झोला
झोला
मेरे रंग रूप पर मत जाना। मैं कोई साधारण झोला नहीं। अम्मा बाऊ जी के जीवन की यादों को समेटे मैं वह शख्स हूँ जिसने एक युग को जिया है माना मेरे मालिक के तन की तरह अब मेरा कपड़ा भी गलने लगा है। पर मुझमें रखी धरोहर की तरह जीवन भर इन दोनो का साथ दूँगा। ऐसा मैंने मौन वादा जो किया हुआ है। जब से अम्मा बाऊ जी गाँव का घर खेत खलिहान छोड़ कर बेटे बहू के साथ बुढापे में अशक्त होने पर रहने आये हैं।
बदरंग डोरियों से बंधे कागजों के पुलिंदो से भरा मैं सदा उनके सिराहने के तकियों के बीच में शान से मखमल में टाट के पैबन्द की तरह विराजमान रहता। फुर्सत के समय अक्सर उन दोनों को उसे खोल कर सहेजते देखा करता। "अच्छा तो क्या है इसमें। "एक बार उत्सुकतावश पूछा किसी ने। इस पर उन्होंने कहा "इन लोगों के आग्रह से हम यूँ तो अपना सब कुछ वहाँ छोड़ आये हैं। पर इसमें अपनी बीती जिन्दगी को समेंट लाये हैं। " रिश्तों के दायरे में बंधे होने के कारण वह ज्यादा सवाल जबाब नहीं कर सकता था। अतः उह दिन बात यूँ ही आई गयी हो गयी। पासबुक जिसमें उनकी पेंशन आती थी वह और नोटों की गड्डी को सबने उन्हें मेरे अन्दर से निकालते कई बार देखा था।
पर उसके अलावा मेरे अन्दर क्या था यह एक राज था। क्योंकि सबने उसमें पुराने कपड़े की पोटली में बंधे कुछ कागज भी देखे थे। सबका मानना था कि मुझमें जरूर कोई वसीयत छिपी रक्खी होगी। चेहरे पर शान्ति का भाव ले कर अन्तिम यात्रा पर उनके द्वारा प्रस्थान करनें के बाद समस्त कार्यों से फुर्सत पाने पर सबका ध्यान मुझ पर गया। जल्दी से मुझे खोला गया सबसे ऊपर बैंक की पासबुक और रुपये निकले साथ में एक पर्ची भी थी कि इन रुपयों का उपयोग खस्ताहाल छोटे बेटे के बच्चों की पढाई के लिये किया जाये। उसके नीचे उनकी शैक्षिक योग्यता के प्रमाणपत्र संभाल कर रखे हुए थे। थोड़ा और नीचे अन्दर देखने पर एक गली हुई सुतली नजर आई। उसे खींच कर निकालने पर उसमें लगी सरकाफूंदी वाली गाँठ खुल गयी। और उसमें बंधे पुराने खत सूखे लाल गुलाब के फूल के साथ बिखर गये।
अम्मा जो बाऊ जी के जाने के बाद पथरा सी गयीं थी और निर्लिप्त भाव से दूर बैठी सब देख रही थी। अचानक ही उठीं और सूखे गुलाब और पुराने खतों को उठा कर फूट फूट कर रो पड़ी। और फिर से मुझमें उन्हें सहेज कर अपनें सिरहाने रख लिया। मन में छाई रिक्तता के बाबजूद मैं आज भी अम्मा को बाऊजी के पास में ही होने का एहसास कराता रहता हूँ।
