कि वह दोनों पिछले जन्म में राजघराने से थे एवं पति पत्नी थे। प्रारंभ में सोमनाथ को लगा कि शायद सोफिया मजाक कर रही है परन्तु जब यह अक्सर होने लगा तो वह परेशान हो गया और उसने सोफिया के माता पिता से शिकायत की। जब उन्होंने सोफिया से पूछा तो उसने अपनी बात दोहरा दी। वह सोमनाथ के पीछे पागल हुयी जा रही थी और सोमनाथ को लगता कि इन हालात में वह पागल हो जायेगा। जब हालात काबू से बाहर होने लगे तो सोमनाथ नौकरी छोड़ कर चला गया। माइकल को अपनी पत्नी व परिवार को वापस भेजना ही उचित लगा। सोफिया वापस तो चली गयी लेकिन उसके बाद वह अवसादग्रस्त हो गयी। उसका विवाह भी नहीं हो सका। न वह करना ही चाहती थी और ऐसी स्थिति में उससे विवाह करता भी कौन? अकेलेपन से थक कर एक दिन दुनिया को अलविदा कह गयी।

व्यापार से प्रारंभ करके ईस्ट इंडिया कम्पनी ने भारत को धीरे धीरे गुलाम बना डाला। ब्रिटिश शासन में भारतीयों पर बहुत अत्याचार होने लगे थे। जब अति होने लगी तो विरोध के स्वर भी मुखरित होने लगे। जगह जगह धरने प्रदर्शन होते परन्तु बदले में भारतीयों को लाठीचार्ज और कभी तो बन्दूक की गोलियों का सामना भी करना पड़ता। रमाशंकर की बेटी लक्ष्मी भी इस अत्याचार के विरुद्घ जो उससे बन पड़ता वह करती थी। वह केवल चौदह वर्ष की थी परन्तु बहादुरी में किसी से कम नहीं थी। वह नौवीं कक्षा की छात्रा थी और बहुत होनहार थी। इन विरोध प्रदर्शनों में होने वाली सभा के सम्बोधन के लिये वह जोशीले भाषण लिख कर देती। ऐसे ही एक दिन वह नारायण नाम के युवक के सम्पर्क में आई। नारायण देशभक्त था। लक्ष्मी को उसे देखते ही पिछले दोनों जन्म याद आ गये। एकदिन उसने नारायण से जिक्र किया। यद्यपि नारायण ने इस बात को मजाक में लिया परन्तु वह भी लक्ष्मी को पसंद करता था और उसने रिश्ते को नाम देने का फैसला कर लिया। उस समय पर विवाह छोटी आयु में हो जाते थे अतः घरवालों ने उनका विवाह कर दिया। परन्तु होनी को कुछ और ही मन्जूर था। अगले ही दिन एक सभा को सम्बोधित करते हुए अंग्रेज सैनिकों की गोली से नारायण की मृत्यु हो गयी।

इस दुख को लक्ष्मी सहन नहीं कर सकी। उन दिनों सतीप्रथा चलन में थी। वैसे तो लक्ष्मी आधुनिक विचारों की समझदार लड़की थी और ऐसी कुरीतियों के खिलाफ भी थी। परन्तु वह इतनी हताश हुयी कि किसी के समझाने का भी उस पर कोई असर नहीं हुआ और नारायण की चिता में आत्मदाह करके वह सती हो गयी।

आजादी की लड़ाई लम्बी चली। आये दिन आन्दोलन होते थे। अंग्रेजों को भी ज्ञात हो चुका था कि अति शीघ्र भारत को स्वतंत्र करना ही पड़ेगा। परन्तु इसके साथ ही एक जो नयी समस्या सिर उठाने लगी थी वह थी भारत के बँटवारे की। देश का मुस्लिम वर्ग अपने लिये अलग देश पाकिस्तान की माँग करने लगा था।

  इन सब समस्याओं से बेखबर मयूरी मोहन के साथ प्रेम की पींगें बढ़ा रही थी। मोहन भी उस पर जान छिड़कता था। घरवालों को भी इस रिश्ते में कोई आपत्ति नजर नहीं आती थी। तय हुआ था कि भारत को आजादी मिलने का जश्न मनाने के बाद मयूरी और मोहन के विवाह का जश्न भी मनेगा। मयूरी अक्सर मोहन से कहती

 "तुम्हें याद नहीं है यह मैं जानती हूँ पर सत्य यह है कि मेरा तुम्हारा जन्म जन्मांतर का साथ है। मेरा नाम तो मयूरी नहीं मीरा रखना चाहिए था माँ बाबूजी को।"

 मोहन भी हँस कर कहता

  "विवाह के बाद मैं तुम्हारा नाम बदल कर मीरा रख दूँगा।"

वह अक्सर उसे मीरा नाम से बुलाने भी लगा था।

सब कुछ ठीक था कि देश की आजादी के साथ बँटवारे की घोषणा हो गयी। कल तक जो हिन्दू मुस्लिम एक साथ अंग्रेजों के खिलाफ लड़ रहे थे, अचानक एकदूसरे के जानी दुश्मन बन बैठे। मोहन और मयूरी का इलाका पाकिस्तान में आया था और वहाँ भगदड़ मच गयी थी। हिन्दू परिवार अचानक आये संकट से जान बचाने के लिए सब कुछ छोड़ छाड़ कर भाग रहे थे। कितने ही लोग मारे गए। कितने ही परिवार आपस में बिछड़ गये। मयूरी का परिवार किसी तरह हिन्दुस्तान पहुँचने में सफल रहा लेकिन मोहन के परिवार का कुछ पता नहीं चल रहा था। मयूरी विक्षिप्त सी हो गयी थी विछोह में। मयूरी के पिता ने भरसक प्रयत्न किया पर उन लोगों का कुछ पता नहीं चला। पिता भी कहाँ तक कोशिश करते, परिवार के भरण पोषण की जिम्मेदारी भी तो थी। जमीन जायदाद सब कुछ गवाँ चुके थे। अब तो हालत यह थी कि जो भी काम मिलता वही कर लेते।

मयूरी को समझा बुझा कर विवाह के लिये बहुत दबाव डाला पर वह नहीं मानी। एक दिन किसी से पता चला कि मोहन तो हिन्दुस्तान आया ही नहीं था। वह तो मोहसिन बन कर वहीं रह गया था और अब तक तो उसका विवाह भी हो चुका था।

टूट कर इस कदर बिखरी मयूरी कि तपेदिक से ग्रस्त हो गयी। बीमारी उसे खा गयी और एक दिन वह देह त्याग कर अगली यात्रा पर निकल पड़ी।

वीरेश और रूपा के विवाह के आठ वर्ष पश्चात जब प्यारी सी कन्या ने जन्म लिया तो उनकी प्रसन्नता का ठिकाना ही नहीं था। ऐसा नहीं था कि उन्हें सन्तान नहीं थी, दो प्यारे पुत्र थे उनके। परन्तु दोनों को ही एक पुत्री की अभिलाषा थी। इसीलिये उन्होंने तीसरी सन्तान को संसार में लाने का निश्चय किया था। इस बार ईश्वर ने प्रार्थना सुन ली और कन्या रत्न गोद में डाल दिया। बिटिया फूल की तरह सुन्दर थी अतः उसका नाम जूही रखा गया।

न जाने क्यों रूपा और वीरेश को लगता कि पुत्री के साथ उनका जनम जनम का नाता है। माता पिता को अपने सभी बच्चे प्रिय होते हैं पर पुत्री के लिए कुछ विशेष स्नेह था उनके मन में। भाई भी जान छिड़कते थे उस पर। जब जूही ने बोलना प्रारंभ किया तो वह ऐसे शब्द प्रयोग करती कि वीरेश और रूपा हतप्रभ रह जाते। दोनों पुत्र आधुनिक समय के अनुसार माँ को मम्मी व पिता को पापा बुलाते, पर बहुत सिखाने पर भी जूही माताश्री और पिताश्री ही कहती। यहाँ तक कि भाइयों को भी भ्राताश्री बोलता सुन सब दाँतों तले अंगुली दबा लेते। व जब भी कोई उसका नाम पूछता वह फूलमती ही बताती, जूही नहीं। कारण ये था कि इस जन्म में उसकी याद बाकी सभी जन्मों से अधिक स्पष्ट थी जैसे सब कुछ कल की ही बात हो। उसकी बातें सुन कर वीरेश और रूपा को भी लगता जैसे जो कुछ वह कह रही है ऐसा कुछ घट चुका है उनके जीवन में। पर कुछ स्पष्ट नहीं दिखाई देता था। परन्तु एक बार एक अजीब घटना घटी। एक साधु भिक्षा माँगने द्वार पर आया। जूही को घर के आगे खेलता देख कहने लगा

"बहुत कष्ट झेल चुकी राजकुमारी! अब जाके कष्ट कटे हैं तेरे। मेरा आशीर्वाद है तुझे, अब सब ठीक हो जायेगा।"

 वीरेश और रूपा ठगे से खड़े रह गये।

उसी रात दोनों को एक ही स्वप्न दिखाई दिया। उस जन्म का घटनाक्रम चलचित्र की भाँति घूम गया। सुबह जब वह दोनों सोकर उठे तो कोई संशय ही बाकी नहीं था। दो पुत्र भी वही थे।

बाकी दोनों की तलाश में भी कहीं भटकना नहीं पड़ा। वीरेश के सगे भाई के आँगन में ही खेल रहे थे वह।

   जूही बड़ी हो गयी थी अब। वह निश्चिंत थी कि इस बार उसके साथ कुछ गलत नहीं होगा और समय आने पर उसका जन्म जन्मांतर का अधूरा प्यार उसके सामने आकर खड़ा हो जायेगा। उसका सारा ध्यान तो बस पढ़ाई पर था। मेधावी जूही का दाखिला शहर के सबसे अच्छे कॉलेज में हुआ। कॉलेज का पहला ही दिन था। रैगिंग पर प्रतिबंध होने के बावजूद भी छात्र, छात्रायें नये विद्यार्थियों के साथ हल्की फुल्की छेड़छाड़ कर ही लेते थे। ऐसे ही जब जूही सीनियर छात्र छात्राओं को दिखाई पड़ी तो उन्होंने उसे घेर लिया। जतिन नाम के एक सुदर्शन युवक ने जब उसका परिचय पूछा तो आत्मविश्वास से भरी जूही मुस्कुराते हुये बोली

  "तुम मेरा परिचय पूछ रहे हो पुष्पेन्द्र? पहचाना नहीं मुझे?"

जतिन जैसे नींद से जगा। आँखे खुली की खुली रह गयीं उसकी। मुख से निकला

  "फूलमती! हमारी सजा पूरी हो गई?"

अब हैरान हो कर आँखे मलने की बारी जतिन की मित्रमंडली की थी। और वह दोनों खुशी की अधिकता से फूले नहीं समा रहे थे।


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