Sudershan Khanna

Comedy


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Sudershan Khanna

Comedy


इनवैस्टमैंट प्लान

इनवैस्टमैंट प्लान

11 mins 77 11 mins 77

लाॅकडाऊन में घर पड़े रहे। पर कोई कुम्भकर्ण की औलाद तो हैं नहीं जो लाॅकडाॅऊन के पूरे काल सोते रहें। बार-बार भाषण सुन हम भी उकता गए और आखिर सोच लिया कि इस समय को अवसर में बदल कर ही ठानेंगे। सोए हुए शेर की भांति जगे और भयानक अंगड़ाई लेकर दहाड़ने वाले ही थे कि सामने से पिताजी को आता देख सीधे हो गये। पिताजी की आंखों में एक सवाल फोटोफ्रेम में सजकर टंग गया था। जब उनकी आंखें हमें देखतीं तो उन्हें कहने की आवश्यकता न रहती ‘क्या कर लिया जिम जाकर, गुरिल्ले जैसी बाॅडी बनाकर, अब किसी चिड़ियाघर में ही जाकर गोरिल्ले का लिबास पहन लो। घर को क्यों चिड़ियाघर बना रखा है। चिड़िया भी थोड़ी देर पंख फैला कर आ जाती है। मगर तुम तो पंख कटा कर बैठे हो, बाल बढ़ा लिये हैं ऐसे जैसे कोई रांझे का रोल मिल गया हो। स्कूल में नाटक किया था जिसमें मेज पर पानी का गिलास रख कर चले गए थे। और अब तो श्रीमान् जी नये मोबाइल के मालिक भी बन बैठे हैं। बधाई हो।’ 

आंखें नीचे किए खड़े रह गये। न, न, आप गलत समझे। हमने शर्मिंदगी से आंखें नीचे नहीं की थीं। वो तो हम पिताजी की आंखों में बसे चित्र को देख देखकर उकता गए थे। हम हैरान थे कि यह चित्र धूमिल क्यों नहीं पड़ता। जब भी दिखता है पहले से ज्यादा चमकता नज़र आता है। खैर हमने सुन रखा था कि हर चीज का अपना समय होता है। लगता हो हमारे जीवन में भी वह समय आ गया था। हमने अपने पुराने अनुभव का लाभ उठाकर फ्री-लांस प्रौफेशनल बनने का इरादा कर लिया था। हमने फ्री-लांसरों वाली वेश-भूषा धारण की और जेब में मोबाइल रखने लगे तो एकदम याद आया कि आजकल जेब में मोबाइल रखना सेफ नहीं है। पुलिस और सोशल मीडिया यह बता-बता कर थक गए हैं। पर क्या करें, कहां रखें, हाथों में तो हरदम पकड़े नहीं रह सकते। आत्मनिर्भर बनना है तो हाथों से कई काम करने पड़ते हैं। 

वैसे हम शादी-शुदा हैं पर अभी हमें पिता कहने का गौरव प्राप्त नहीं हुआ है। यह सब न हो सका लाॅकडाॅऊन के सौजन्य से क्योंकि सभी छोटे से घर में बंद हैं। अचानक हमें याद आया कि लाॅकडाॅऊन में हमने एक विलायती फिल्म देखी थी जिसके अदाकार थे मिस्टर बीन्स। बहुत ही संजीदा और गम्भीर भोेले-भाले कलाकार। उनकी कई फिल्में देखीं पर कुछ बातें सदा याद रहेंगी। जैसे कार पार्क करते समय स्टियरिंग निकाल लेना और कार के दरवाजे पर अतिरिक्त ताला लगाना। वैसे भी कार के दरवाजे पर लटका ताला देखकर कौन उचक्का खटखटाएगा, अपना ही टाइम खोटी करेगा। सो हम भी मोहल्ले के दर्जी के पास जा पहुंचे। देखा तो दुकान बन्द थी। गौर किया तो ताले नहीं लगे थे। 

उत्सुकतावश द्वार खटखटाया तो आवाज़ आई ‘मियां कौन है’। आवाज़ काफी भारी-भरकम थी क्योंकि यह पान मसाले की मेहरबानी थी। ‘हम हैं’। ‘अरे भई हम का भी तो कोई नाम होता है, कौन हो तुम? बताओ नहीं तो किवाड़ नहीं खुलेंगे’ दर्जी मियां बोले। ‘अरे साहब हम हैं, हमारी आवाज़ भी नहीं पहचानते, न जाने कितने डिजाईन सिलवाये हैं, घासीराम के लौंडे हैं हम’ हमें भी गुस्सा आता है। 

‘अरे भई नाराज मत हो, शटर बंद करके काम कर रहे हैं, खुला रखेंगे तो गुड़ पर मक्खियों की तरह पुलिस वाले आ जायेंगे और गुड़ में हिस्सा लिये बिना मानेंगे नहीं। अब तुम्हें तो पता ही है कि आजकल काम नहीं है, मगर हम तुम क्या करें? खैर, रुको, हम आते हैं। 

‘जल्दी से अंदर आ जाओ’ शटर उठाकर मियां जी बोले। हम धड़ाक से अन्दर घुसे पर उससे पहले नीचे हुए शटर से हमारे माथे का जोरदार स्वागत किया और हम धधक कर रह गये। ‘अमां, देख कर चलो’ मियां जी ने मापने वाला फीता उठाते हुए कहा। सिर पकड़े हमने उन्हें देखा तो बोले ‘क्या हुआ, कोई गलत बात हो गई क्या हमसे?’ अरे नहीं मियां, पल भर के लिए चुप तो करो। माथे का स्वागत नहीं भुला पा रहा हूं। 

‘बहुत दिनों बाद आये हो तो स्वागत तो जोरदार होना ही था’ मियां जी ने फीता खोलते हुए कहा। ‘अरे रुकिए मियां जी’ कहते हुए हमने झोले में से चार बनियान निकाल दीं। ‘लाहौल विला कुव्वत, अभी ऐसे दिन न आये हैं कि हमें बनियान सिलनी पड़ें, क्यों मज़ाक करते हो नवाबजादे!’ ‘मियां जी, आप नाराज़ न होइए, हम आपके पास इसलिए आये हैं कि आप इन चारों बनियानों में मोबाइल के साइज़ की पाॅकेट बना दें।’ ’बस इत्ती सी बात है’ मियां जी बोले। ‘हां मियां जी, इत्ती सी बात है। ‘इन बनियानों में ताले भी लगाने हैं’ हमने कहा। ‘ताले!!!’ मियां जी ने हैरत से हमें देखा। 

‘ले जाओ अपने कपड़े, मखौल सूझता है तुम्हें। भागो यहां से नहीं तो तुम्हारे बाप से तुम्हारी शिकायत कर दूंगा।’ हमने मियां जी की दाढ़ी पर स्नेह से हाथ फेरा और वे हमारे मुरीद हो गए। किसी की पालतू चीज़ को सहला दो तो ऐसा ही होता है, यह हमने सुन रखा था। मियां जी ने अपना टेलेन्ट दिखाते हुए बनियान में ताले वाली ऐसी जेबें बनाईं कि एक बार तो जी किया कि कमीज के ऊपर ही पहन लें। मगर अपने जोश को काबू करना पड़ा। 

लाॅकडाॅऊन की न खत्म होने वाली छुट्टियों में हमने खूब खबरें हज़म कीं। कुछ हज़म हुईं और कुछ बदहज़मी कर गईं। हमारे 70 एमएम वाली स्क्रीन के फोन पर खतरनाक व्हाट्सअप वीडियोज़ देखे। (ये अलग बात है कि हमारा पुराना अनुभव 35एमएम स्क्रीन पर था।) निर्देशित नहीं, बिना सेंसर किए हुए एक्सीडेंट वाले जिनमें चेहरे को धूमिल नहीं किया होता। ऐसे वीडियो हमें रह-रहकर याद आते। आज जब पिताजी की आंखों में चित्र देखा तो वैसे वीडियो याद आए और एक नाम भी याद आया हर्षदीप आहूजा का जो अपने फोन से ही वीडियो बनाकर अपना नाम रोशन कर रहा है। 

हम भी कोई कम थोड़े थे। हमने रामसे ब्रदर्स के अनुभव का लाभ उठाने की सोची। पर हमारा मकसद चुड़ैल दिखाना नहीं अपितु सत्य दिखाना था सौ फीसदी सत्य। और ऐसे वीडियोज़ पर सेंसर जैसी कोई बात नहीं होती तो हमारे लिये यह काम आसान होता। हमने इस पर डाॅक्टरी शोध किया और खुद को डाॅक्टरेट की उपाधि दे डाली। हमारा 6 महीने का शोध 20 वर्ष के शोध से कम नहीं था। अब हम अपने आप को मोटू-पतलू वाले 20 वर्षीय अनुभवी डाॅ. झटका की तरह डाॅ. फलाना फलाना कहने लगे थे। अब जरूरत थी प्रैक्टिस की। नहीं, नहीं, दवाइयों वाले डाॅक्टर वाली नहीं, अपितु साहित्यिक डिग्री के 20 वर्ष के अनुभव की सत्यता को साबित करने की। 

संपूर्ण शोध करने के बाद हम पिताजी की नज़रों से दूर होने के लिए निकल पड़े। चलते चलते एक जगह जा पहुंचे जहां मजमा लगाा था। हमें प्रैक्टिकल ज्ञान का अवसर मिल गया था और कमाई का अवसर भी नज़र आने लगा था। प्रैक्टिकल की बात ही कुछ और होती है। हमारे जाग चुके दिमाग में कई ताने बाने बुनने लगे। हमने देखा उस जगह भीड़ देखकर हर कोई रुक जाता। आगे की प्लानिंग हमने इतनी देर में सोच ली थी। क्या पता कल कोई आंखों देखा बयान देना पड़े। कमाई के साधन तो वैसे ही बंद हैं। आंखों देखा बयान तो बेचा ही जा सकता है। 

अपने पास टाइम की तो कोई कमी है नहीं। टाइम यहीं इनवैस्ट कर देता हूं। ठीक ही तो है, जिसके पास फालतू पैसा होता है वह उसे शेयर बाजार में लगा देता है, सोना खरीद लेता है, इंश्योरेंस और ले लेता है। टाइम भी तो अपना ही है, इसे इनवैस्ट कर देता हूं। मार्केट क्रैश भी हो जाए तो अपनी सेहत पर क्या फर्क पड़ता है? एक घंटा कम सो लूंगा। फिर कुछ नहीं करूंगा तो टाइम तो इकट्ठा होता रहेगा। टाइम का बैंक बैलेंस बढ़ता रहेगा। और फिर खाली-पीली टाइम अगर कुछ दे जाता है तो क्या बुरा है? अब यहां टाइम की इनवेस्टमेंट से जो कुछ भी मिलेगा उसे खरीदने के लिए दोनों ही मीडिया तैयार, दोनों मतलब इलैक्ट्राॅनिक और प्रिंट। जो ज्यादा दाम ले खरीद ले, फिर अपने मुंह पर ताला बन्द। बस हमें थोड़ा-सा टाइम और लगा कर यह देखना है कि हाथ में बड़ा-सा माइक लेकर जगह जगह दर्शन देने वाली संुदरियां कहां होंगी। बस उनको यहां नहीं पहुंचना चाहिए नहीं तो सारा प्लान चैपट हो जायेगा। 

‘भाईसाहब, ज़रा हटना, रास्ता देना।’ ‘क्यों भई हम फालतू खड़े नज़र आते हैं क्या?’ ‘नहीं, नहीं, मेरा मतलब यह नहीं था’ सहम कर खड़े हो गये क्योंकि हमारी जिम वाली बाॅडी के मसल्स और डोले अभी तक सोए हुए थे। हमारी आवाज़ में स्टीरियोफोनिक इफेक्ट भी नहीं था। ‘यहां तो सारी भीड़ अपना टाइम इनवैस्ट करने को खड़ी है। मतलब बहुत फायदा होने वाला है। अपना नज़रिया तो वैसे भी कमाल का है। जो हम देख पायेंगे वो भीड़ देख ही नहीं सकेगी। आखिर अपना बीस साल का तजुर्बा जो है कहते हुए हमने खुद को आंख मारी। जब सौ दिन पहले बने मंदिर पर सौ वर्ष पुराना प्राचीन मंदिर का बोर्ड लग सकता है तो हम तो सिर्फ 20 वर्षीय अनुभवी होने का तमगा लगा घूम रहे थे। फिर हम जैसा सख्त और कड़क बन्दा कहां मिलेगा। अच्छे-अच्छे एक्सीडेंट्स हमने देखे। हम बहता खून देखकर आंखें बंद कर वाले नहीं हैं। यह बात दीगर है कि हम खून दान देने से मरना बेहतर समझते हैं। ऐसे टाइम पर हम जैसे साहसी और बहादुर लोगों की जरूरत होती है। ‘कृप्या कमजोर दिल वाले यह दृश्य न देखें’ बिल्कुल सही बात है यह कमजोर दिलों वाला काम नहीं है। हमारे सामने अच्छे-अच्छे धरतीपकड़ आये पर हमारे सामने कोई न टिक सका। खून की ज़रा-सी लाली देखते ही उंकड़ू होकर बैठ गए और बिना मांगे अपने अन्दर का माल खाली कर दिया। अब ऐसे लोगों के पास टाइम का बैंक-बैलेंस भी हो तो उसका क्या फायदा। बेकार ही जाता है। हम तो तब भी हिम्मत नहीं हारते जब घायल व्यक्ति सांसें तोड़ देता है। अरे भई, एक न एक दिन तो सबको जाना ही है। अब कोई जा रहा हो तो उसे रोकने से क्या फायदा? वैसे भी कहा गया है, जाने वाले को पीछे से आवाज नहीं देते, नहीं टोकते। नहीं तो उसकी यात्रा सुखद नहीं होती। 

हम जैसों की बहादुरी के कारनामे देखकर कभी-कभी सौ नम्बर वाले हमें बिठा लेते हैं ‘चल भई, एक बाॅडी उठानी है, ज़रा हाथ लगवा देना, तू बड़ा बहादुर है।’ हम भी चल पड़ते हैं ‘कोई काम तो मिला’। जहां काम मिल रहा हो वहां टाइम इनवैस्ट करने में क्या जाता है। फटाफट रिटर्न मिल जाती है। बाॅडी को हाथ लगवा कर वैन में ही तो बैठाना था। इसके अगर कोई सौ रुपये भी दे रहा है तो सौ प्रतिशत रिटर्न है इनवैस्टमैंट पर। पता नहीं लोग क्यों काम की तलाश में मारे-मारे फिरते हैं। उन्हें चाहिए पहले तो वे अपना हाज़मा ठीक करें। फिर सड़कों पर अपना टाइम लेकर घूमें। हां, सड़कें वहीं चुनें जहां काम मिलने की उम्मीद हो। मसलन, ऐसी सड़कें जहां रोजाना सात-आठ एक्सीडेंट हो जाते हों। अब किसी न किसी एक्सीडेंट के समय तो हम हो ही सकते हैं। प्रोबेबिलिटी अच्छी हो सकती है। 

मोबाइल अब अपना एकदम लेटेस्ट है। रात के अंधेरे में भी बढ़िया फोटो खींच लेता है। हमारे फोन के आगे तो सारे सीसीटीवी फेल हैं। अपने मोबाइल फोन के कैमरे का लैंस चमका कर रखते हैं। सीसीटीवी का क्या है, उस पर कुछ देर आराम कर पंछी जाते जाते मूल्य चुका जाते हैं। सीसीटीवी स्वीकार न करे तब भी एहसान का बदला चुका जाते हैं। यह मूल्य सीसीटीवी के लैंस पर कई दिनों तक इंसानियत की निशानी के रूप में स्थिर रहता है। अब सीसीटीवी की आंख में पड़ा बीट रूपी कंकड़ निकलता नहीं, आधी खुली आंखों से वह बेचारा क्या देखे? कभी उचक के इधर से तो कभी उचक के उधर से देखता है तो फिल्म ही पूरी नहीं दिखती। बेचारा मायूस होकर रह जाता है। यही तो फर्क है हम में और सीसीटीवी में। फिर हम टेढ़े-मेढ़े होकर जितने एंगलों से खींच सकते हैं सीसीटीवी थोड़े ही बाहर निकल कर खींचेगा। और हमारी इनवैस्टमैंट की रिटर्न का यही सही समय होता है। जब दोनों मीडिया में घटना का बुलेटिन ब्रेकिंग न्यूज़ की भांति चमकता है तो आंखों देखी घटना की सीसीटीवी रिकाॅर्डिंग मात खा जाती है। फिर मीडिया का ध्यान थोड़ी देर हटकर सीसीटीवी की क्वालिटी की ओर चला जाता है। सरकारी दफ्तरों और पुलिस विभाग फिर ढूंढते हैं हम जैसों को जिनके पास पूरी फिल्म होती है। 

हम भी कम उस्ताद नहीं हैं। पूरी फिल्म की छोटी-सी क्लिप ट्रेलर की तरह सोशल मीडिया पर डाल देते हैं। डलते ही खरीदार सूंघते-संूघते पहुंच जाते हैं। अब मिलती है हमें मनचाही रिटर्न, मतलब कोई फिक्स्ड रिटर्न नहीं। बोलियां लगती हैं जनाब बोलियां। अब बताइए कोई है इसके जैसी इन्वैस्टमैंट जहां इतनी बढ़िया रिटर्न मिले। 

अरे यहां तो थोड़ा रास्ता बन गया। ‘हट भई, के कर रया है’ हमने कुछ पुलिसिया अंदाज़ में बोला तो रास्ता चैड़ा हो गया। आगे जाकर देखा तो एक्सीडेंट में घायल व्यक्ति की आखिरी सांसें चल रही थीं। हमने जल्दी से अपना मोबाइल निकालने की प्रक्रिया चालू की ताकि वीडियो बनाई जा सके। वीडियो की कीमत चित्रों से कहीं अधिक होती है। अब महंगा मोबाइल है ऐसे ही किसी पाॅकेट में थोड़ी रख देंगे। मियां जी से बनवाई स्पेशल पूरी तरह से लाॅकर रूपी बनियान में लगी अतिरिक्त जेब में ज़िप मंे बन्द रखना पड़ता है। वरना पेंट की हर जेब की चाबियां मोबाइल-खेंचुओं और जेबकतरों के पास होती हैं। हमने अपनी कमीज के तीन बटन खोले। 

‘क्या कर रहे हो’ वहां खड़ी कोई महिला पुलिस अफसर कड़की। सुनते ही हमने मुंह फेर लिया। हमें क्या मालूम था कि हम मोबाइल निकालेंगे और कोई हमारे सीने पर निगाह रखेगा पर यहां हम पुलिस के कौशल को भूलने की गलती कर बैठे थे। बनियान की जिप खोली पर जल्दबाजी में कमबख्त अड़ गयी। बड़ी मुश्किल से मानी। जैसे तैसे मोबाइल निकाल कर वापिस मुडे़ तो अपने पीछे महिला पुलिस अधिकारी को पाया। देखते ही हम जैसे साहसी बहादुर की पों निकल गई और हमें टाॅम एंड जैरी के जन्तुओं की कारगुजारी स्मरण हो आई क्योंकि हमारी स्थिति बिल्कुल वैसी थी। ‘क्या है?’ ‘मोबाइल है मैम, मोबाइल, मेरा है, यह देखो इसका बिल’ हम सकपका गए थे। मोबाइल का बिल हम ड्राइविंग लाइसेंस और आधार कार्ड की तरह लेकर चलते थे। इससे पहले कि महिला कोई और सवाल पूछतीं उन्हें बड़े अधिकारी ने बुला लिया था। ‘ओफ्फो’ की सांस लेते हुए हमने ‘ओप्पो’ निकाला और पोजीशन करके फिल्म बनाने ही वाले थे कि बाॅडी पर सफेद चादर डाली जा चुकी थी और हमारी इनवैस्टमैंट ज़ीरो रिटर्न देकर हम पर हंस रही थी। पर हम अभी हार नहीं माने हैं, यकीन करिए, देखिए आप हैं कि हम पर हंसे जा रहे हैं, अब हमें नहीं करनी आपसे कोई बात। चलते हैं। राम, राम।



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