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Sudershan Khanna

Fantasy


4  

Sudershan Khanna

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पाषाणराज

पाषाणराज

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‘एक बार फिर सभी पत्थरों को सूचित किया जाता है कि एक आपातकालीन सभा बुलाई जा रही है जिसमें सभी का आना अनिवार्य है’ पाषाणराज ने आदेश दिया और इसकी मुनादी करवा दी गई। ‘आज ऐसी क्या आपत्ति आन पड़ी है जो यकायक सभा बुलानी पड़ी है’ त्रेता युग के सदियों पुराने कुछ बुजुर्ग पत्थरों ने आपस में चिंता प्रकट की। ‘क्या इस युग में फिर किसी रावण ने सीताहरण किया है और श्रीराम उसे मुक्त कराने के लिए लंका पर चढ़ाई करने के लिए सेना सहित सागर पार जाना चाहते हैं?’ वे फिर बोले। ‘हमारा अनुभव भी कुछ ऐसा ही अनुभव कर रहा है’ कुछ बुजुर्ग पत्थर बोले। ‘इस कलयुग में तो रावणों की कमी नहीं है, परन्तु मुझे ये सभी मुखौटा लगाए रावण हैं। आज के रावण ज्ञानहीन और संस्कारहीन हैं। उनके रहते सीताएं क्रन्दन करती भयभीत हैं। आज उन्हें अपने अपने श्रीराम की आवश्यकता है’ एक अति बुजुर्ग पत्थर ने कहा। ‘कुछ भी हो, मेरे विचार में हमें देर नहीं करनी चाहिए, शीघ्र ही चलना चाहिए’ बुजुर्ग पत्थरों ने सुझाया।  


‘आप ठीक कहते हैं तात’ कहते हुए त्रेता युग और द्वापर युग के पत्थरों के युग के साथ कलयुग के पत्थर भी चल पड़े। ‘हमें तुम पर गर्व है कलयुग के पत्थरो, मानव स्वभाव कि विपरीत तुमने अपना चरित्र नहीं छोड़ा’ चलते चलते त्रेता युग के एक पत्थर ने कहा तो कलयुग के पत्थरों के चेहरे पर गर्व की मुस्कान आ गई। एक अजीब सा कोलाहल करते हुए पत्थर चले जा रहे थे। ‘अरे ये पत्थर कहां लुढ़कते जा रहे हैं’ एक नौजवान ने एक बुजुर्ग से पूछा। ‘हां भई, मैं भी देख रहा हूं, इतने सारे पत्थर एक साथ एक ही दिशा में लुढ़कते जा रहे हैं। मेरा अनुमान है कि इन्हें नल-नील ने स्मरण किया होगा’ बुजुर्ग महाशय ने कहा। ‘नल-नील?’ नौजवान ने प्रश्न किया। ‘क्या तुमने रामायण नहीं पढ़ी?’ बुजुर्ग महाशय ने पलट कर पूछा। ‘उसके बारे में सुना तो है, पर ज्यादा नहीं जानता’ नौजवान ने जवाब दिया। ‘तो बेटा, रामायण देख ही लिया करो, बहुत सी बातें मालूम हो जायेंगी। खैर मैं तुम्हें बताता हूं कि नल और नील दो सर्वश्रेष्ठ वानरों ने पत्थरों की मदद से श्रीराम और उनकी सेना को लंका जाने के लिए समुद्र में रास्ता बनाया था’ बुजुर्ग ने कहा। ‘सुना तो है, पर आज कौन-सा सेतु बनाना है, कौन-सा श्रीराम को समुद्र पार करना है? अब तो समुद्र पार करने के अनेक साधन हैं’ नौजवान ने कहा। ‘या तो तुम इन पत्थरों से पूछो या इनके साथ-साथ जाकर देखो ये कहां जाते हैं तभी तुम्हारी जिज्ञासा शांत होगी’ बुजुर्ग ने सुझाव दिया। ‘हुं ... मेरे पास इन फिजूल की बातों के लिए समय नहीं है’ कहता हुआ नौजवान वहां से चला गया।  


बुजुर्ग के दिमाग में एक विचार आया और वह पत्थरों के साथ-साथ चलने लगा। एकाध स्थान पर लुढ़कते पत्थरों में से एकाध पत्थर बुजुर्ग के समीप भी आया परन्तु बुजुर्ग सावधान थे। ‘श्रीमान् जी, आप काफी देर से हमारे साथ-साथ चल रहे हैं, आप शीघ्र ही थक जायेंगे। थोड़ी दूरी बनाए रखें अन्यथा चोटिल हो सकते हैं। आपका हमारे साथ-साथ चलने का प्रयोजन क्या है?’ एक पत्थर ने पूछा। ‘आज मैं तुम सब पत्थरों को एक ही दिशा में जाते देखकर आश्चर्यचकित हो रहा हूं। कोई विशेष कारण लगता है। कृपया बताने की कृपा करें’ बुजुर्ग महाशय ने सवाल किया। ‘श्रीमान् जी! अभी तो हमें इतना ही मालूम है कि हमें एक आपातकालीन सभा के लिए पाषाणराज ने स्मरण किया है। अतः हम वहीं जा रहे हैं’ पत्थर ने बताया। ‘ओह, आपातकालीन स्थिति! हो न हो कोरोना संबंधी सभा होगी। मैं भी साथ ही चलता हूं। देखता हूं’ बुजुर्ग महाशय ने चलना जारी रखा। ‘आप अभी भी चल रहे हैं। यदि आपने हमारे साथ चलने का निर्णय किया है तो हम अपनी गति धीमी कर देते हैं जिससे आपको गंतव्य तक पहुंचने में असुविधा न हो’ कुछ पत्थरों ने निवेदन किया। ‘धन्यवाद’ कहते हुए बुजुर्ग साथ-साथ चलने लगे।  


‘अरे तुम इतना धीरे क्यों चल रहे हो?’ पीछे से आते पत्थरों ने पूछा। ‘बन्धु तुम अपनी गति से आगे बढ़ जाओ, हम इन बुजुर्ग महाशय के साथ-साथ आ रहे हैं’ उक्त पत्थरों ने कहा। ‘ठीक है’ कहते हुए पीछे से आने वाले पत्थर आगे निकल गये। कुछ देर बाद बुजुर्ग को साथ लेकर चल रहे पत्थर भी गंगा नदी के किनारे सभा स्थल पर पहुंच गये। ‘जय गंगा मैया’ बुजुर्ग महाशय ने गंगा माता को प्रणाम किया। ‘हे बुजुर्ग महाशय, आप कृपाकर उस बड़ी शिला पर आराम से बैठिए। आप थक चुके होंगे। थकान मिटा कर गंगाजल से अपनी प्यास बुझाएं’ एक बुजुर्ग पत्थर ने कहा। बुजुर्ग महाशय ने ऐसा ही किया। वे इस सभा में आए हुए पत्थरों को देखकर चकित थे ‘इतने प्रकार के पत्थर! मैंने अपने जीवन में नहीं देखे होंगे।’ अचानक पत्थरों में कोलाहल आरम्भ हो गया। पाषाणराज पधार चुके थे।  


‘पाषाणराज की जय हो’ पत्थरों ने सामूहिक रूप से पाषाणराज का अभिवादन किया। ‘आप सभी शांत हो जायें’ पाषाणराज ने कहा। सभा में चुप्पी छाने लगी थी। ‘अब क्या होगा?’ ऐसे कुछ सवाल पत्थरों के साथ आये छोटे-छोटे कंकड़ पूछ रहे थे और वे सभी उन्हें चुप रहने के लिए कह रहे थे। सभा में तो शांति छा गई परन्तु इस घोर चुप्पी में गंगा नदी की कलकल पत्थरों को अखरने सी लगी थी। ‘हे गंगा मैया! आप कृपा कर कुछ समय के लिए अपना वेग कम कर सकेंगी ताकि हमारी सभा ठीक प्रकार से सम्पन्न हो सके!’ पाषाणराज ने गंगा माता से निवेदन किया। ‘अवश्य पाषाणराज, तुम्हारा उपकार कैसे भूल सकती हूं। तुम्हीं ने तो श्रीराम की सेना के लिए समुद्र में बिछकर उनके लिए सेतु का निर्माण किया था। तुम तो अत्यन्त भाग्यशाली हो जो तुम्हें उनकी चरण रज प्राप्त हुई। मैं तब तक अपना वेग धीमे कर देती हूं जब तक तुम्हारी सभा समाप्त न हो जाए’ गंगा माता ने कहा। ‘बहुत-बहुत धन्यवाद, गंगा मैया’ पाषाणराज ने कहा और गंगा निशब्द होकर बहने लगी।


‘समस्त पत्थरो, आज फिर एक आपातकालीन सभा में तुम्हारा अभिवादन करता हूं और साथ ही मैं इस सभा में विशेष रूप से आए बुजुर्ग मानव का भी अभिनन्दन करता हूं’ पाषाणराज ने कहा तो पत्थरों ने प्रत्युत्तर में पाषाणराज का अभिवादन किया और बुजुर्ग महाशय ने हाथ जोड़ कर अभिवादन का उत्तर दिया। ‘मैं सीधे ही विषय पर आता हूं। आपमें से अधिकतर जानते होंगे और बाकियों को यह मालूम हो कि इस समय धरती पर एक आसुरी शक्ति मृत्यु-ताण्डव कर रही है। मनुष्य बुरी तरह से प्रभावित हो रहा है। कोरोना नामक इस असुर ने मानव जाति का जैसे विनाश करने की ठान ली हो। मुझे तो अगनिगत हृदय-विदारक समाचार सुनने को मिल रहे हैं। अधिकतर मनुष्य अपने संस्कार भूल गए हैं, विवेक खो बैठे हैं। जीवन की इस जंग में स्वार्थी हो गए हैं। और इतने अधिक स्वार्थी कि मानव जाति के उन बहादुरों पर भी आक्रमण कर रहे हैं जो मानव जाति को बचाने में अपनी जान की बाजी लगा रहे हैं...’  


पाषाणराज को कुछ क्षणों के लिए मौन देखकर सचिव पत्थर ने कहा ‘हे राजन, हमें आज्ञा दीजिए, हमारा मार्गदर्शन कीजिए, हम क्या कर सकते हैं।’ ‘अभी मेरी बात पूरी नहीं हुई है। एक ऐसा हृदय-विदारक समाचार सुनने को मिल रहा है जिससे मेरा कलेजा छलनी हो रहा है। दुर्भाग्य से मनुष्य की कुछ प्रजातियां इतनी संसाधनहीन हो गई हैं कि अपनी ही संतानों से छल कर उन्हें सांत्वना देने के अतिरिक्त उन्हें कुछ सूझ नहीं रहा। एक ऐसे ही समाचार से मैं बहुत व्यथित हूं, दुःखी हूं...’ पाषाणराज ने कहा। सभा में पूरी तरह से नीरवता छा गई थी। ‘पत्थर तो वैसे भी नहीं बोलते, परन्तु आज तो अजीब सी नीरवता का एहसास हो रहा है’ बुजुर्ग महाशय ने कहा।  


‘कैसा समाचार है पाषाणराज, हम सभी जानने को उतावले हो रहे हैं ताकि आपका दुःख, आपकी संवेदना कम हो सके’ सचिव पत्थर ने निवेदन किया। ‘आज एक मां ने अपना दिल कड़ा कर अपनी सन्तानों से छल किया है, मानो ममता का गला घांेटा है, पर मां भी क्या करे, आपदा की इस स्थिति में आठ बच्चों की मां इतनी मजबूर हो गयी कि .....’ कहते हुए पाषाणराज अश्रु बहाने लगे।  


‘पाषाणराज रुदन भी करते हैं?’ बुजुर्ग महाशय ने उस शिला से पूछा जिस पर वह विराजमान थे। ‘हां, हम में भी संवेदनाएं होती हैं’ शिला ने जवाब दिया। ‘पाषाणराज, आप इतने अधिक विचलित क्यों हैं?’ बुजुर्ग महाशय ने शिला से खड़े होकर पूछा। ‘हे बुजुर्ग महाशय, मैं अवश्य बताऊंगा। आप संभवतः भूल रहे हैं कि हम में तो ईश्वर अपने अद्भुत रूप में बसते हैं। आप भूल रहे हैं कि हमें ही तराश कर ईश्वर का रूप दिया जाता है। और ईश्वर से अधिक संवेदनशील कौन होगा जिसे अपने हर भक्त की चिन्ता रहती है’ पाषाणराज ने विनम्रता से कहा। ‘क्षमा करें पाषाणराज, मैं तो आप सभी को केवल पत्थर ही समझा था। मैं वास्तव में भूल गया था कि हम मनुष्यों ने ही पत्थरों को विभिन्न ईश्वरीय रूप दिये हैं। क्षमा प्रभु, क्षमा करें’ बुजुर्ग महाशय की आंखों से झरझर आंसू बहने लगे। यह देखकर शिला ने उनसे बैठने का निवेदन किया।  


इस बीच उत्पन्न हुए कोलाहल को शांत कराते हुए पाषाणराज ने कहा ‘सुनो, मैं जो घटना बताने जा रहा हूं वह विश्व के केन्या नामक देश के एक प्रान्त मोम्बासा की है और यह घटना जिस स्थल की है वहां सबसे अधिक गरीबी है। जैसा कि मैंने तुम सभी को बताया कि कोरोना नामक असुर के चलते वहां भी अत्यधिक विपदा आ पड़ी है। आठ बच्चों की एक विधवा और निरक्षर मां पेनिना बहाती कित्साओ अपने परिवार का गुजारा दूसरों के घरों में कपड़े धोकर कर रही थी। किन्तु कोरोना असुर के प्रकोप के कारण उसका जीविका कमाने का साधन बंद हो गया। वह रोज कमाती और अपने परिवार का पालन पोषण करती। एकाध दिन तो जैसे तैसे काट लिया परन्तु एक समय ऐसा आया कि उसके पास बच्चों की भूख मिटाने के लिए धन तो दूर की बात कोई खाद्य पदार्थ भी नहीं बचा। उसके बच्चे भूख से बिलखने लगे। मां से उनका बिलखना न देखा गया। अपने मन को कड़ा करके उस मां ने जानते हो क्या किया?’ पाषाणराज ने प्रश्नचिह्न लगा कर अपने सम्बोधन को अल्पविराम दिया।  


‘क्या किया?’ आशंकाओं भरे अनेक स्वर उभरे। ‘उसने ... उसने ... उसने एक खाली बर्तन में पत्थरों को उबालने रख दिया और बच्चों से कहा कि सो जाओ, सब्जी बन रही है, जब बन जायेगी तो उठ कर खा लेना...’ कहते कहते जोर से सिसक पड़े पाषाणराज। ‘इस घटना ने तो पत्थर को मोम करने वाली कहावत को सिद्ध कर दिया है’ बुजुर्ग महाशय भी द्रवित हो उठे थे। ‘ओह ... ओह ...’ पत्थरों ने दुःख प्रकट किया। कुछ देर सभा में खामोशी छाई रही। ‘मैं ऐसे उन सभी पत्थरों से अनुरोध करता हूं जिनके परिजनों को ईश्वरीय रूप धारण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है कि वे ईश्वर से ऐसी मुश्किलों में पड़े मनुष्य की मदद करने की प्रार्थना करें, अनुशंसा करंे।’ सभी पत्थरों ने ईश्वर को स्मरण किया।  


अचानक एक आकाशवाणी हुई। पाषाणराज के चेहरे पर सन्तोष के भाव दिखाई दिये। उन्होंने एक बार फिर से सम्बोधन करते हुए कहा ‘मुझे यह कहते हुए सन्तोष का अनुभव हो रहा है कि ईश्वर ने स्वयं इस घटना का संज्ञान लेते हुए कुछ मनुष्यों को प्रेरित किया और वे उस गरीब महिला की हर प्रकार से मदद के लिए पहुंच गये हैं। मैं उम्मीद करता हूं कि उस गरीब महिला के बच्चों के उठने से पहले ही भोजन की व्यवस्था हो जायेगी और बच्चों का मां के प्रति विश्वास बना रहेगा।’ यह सुनकर सभा में हर्ष की लहर दौड़ गई। पाषाणराज के इशारे पर सचिव पत्थर ने सभा को शांत कराया।  


‘सबसे पहले मैं उन पत्थरों को हृदय से नमन करता हूं जिन्होंने खौलते पानी में बिना उफ किए मां के विश्वास को जीवित रखा। अब मैं सभी से निवेदन करता हूं कि अपने अपने ईश्वर से प्रार्थना करें कि वे इस आपदा का खात्मा करें और साथ ही आप सभी को इतनी शक्ति दें कि आप सब कोरोना असुर को हरा कर मार गिरायें। इस सभा में आए एकमात्र बुजुर्ग महाशय से भी मेरा निवेदन है कि सम्पूर्ण मानव जाति में यह संदेश प्रसारित कर दें कि सम्पन्न मनुष्य बिना किसी भेदभाव के जरूरतमंदों की सेवा करें। ‘अवश्य पाषाणराज’ कहते हुए बुजुर्ग महाशय उम्मीद की एक नई किरण लिये वापिस चल पड़ेे।



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