महादेवी
महादेवी
मां, मां देखो देखो हमें क्या मिला आज! खुशी से किलकारी भरती गायत्री, सीता और सरस्वती ने झोपड़ी में प्रवेश किया। पांच, सात और आठ साल की तीनों बेटियों को यूं किलकारी भरते, उछलते देख रेखा के चेहरे पर भी मुसकराहट आ गयी। " मां आज हमें वो चौराहे पर देवी का मंदिर है ना उसमें पुजारी जी ने खाना खाने बुलाया था। बहुत लोग आये थे। बड़ी बड़ी गाड़ी वाले लोग भी थे। मां सबने हमें टीका लगाया, हमारे पैर धोये, हमें खाना खिलाया और खिलौने और कपड़े भी दिये। क्यों मां आज हमें ये सब क्यो मिला ?"
आठ साल की सरस्वती ने पूछा। बिटिया नवरात्री में तुम सब कन्याएं देवी मानी जाती हो इसलिये तुम्हारी पूजा की और तुम्हे खाना , कपड़ेऔर खिलौने दिये हैं। मां ने कहा !
इतने में पांच साल की गायत्री बोल पड़ी "क्यों मां हम नवरात्री में ही देवी होती हैं, बाकि दिन हम चुड़ैल और ड़ाकन हैं क्या जो भैया के हिस्से का खाना भी खा जाती हैं। पापा और दादी हमेशा हम तीनों को कहते हैं करमजली, नासपीटी , ये चुड़ैल होन क्यों पैदा हो गयी। ड़ाकन है भुक्कड़ होन भाई का खाना भी खा जाती है। पर मां हम तो अपना हिस्सा भी भैया को देते हैं, देखो आज भी हम भैया के लिये मंदिर से लेकर आये हैं।" ऐसा कहकर नन्ही सी गायत्री ने थैली में से गुलाबजामुन से भरा दोना मां के सामने रख दिया।
