जैकेट
जैकेट
"आज तो आप बहुत स्मार्ट लग रहे हैं महेश बाबू। यह जैकेट तो आप पर बहुत जँच रही है। कब खरीदा इसे ? "आज ऑफ़िस में महेश बाबू से मिलते ही रतनलाल जी ने कहा।
" धन्यवाद भाई। मगर ये नया नहीं है। बहुत पुराना जैकेट है यह।" महेश बाबू ने रतनलाल जी की ओर देखते हुए कहा।
" पुराना...? मगर, अभी भी एकदम नया लगता है। वाह ! " रतनलाल ने आश्चर्य व्यक्त किया।
" रतनलाल जी, दरअसल यह मेरे स्वर्गीय पिताजी का जैकेट है। उन्हें यह बहुत प्रिय था। बड़े शौक से सिलवाया था उन्होंने, और इसे खूब पहनते भी थे वे....।" महेश बाबू ने विस्तार से बताना शुरू किया।
" लेकिन....कहते हैं कि जो लोग मर जाते हैं, उनके कपड़े पहने नहीं जाते। दान कर दिए जाते हैं।" रतनलाल जी ने पूछा।
" मैं इसे नहीं मानता रतनलाल जी। पिताजी के कपड़े पहनने से मुझे हर पल यह एहसास होता रहता है कि वे मेरे साथ हैं, मेरे पास हैं। उनके स्नेह की ऊष्णता से मुझे ऊर्जा और शक्ति मिलती रहती है जीवन की चुनौतियों से जूझने की। यह मेरे लिए मात्र जैकेट नहीं है, एक रक्षा कवच है।" महेश बाबू ने छाती पर हाथ रखकर पिताजी की जैकेट को प्यार से सहलाते हुए कहा। उन्हें लगा जैसे पिताजी ने आकर प्यार से उन्हें स्पर्श किया हो। उनकी आँखें नम हो आई थीं।
महेश बाबू की बातें सुनकर रतनलाल जी के दिल और दिमाग को खटका-सा लगा।
" ओह, ये मैं क्या कर रहा हूँ ? नहीं..नहीं। पिताजी की यादों को मैं भी दिल से लगाकर रखूँगा।" उन्होंने भी निर्णय ले लिया था।
