जल ही जीवन
जल ही जीवन
हर जिले में कस्बों और गांवों का विभाजन कर उन के बीच
सिचांई ओर पानी की आपूर्ति के लिए एक गंगा के जल की धारे निकाल दी जाती थी।जरूरत पड़ने पर जल उस में छोड़ दिया जाता था।
जिसमें सभी गांव के वासी अपनी जरूरत के हिसाब से सिचांई आदि कर लेते थे।
जिस को रझवाया कहा जाता है।
जो आज भी है पर जल सब में नहीं है।
मैंने बचपन में उस सुखद पलों को जिया है ।वही आप चित्रण सब के सामनें प्रस्तुत किया है।
कुछ साल पहलें जब मै गयी उस की अवस्था देख मेरी आँखें भर आयी थी।मै कितने समय तक निःशब्द सी देखती रही थी उस सुखी धारा को ........।
हाथ में ली फिसलती रेत के साथ उस की आँखों की नदी बह निकली।वह समझ ही नहीं पा रही थी।
ये कैसे हो सकता है।ये निर्मल, स्वच्छ जल की धारा आज इस अवस्था में।
"अरे तुम आज इतने वर्षो बाद
यहाँ पर भूल गयी थी मुझे "।
"आप कौन है? मैंने आप को पहचाना नहीं"!
वही जिसके तीरे आ तुम घन्टों समय बीताती थी। मै उज्जवल गंगा की एक धारा जो गाँवों कस्बों के पास में जल, जीवन और खेतो की सिंचाई, के लिए निकाली गयी थी।और जिसको रझवाया नाम दिया था।
जिसे तुमने और सभी लोगों ने मुझे माँ माना।
जब तुम छोटी सी बच्ची थी तो तुम्हारे पहले बाल मेंरे ही किनारे पर बुआ की गोद में उतारें गये थे।मेरी जल देख तुम हंसती खिल खिलाती रही, दूसरें बालकों की तरह रोयी नहीं। तुम ने मुझे उसी दिन से अपना लिया था।
थोड़े बड़े होने पर अपनें बाबा के साथ उगँली पकड़ रोज आती।
बाबा से मेंरे बारे में अनेक प्रश्न करती, कहानी सुननें की जिद्द करती।मेंरे जल को अपनी मुटँठी में ले खेलती कभी पी लेती, कभी दुसरों पर फेकती खिलखिलाती हंसती।
मै तुम को देखती, प्रसन्न हो तुम्हारी हर बात से मेंरे मुख पर भी मुस्कान आ जाती थी। अब तो ये सिलसिला चल निकला तुम कभी अपनी सखियों के साथ तो कभी
चचेरी, ममेरी बहनों के साथ आ मेरे किनारे हास -परिहास करती ,छुपन छुपाई खेलती तो कभी
फिल्मी गाने गुनगुना ती।दूर दूर फैले पेड़ों पर बैठे टिटिहरी, तोते, मैना निहारती उन की आवाज अपने मुख से निकालती ओर उन को अपने पास बुलाती।
याद है, पेड़ से गिर गये मैना के बच्चे को तुम ने सेवा कर फिर उसी के घौंसले में रखवा दिया था।
अपने बाग से तोड़ कर आम, इमली, खटलबटल मेंरे जल से स्वच्छ कर सभी सखी खाती।
याद है एक बार तुम्हारी सखियों ने आम के छिलके जल में बहाना चाहें थे तो तुमने उन को कितना बुरा भला कहा था।मुझे उस समय तुम पर नाज़ हो आया था।
कितनी आशीष दिये थे तुम को मैंने।
इन सब के बीच तुम हमेंशा मुझे मेरे जल को निहारती रहती थी।
मुझे भी तुम से लगाव हो गया था कार्तिक के महीनें में हमेंशा तुम अपनी बहनों भाई चाची, ताई,
और पडोसियों के साथ सब बैल गाडिय़ों में भर कर सुबह पाँच बजे आ कर मेंरे जल में स्नान करती।उगते सुरज को प्रणाम कर धूप, दीप जला तुलसी की आरती कार्तिक मास की कथा होती।उसके बाद सब मिल प्रभु भजन कर प्रसाद वितरण करतें।
ठंडी ठंडी हवा के झोकों के साथ पेड़ो पत्तो का हिलना मधुर संगीत सा लगता। सुहाना मौसम कितना सुखद लगता।हर साल गंगा स्नान पर मेंला भी लगता गाँव वाले कितनें हर्षोउल्लास से सभी मिलते।
कितनी ही बार तुम स्कूल की अध्यापिकाओं को पिकनिक बनानें के लिए जिद्द कर ले आयी।
तुम्हारे जानें के बाद कुछ समय तो ठीक रहा फिर धीरे-धीरे लोगो की आबादी बड़ने के साथ यहाँ लोगों की आवाजाही बढ़नें लगी।
पेड़ों को काटना शुरू कर दिया।
मेंरा किनारों को लोगो ने अतिक्रमण कर मेंरे किनारों पर
गन्दगी करनी, रात में बढती वारदात, गुम हो गयी गई पंगडंडीयाँ, टुक्ड़े टुक्ड़े होते खेत,
पक्षियों के प्रति बढ़ती बेरुखी।
मेरी जल धारा धारे धीरें धीरें कम होती गयी।
उस दिन मेरी छाती ने सबसे ज्यादा बोझिल हुई जब तुम्हारे हरिहर काका की सुता ने
छतविछत अवस्था में मेरी शरण में आयी थी।मैंने ही अपनी गोद में शरण दी थी।
उस के बाद तो ये सिलसिला चल ही निकला था। ना जाने कितनी सुता ........।
किसकों बताऊ अपनी दिल के दर्द को कौन सुन रहा है।मेरी इस हालत का जिम्मेदार और कोई नहीं सभ्य कहलाने वाला प्राणी ही है।
विकास देश का जरूरी है पर इस कीमत पर जंगल, नदियां गावों कस्बों की शान्ती, शहरों में बढता ज्हरीला प्रदूषण !
कहाँ ले जा रहें है बिटिया हम इस सभ्यता को।समय रहते
समझ आ जाये तो अभी कुछ नहीं बिगड़ा।
तुम इस सब में अपन योगदान दो यदि चाहती हो, तुम्हारी आने वाली पीढ़ी अपना जीवन ठीक से जी सके।अपने बालकों को जागरूक करो।
माँ आपकी हमेशा से याद आती रही ।
जब से घर गृहस्थी का भार पड़ा उस को ही सम्भालने में लगी रही। अनेक बार अपने बच्चों को तुम्हारे बारे में भी बताया आज इसी लिए लेकर आयी हूँ।
पर आप की ये अवस्था मेंरे मन को दुखी कर रही है।
मैं प्रयास करुंगी, लोगों को जागरुक करूंगी, ये मेरा वादा है।
