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BinayKumar Shukla

Action Crime

3  

BinayKumar Shukla

Action Crime

जिहाद JIHAAD

जिहाद JIHAAD

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CHAPTER-1

सुबह के समस्त अखबार बस एक ही खबर से भरे पड़े थे। ‘बांग्लादेश के मेम्बराने पार्लियाएमेन्ट की कोलकाता में हत्या।’

खबर में बस इतना ही सूत्र मिल पाया था कि जनाब फ्लैट में बैठे जाम बना ही रहे थे कि किसी ने दूर से ही उनके सिर में गोली मार दी। निशाना लगाने वाले ने किसी और स्थान पर बैठकर गोली मारी थी। 

फ्लैट के ड्राइंग रूम में जहाँ वे बैठे थे उसके ठीक सामने वाली खिड़की के शीशे में जरा सा छेद भर हुआ था और गोली सीधे उनके सिर में घुसकर पीछे दीवार में जाकर छुप गई थी। 

किसी विदेशी राजनेता का भारत की धरती पर  पहली बार खून हुआ था इसलिए तत्काल दिल्ली से एन आई ए, सी बी आई और फिर लालबाजार की डिटेक्टिव टीम छान-बिन करने में लग गई। 

पूरा इलाका सुरक्षाकर्मियों से घिर गया। ऐसा घिरा कि परिंदा भी पर न मार सके।

लाश को देखने से ऐसा लग रहा था कि जब गोली मारी गई थी इस समय शायद इन्होंने हत्यारे को देख लिया था और कौतूहलवश हत्यारे की ओर ही देख रहे थे। 

लाश की आँखों की दिशा की ओर तलाश की गई। उस दिशा में एक बड़ा सा पीपल का पेड़ था। 

जाँच दल उस पेड़ तक गए। सीसीटीवी के फुटेज खंगाले गए पर वहाँ लगे किसी भी सी सी टी वी में उस पेड़ का या उसके आसपास का फुटेज नहीं आता था। 

 जाँच टीम अपने काम में लग गई। 

इस बीच बांग्लादेश से भी राजनयिक स्तर पर हत्यारे को पकड़ने का दबाव दिया जाने लगा.. 

दो दिन के बाद चेन्नई सेंट्रल के हर अखबारों के मुखपृष्ठ पर  एक विशेष हत्या की खबर छपी थी। कबाड़ के एक बड़े व्यापारी को उस समय गोली मार दी गई थी जब वह चेन्नई रेलवे स्टेशन के गुड्ज़ यार्ड में मालगाड़ी के एक डब्बे में आए अपने सामानों की जाँच कर रहा था। 

इसमें भी कोलकाता वाली घटना की तरह सामने से उसके सिर के बीच में गोली मारी गई थी। 

लाश को देखकर ऐसा लग रहा था जैसे हत्यारे को जब तक उसने देखा तब तक काफी देर हो चुकी थी। 

 उसी शाम दिल्ली के शकूरबस्ती से एक विदेशी के हत्या की खबर आई। हालांकि विदेशी की शिनाख्त नहीं हो पाई थी क्योंकि उसके पास किसी भी प्रकार के कोई कागजात नहीं थे, पर शक्लो-सूरत से वह नेपाल या चीन का नागरिक लग रहा था। 

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Chapter 2

ग्रामीण और औद्योगिक क्षेत्र के युवावर्ग में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करते ही नौकरी की चाहत उमड़ पड़ती है।

भला क्यों न उमड़े ऐसी चाहत!

जब बच्चे अपने परिवार के बड़ों को दाने-दाने के लिए भटकते देखते, यहाँ वहाँ रोजगार और बेगार के लिए भटकते देख भला किस युवा का मन नहीं द्रवित होगा।

सरकारी नौकरी में जाना भी सबकी चाहत होती है पर बिना ग्रेजुएट हुए सरकारी नौकरी है ही कहाँ? हाँ एक अभी भी बचा है वह है सेना और अर्ध सैनिकबल की नौकरी जिसमें मैट्रिक और बारहवीं पास बच्चे भी प्रयास कर सकते हैं।

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शिल्पांचल का एक घाट।

सुबह के साढ़े तीन बजे घाट के बगल वाले मैदान में इन नौकरियों में जाने के इच्छुक युवा इकट्ठा हो जाते हैं। न कोई कोचिंग, न ही कोई ट्रेनर। सब एक दूसरे को देख दौड़ने के साथ वह समस्त अभ्यास करते हैं जो इन नौकरियों में चयनित होने के लिए आवश्यक होता है।

साढ़े पांच बजने के साथ सूर्योदय होने लगता है और जैसे ही सूरज की पहली किरण नदी के उस पार के चर्च की घड़ी पर पड़ती है,मैदान पूरा का पूरा खाली हो जाता है। इस समय ऐसा लगता है जैसे कोई रहा ही न हो।

पिछले कुछ दिनों से बड़ी विचित्र सी बात हो रही थी।

जैसे ही मैदान में बच्चे दौड़ने की तैयारी करने आते कुछ अजनबी भी आ जाते थे और उन बच्चों को तैयारी में निमग्न देखते। कभी कुछ खास बच्चों की चुपके से तस्वीरें भी ली जाती थीं।

कौन थे ये लोग?

इनका उद्देश्य क्या था?

किसीको यह जानने की फुरसत नहीं थी। सब अपने अपने काम में मगन जो रहा करते थे।

इसी बीच बच्चों में फुसफुसाहट शुरू होती है।

किसी ने बताया कि एस एस सी ने जी डी भारती परीक्षा का ज्ञापन जारी कर दिया है।

बस अब तैयारी में तेजी आ गई।

लगभग हफ्ता भर हो गया अजनबियों की गतिविधियों का, किसी ने ध्यान भी नहीं दिया और वे अब दिख भी नहीं रहे थे।

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प्लेटफॉर्म नंबर 32(स्लीपर सेल)

सुबह साढ़े सात का समय। गाड़ियाँ पूरी रफ्तार में आ जा रही हैं। लोग उतर रहे हैं और सवारी गाड़ी पकड़ने की तेजी में उतर रहे हैं और फिर गेट की ओर दौड़े जा रहे हैं। किसी को किसी की पड़ी नहीं है। पूरा प्लेटफ़ॉर्म दिन भर यात्रियों से भरा रहता है।  

प्लेटफॉर्म का एक कोना। बैठने के लिए एक टूटे हुए सिमेंट के स्लैब पर आठ दस लोग बैठे हुए हैं। कुछ घेरा बनाकर भी खड़े हैं। एक आदमी शायद मुखिया होगा, जो सबकी हाजिरी ले रहा था तथा साथ ही उनको बता भी रहा था कि आज किसे किसके घर जाना है, कितना काम है और क्या-क्या करना है।

हाजिरी और डिटेलिंग के बाद अधिकांश मजदूर अपने हथियार और झोला उठाकर आपस में बतियाते और इठलाते  मंजिल की ओर निकल पड़े। कुछ बच गए अपनी पिछले दिन की मजदूरी लेने के लिए तथा इधर-उधर की बात करने के लिए।

सबकुछ सामान्य सा ही लग रहा था। कहीं कुछ भी अनियमित नहीं था।

बगल में बैठा एक 30-40 वर्ष का जवान अखबार पढ़ रहा था, पर उसके कान इनकी बातों की ओर ही थे, पर वह इतना संजीदा था कि उसकी ओर न तो किसी का ध्यान था ना ही जरूरत। काकू की दुकान से चाय के भाड़ का ऑर्डर दिया और अब चाय की चुस्की ले रहा था।

फोर्ट में पिछले कुछ दिनों से बाउंड्री वाल का काम चल रहा था तथा उसका ठेका इनमें से ही किसी के पास था।

आज फिर ‘उसका’ ही नंबर आया फोर्ट के काम को पूरा करने का। सबसे अंत में उसने अपना झोला उठाया और फिर काम पर निकल पड़ा। पिछले कुछ दिनों से नियमित रूप से आता, काम पर जाता, समय पर सबकुछ करता पर न जाने उसके अंदर क्या था कि उसके ऊपरसुपरवाइजर की नजर-ए-इनायत थी।

सुबह के सारे अखबार आज बांग्लादेश के राजनयिक की हत्या की खबर से भरे पड़े थे। हर तरफ बस एक ही चर्चा कि आखिर यह सब हुआ कैसे?

पुलिस की दबिश बढ़ गई थी। हर तरफ बस जाँच-पड़ताल और पूछताछ ही चल रही थी।

आज काकू के चाय की दूकान पर ताला लगा था।

न तो वे सारे मजदूर दिख रहे थे और ना ही उसके सुपरवाइजर।

अचानक लग रहा था जैसे सबकुछ सामान्य हो गया है।

आज उस घटना के एक सप्ताह बाद प्लेटफॉर्म पर फिर से वही रौनक थी, मजदूर, सुपरवाइजर और काम मांगने वाले।

बस फोर्ट में काम करने वाला आदमी, उसे बराबर घूरते रहने वाला और काकू चायवाला।


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