जीवन की पूंजी
जीवन की पूंजी
निधि अकसर अपने प्रोफेसर पति से लड़ पड़ती थी।" क्या कमाते हो?बंधी – बंधाई तनख्वाह हाथ में लाकर रख देते हो।महीने का खर्च कैसे चलाती हूं मै ही जानती हूं।ट्यूशन भीनहींकरते बड़े आदर्शवादी बनते हो।बच्चों को फ्री में ही पढा देते हो—ऊंह। मेरे लिये तो बड़े घरों से रिश्ते आये थे पता नहीं पिताजी ने यहां क्यो ब्याह दी।" महत्वाकांक्षी निधि का ये रोज का रोना था।
मां के अचानक बिमारी की खबर सुनकर निधि अपनी दो छोटी बच्चियों को लेकर अकेली ही ट्रेन में बैठ गई। ट्रेन में भारी भीड़ और निधि के पास भारी भरकर सामान। स्टेशन पर कैसे उतरूंगी? सामान कैसे ऊतारूंगी? हाथ में एक दूधमुंही बच्ची और दूसरी पांच साल की। चिंताग्रस्त थी निधि। गाड़ी रूकते ही निधि लगभग घसीटते हुऐ सामान को किसी तरहा ट्रेन के दरवाजे के समीप लाई। इतने में प्लेटफार्म पर एक सिपाही तेजी से निधि के सामने आकर खड़ा हो गया। छुटकी को निधि के हाथ से गोद में ले लिया। बड़ी को एक हाथ से नीचे उतार दिया और सारा सामान मिनटों में नीचे उतार लिया। ये सब इतनी जल्दी हुआ कि निधि भौंचकी रह गई। कौन है ये? बच्चियों को भी उतार लिया। थोड़ा ड़र भी गई। ट्रेन से लगभग कूद ही पड़ी।
इतने में पुलिसवाले ने झट उसके पैर छू लिये।"मुझे नहीं पहचाना मैड़म? मैं मुकेश। सर से पढने आता था।" अब तो निधि भी बोल उठी "अरे मुकेश तुम?" बेहद गरीब परिवार का मुकेश प्रोफेसर पति से पढने आता था। "हां मैड़म! सर के आशिर्वाद और दी हुई शिक्षा से ही मेरी नौकरी रेलवे पुलिस में लग गई और आजकल इंदौर मे यहीं पोस्टिंग है। मेरा और मेरे परिवार का सर ने जीवन संवार दिया।" ऐसा कहकर उसने सारा सामान हाथों में ले लिया और टेक्सी स्टैंड तक लेकर गया । बेटियों के हाथ चाॅकलेट और फ्रूटी से भर दिये और निधि को टैक्सी में बैठाकर टैक्सीवाले को सख्त हिदायत कि अच्छे से घर छोड़कर आना । निधि जब पैसे देने लगी तो "बोला आपके लिये इतना भी नहीं कर सकता क्या मैं मैड़म। सर मेरे लिये किसी भगवान से कम नहीं और फिर से झुककर निधि के पैर पड़ लिये उसने।" आज निधि का चेहरा गर्व और खुशी से चमक उठा। पहली बार उसे अहसास हुआ कि पैसे से बढ़कर सम्मान और आदर ही जीवन की सबसे बड़ी पूंजी है।
