हवस का पुजारी
हवस का पुजारी
खेतों में काम करके जब चौधरी महेन्द्र अपने घर आया तो अपने 65 वर्षीय पिता चौधरी सुरेन्द्र सिंह को चूल्हे पर रोटी बनाते देखकर बहुत दुखी हुआ।"आपसे कितनी बार कहा है कि आप खाना मत बनाया करो मगर आप मेरी सुनते ही कहां हो ? अब आपकी उमर नहीं है ये सब करने की।" महेन्द्र ने थोड़ा आवेश में आकर अपने पिता चौधरी सुरेन्द्र सिंह से कहा।
"तूने सुनी है क्या मेरी कभी ? कितने साल से कह रहा हूं कि शादी कर ले , शादी कर ले , मगर आज तक नहीं सुनी तूने मेरी और मुझे ज्ञान दे रहा है। बहू सुमित्रा को मरे पूरे 8 साल हो गये हैं। अब तो मुन्ना भी पूरे 17 साल का हो गया है। इस घर में रोटी बनाने वाली कोई औरत है क्या ? जब कोई लुगाई घर में नहीं है तो कोई तो रोटी बनायेगा ना ? यदि मैं नहीं बनाऊंगा तो कौन बनाएगा ? तुझे तो खेतों से फुरसत नहीं है और मुन्ना को पहलवानी से। अब बता , मैं नहीं बनाऊं तो कौन बनाए रोटी ? अभी भी वक्त्त है , मेरी बात मान जा और शादी कर ले। घर की टेंशन खत्म हो जाएगी और मुन्ना को भी एक मां मिल जाएगी। चल जल्दी से हाथ मुंह धो ले और यहां बैठकर गरम गरम रोटी खा ले। थका हारा आया होगा खेतों से" ! चौधरी सुरेन्द्र सिंह के स्वर में वात्सल्य के साथ साथ उलाहना भी था।
भाग्य की बात थी कि 8 साल पहले एक दिन चौधरी महेन्द्र सिंह अपनी मोटरसाइकिल पर पत्नी सुमित्रा को बैठाकर शहर जा रहा था कि सामने से आ रहे एक ट्रक ने टक्कर मार दी जिसमें सुमित्रा की मौके पर ही मौत हो गयी थी। महेन्द्र के भी गंभीर चोटें आई थीं पर वह बच गया था। सुमित्रा के जाने के बाद घर में तीन पीढियों के तीन पुरुष रह गये थे। चौधरी सुरेन्द्र सिंह, उनका बेटा चौधरी महेन्द्र सिंह और उनका पोता जीतेन्द्र उर्फ मुन्ना। जब सुमित्रा की मृत्यु हुई थी तब जीतेन्द्र केवल 9 साल का था। महेन्द्र ने दूसरी शादी इसलिए नहीं की थी कि वह जीतेन्द्र को एक सौतेली मां नहीं लाना चाहता था। उसने जीतेन्द्र को मां और बाप दोनों का प्यार देने का भरपूर प्रयास किया था लेकिन मां का स्थान कोई और ले सकता है क्या ?
जब सुमित्रा की मृत्यु हुई थी तब चौधरी सुरेन्द्र सिंह 57 साल के थे। उनकी पत्नी की भी मृत्यु पहले ही हो चुकी थी। घर में कोई औरत नहीं रही तो घर के काम की जिम्मेदारी सुरेन्द्र सिंह ने ले ली थी। अब वे 65 साठ के हो गये थे। उनके घुटनों में दर्द भी रहने लगा था। खड़े होने और बैठने में जोर आने लगा था। इससे महेन्द्र को चिंता होने लगी थी मगर वह अपना विवाह नहीं करने पर अड़ा हुआ था। सौतेली मां का खौफ समाया हुआ था उसके दिमाग में इसलिए वह मुन्ना को सौतेली मां नहीं लाना चाहता था।
महेन्द्र अपने हाथ मुंह धोकर खाना खाने बैठ गया। सुरेन्द्र सिंह को 9 साल हो गये थेशखाना बनाते बनाते। इसलिए वे बहुत बढ़िया खाना बना लेते थे। महेन्द्र बड़े स्वाद से खाना खाने लगा।
"राम राम जी चौधरी जी।" महेन्द्र की ससुराल से हरिराम आया था।
"आओ हरिराम जी। बैठो , खाना खा लो।" सुरेन्द्र सिंह ने कहा
"खाना तो मैं खाकर आया हूं। मैं तो रूपा का रिश्ता लेकर आया हूं। मेरी जान पहचान की लड़की है रूपा। 22 साल की है। बहुत खूबसूरत है। पूरे गांव में उसकी टक्कर की एक भी लड़की नहीं है। बहुत सज्जन, कुलीन, शालीन , मिलनसार और संस्कारवान है। मैंने उससे महेन्द्र जी के बारे में बात भी कर ली है। वह महेन्द्र जी से शादी करने को राजी है। वह जीतेन्द्र को अपने बेटा ही मानेगी। अब बोलो चौधरी , क्या कहना है" ? हरिराम ने पूर्ण विश्वास से सुरेन्द्र सिंह की ओर देखा।
"मेरे से के पूछै है , या छोरा सै पूछ ? या ही मना करै सै" ! सुरेन्द्र सिंह के चेहरे पर अप्रसन्नता के भाव थे।
"क्यों महेन्द्र जी , रूपा से बढ़िया लड़की नहीं मिलेगी कहीं। और सुरेन्द्र सिंह जी इस उमर में खाणा बणाते अच्छे लगते हैं क्या" ? हरिराम ने ब्रह्मास्त्र चल दिया।
हरिराम की बातों पर इस बार महेन्द्र चुप रहा। कुछ भी नहीं बोला। इससे सुरेन्द्र सिंह और हरिराम दोनों ही उत्साहित हो गये। सुरेन्द्र सिंह ने कहा
"उसका फोटू शोटू भी साथ लाये हो क्या हरिराम जी" ?
"हां , लाया हूं।" और उसने अपनी जेब से एक फोटो निकालकर सुरेन्द्र सिंह को देते हुए कहा "पूरी श्री देवी लगती है। घर में उजाला कर देगी"
"बात तो तू सही कहवै सै। पर शादी तो या नै करनी है। या कूं दिखा फोटो। देखवा में तो अप्सरा सी लागै सै। क्यों , लागै सै के कोणी" ? सुरेन्द्र सिंह ने महेन्द्र से पूछा। महेन्द्र ने एक नजर फोटो पर डाली और चुप हो गया। सुरेन्द्र सिंह ने इसे मौन सहमति मान कर कहा
"हरिराम जी , या संबंध कूं जल्दी से जल्दी करवा दो तो मन्नै रोटी पोबा सूं मुक्ति मिल जावैगी। कोई अड़चन है के" ?
"ना जी ना , कोई अड़चन नहीं है। कल ही रिश्ता पक्का करवा देता हूं और जल्दी से जल्दी शादी की तारीख भी पक्की कर देता हूं।" हरिराम के स्वर में प्रसन्नता थी।
एक महीने में ही महेन्द्र और रूपा की शादी हो गई। जीतेन्द्र ने अपनी नई मां को पहली बार दुल्हन के रूप में देखा था। रूपा बिल्कुल श्री देवी जैसी लगती थी। बल्कि यूं कहना ज्यादा सही होगा कि वह श्री देवी से भी अधिक सुन्दर थी। उसकी बड़ी बड़ी काली आंखें जीतेन्द्र के दिल में गढ़ गईं थीं। उसके होंठ , उसकी मुस्कान और उसका गदराया बदन देखकर जीतेन्द्र उन्मत्त हाथी की तरह विक्षिप्त हो गया था। उस दिन से उसकी नींद उड़ गई थी। जीतेन्द्र 17 साल का हृष्ट-पुष्ट जवान था। उसे बचपन से ही पहलवानी का शौक था इसलिए उसका शरीर कसरती और सुदृढ था। रंग एकदम गोरा और फीचर्स बहुत तीखे थे। 17 की उमर में ही वह 20 का लगता था। गांव की सभी छोरियां मरती थी उस पर मगर उसने अभी तक किसी को भाव नहीं दिया था। उसका मन उसकी नई मां रूपा पर आ गया था।
शादी को दो महीने हो गये मगर जीतेन्द्र ने रूपा को अभी तक मां नहीं कहा था। रूपा उसे बहुत आदर और प्रेम से "भैया जी" कहकर बुलाती थी। वैसे वह रूपा से 5 साल छोटा था मगर देखने में दोनों बराबर के लगते थे। यदि वे दोनों साथ साथ खड़े हो जायें तो दोनों पति पत्नी से लगते थे। जीतेन्द्र पहलवान था इसलिए "लंगोट" पहनता था। वह अपने कपड़े खुद ही धोता था।
एक दिन जीतेन्द्र को अपने कपड़े धोते देखकर रूपा बोली "रहने दो भैया , मैं धो दूंगी। मेरे होते हुए आप कपड़े धोते अच्छे नहीं लगते हो।" कहते हुए रूपा ने जीतेन्द्र के हाथ से कपड़े छीन लिए। रूपा का हाथ लगते ही जीतेन्द्र के बदन में करण्ट दौड़ गया। कितना मुलायम स्पर्श था रूपा का ! जीतेन्द्र के रोंगटे खड़े हो गये। सारे शरीर में बिजली सी दौड़ गई। उसके शरीर में उत्तेजना आ गई। उसने रूपा को नजर भरकर देखा। उसकी आंखों में वासना के लाल डोरे तैरने लगे थे। उसे स्वयं से डर लगने लगा तो वह भागकर अखाड़े की ओर आ गया।
उसे अखाड़े की ओर जाते हुए देखकर उसका दोस्त धर्मेंद्र उसके पीछे पीछे आ गया।
"क्या बात है मुन्ना ? परेशान सा लग रहा है , क्या बात है" ?
धर्मेंद्र की बात पर जीतेन्द्र कुछ नहीं बोला तो धर्मेंद्र उसे उलाहना देते हुए बोला "यारों से भी बातें छुपाई जाती हैं क्या ? यदि बात नहीं बतायेगा तो फिर काहे की दोस्ती ? मैं तो चला।" धर्मेंद्र खड़े होते हुए बोला।
"अरे , तू मेरा जिगरी है यार ! तेरे से क्या छिपाना" ? और जीतेन्द्र ने सारी बात उसे बता दी। सारी बात जानकर धर्मेंद्र बोला
"यार , वो तेरी मां लगती है रिश्ते में। सौतेली ही सही , मां तो है ही ना ? गांव में इतनी छोरियां मरती हैं तुझ पर ! किसी को भी पकड़ ले ! जिसको भी तू पकड़ेगा , धन्य मानेगी वो खुद को ! पर , मां का ख्याल दिल दिमाग से निकाल दे तू।" धर्मेंद्र उसे समझाने लगा।
"कैसे निकाल दूं यार ? वे आंखें मेरी आंखों में बस गई हैं धरमू। रूपा की उफनती जवानी का दीवाना हो गया हूं मैं। मेरे तो सपनों में भी वही आती है साली।" जीतेन्द्र पागलों की तरह चिल्लाने लगा।
"कुछ तो शर्म कर यार ? अपनी मां के लिए ऐसे विचार" ?
"ये क्या मां मां लगा रखा है तूने ? नहीं मानता मैं उसे मां ? कैसे मानूं ? मेरे बराबर की है वो। मैं उसे "पाना" चाहता हूं बस। तू इसमें मदद कर सकता है या नहीं, साफ साफ बता दे" ?
"तुझ पर तो उसके रूप का नशा चढ़ गया लगता है। चल बता, क्या करना है" ?
"मुझे क्या पता जो मुझसे पूछ रहा है ? मैंने आज तक कोई लड़की पटाई है क्या ? इस काम में तू तो चैम्पियन है चैम्पियन। बता , मैं उसे कैसे पटाऊं" ?
धर्मेंद्र ने जीतेन्द्र को कुछ फॉर्मूले दिये। उन फार्मूलों को सुनकर जीतेन्द्र खुश हो गया और बाजार जाकर एक साड़ी और तरह तरह की चूड़ी ले आया।
"रूपा , देखो मैं क्या लाया हूं" ? कहते हुए जीतेन्द्र ने घर में प्रवेश किया। रूपा किचिन में खाना बना रही थी। जीतेन्द्र की आवाज सुनकर वह किचिन से बाहर आई तो जीतेन्द्र ने उसके हाथ में साड़ी और चूड़ियां पकड़ा दीं।
"क्या है ये सब" ? आश्चर्य से रूपा ने पूछा।
"साड़ी और चूड़ियां हैं बस ! इन्हें पहनकर आओ ना एक बार, फोटो । जीतेन्द्र की आंखें , होठ और भावों से प्यार स्पष्ट झलक रहा था। रूपा ने जीतेन्द्र का जब वह रूप देखा तो वह भयभीत हो गई और कहने लगी
"मैं आपकी मां हूं भैया , क्या अपनी मां के लिए ये सब लाये हो" ?
मां शब्द सुनकर जीतेन्द्र को गुस्सा आ गया। वह चीखते हुए बोला "कौन मां, कैसी मां और किसकी मां ? तुम मेरी मां नहीं हो। मैं तुम्हें मां नहीं मनाता हूं। मैं तो तुम्हें प्यार करता हूं। जाओ , जाकर साड़ी और चूड़ियां पहनकर आओ।"
यह सुनकर रूपा की आंखों से चिंगारियां निकलने लगी "शर्म नहीं आती है तुम्हें ऐसी बातें कहते हुए ? खबरदार जो फिर कभी ऐसी बकवास की तो" ? रूपा ने वह साड़ी और चूड़ियां वहीं पर फेंक दी और भागकर अपने कमरे में चली गई। जीतेन्द्र का यह प्लान चौपट हो गया था।
रात को जब महेन्द्र उसके पास सोने के लिए आया तब रूपा ने कहा
"सुनो जी , एक बात कहनी थी आपसे"
"कहो" रूखा सा जवाब था महेन्द्र का।
"आप बुरा तो नहीं मानोगे ना" ?
"नहीं मानूंगा ?
"मुझे तो भैया जी के लक्षण कुछ ठीक नहीं लगते हैं।"
"कर दी न सौतेली मां जैसी बात ? आखिर तूने अपना असली रंग दिखा ही दिया। मैं जानता था कि सौतेली मां कभी दूसरी औरत के बच्चों को प्यार नहीं करती है इसलिए मैं दूसरी शादी से डरता था। मगर हरिराम ने जब विश्वास दिला दिया तो मैं फंस गया। खबरदार जो मुन्ना के बारे में कुछ भी उल्टा सीधा बोला तो , जान निकाल लूंगा तेरी।" महेन्द्र का रौद्र रूप देखकर रूपा सहम गई। महेन्द्र एक ओर करवट लेकर सो गया। रूपा रात भर तकिया भिगोती रह गई।
अगले दिन रूपा जब नहाने बाथरूम में घुसी और दरवाजा बंद किया तो उसे दरवाजे के बाहर से कदमों की आहट सुनाई दी। उसका ध्यान दरवाजे पर चला गया।
"हे भगवान ! इसने तो दरवाजे में एक छेद कर रखा है। लगता है कि वह उसमें से ही देखता है मुझे ? दिखने में तो शरीफ लगता है पर है एक नंबर का दुष्ट। पता नहीं कबसे देख रहा है मुझे।" उसने फटाफट कपड़े पहने और फिर उस छेद पर टॉवल टांग दिया। अब उसमें से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। रूपा अब इत्मीनान से नहाने लगी। उसे जीतेन्द्र के कुत्सित इरादों का भान हो गया था।
रात को जब महेन्द्र आया तो रूपा ने जीतेन्द्र की कारस्तानी बताने का प्रयास किया लेकिन महेन्द्र जीतेन्द्र के खिलाफ कुछ भी सुनने को तैयार नहीं था। रूपा ने बाथरूम के दरवाजे में किये गये छेद को भी महेन्द्र को दिखाया लेकिन महेन्द्र ने उस पर ही तोहमत लगा दी थी। रूपा खून के आंसू रोने लगी।
जब जीतेन्द्र को महेन्द्र ने कुछ भी नहीं कहा तो उसका दुस्साहस और बढ़ गया। अब वह गाहे बगाहे रूपा को छूने लगा था। कभी आगे से तो कभी पीछे से। रूपा असहाय सी हो गई । उसने अपने ससुरजी से जीतेन्द्र की डरते डरते शिकायत की तो सुरेन्द्र सिंह ने जीतेन्द्र को बुरी तरह से डांटा। जीतेन्द्र ने बड़ी बेशर्मी से उल्टा रूपा पर ही दोषारोपण कर दिया। इससे चौधरी सुरेन्द्र सिंह भी कन्फ्यूज हो गये।
जीतेन्द्र को अभी तक अपनी मंजिल नहीं मिली थी। उसे अभी तक ऐसा अवसर भी नहीं मिला था जिसमें रूपा घर में अकेली हो इसलिए वह अभी तक अपनी मनमानी नहीं कर पाया था। रूपा जैसे तैसे अपने आपको जीतेन्द्र की पाशविकता से बचाती रही। पर बकरे की मां कब तक खैर मनाती ? आखिर बकरे को एक न एक तो कटना ही होगा।
एक दिन चौधरी सुरेन्द्र सिंह और महेन्द्र सिंह दोनों को कहीं जाना था। उस दिन रूपा ने भी साथ चलने के लिए बहुत मिन्नतें कीं लेकिन महेन्द्र के आगे उसकी एक भी नहीं चली।
जीतेन्द्र रात होने का इंतजार करने लगा। उसने चुपके से दूध में नींद की गोली मिला दी। रूपा इससे बेखबर थी। वह दूध पीकर दरवाजा अंदर से बंद कर सो गई। जीतेन्द्र दरवाजा तोड़कर अंदर घुस गया। नींद की गोली का असर था जिसके कारण दरवाजा टूटने पर भी रूपा की नींद नहीं खुली थी। जीतेन्द्र के लिए अब मैदान खुला था। आज वह अपने मन माफिक काम करने वाला था। वह रूपा को पूर्ण रूपेण देखना चाहता था इसलिए उसने एक एक करके उसके सारे वस्त्र निकाल दिये। फिर उसने अपने मोबाइल में उसकी नग्न फोटो कैद कर ली।
जीतेन्द्र ने रूपा की सलवार और चुन्नी से उसके दोनों हाथ पलंग से बांध दिये और उसके अंगवस्त्र उसके मुंह में ठूंस दिये। उसके पश्चात उसने उसके साथ बारी बारी से कई बार बलात्कार किया। जब रूपा के बदन में कोई हरकत नहीं हुई तब जीतेन्द्र को कुछ खटका हुआ। उसने रूपा की नाक के आगे हाथ लगाया लेकिन रूपा की नाक से कोई सांस नहीं आ रही थी। रूपा मर चुकी थी। आखिर कब तक वह पाशविकता झेलती ?
रूपा की मौत से जीतेन्द्र घबरा गया। तब तक रात के दो बज चुके थे। जीतेन्द्र ने लाश को ठिकाने लगाने की सोची। वह पहलवान तो था ही इसलिए उसने रूपा की लाश को अपनी पीठ पर लादा और पास ही जंगल में ले आया। रात का अंधेरा था इसलिए उसने लाश को जंगल में गाढ़ देने का प्लान बनाया। वह अपने घर से कुल्हाड़ी , फावड़ा , परात लिया और एक गड्ढा खोदना शुरू कर दिया। जब गड्ढा पूरा खुद गया तो उसने रूपा की लाश को उस गड्ढे में डाल दिया। वह गड्ढा खोदते खोदते थक चुका था इसलिए वह लाश से थोड़ी दूर बैठकर सुस्ताने लगा।
सुबह के लगभग 5 बज चुके थे। गांव के लोग शौच करने के लिए जंगल की ओर चले जाते हैं इस समय। जीतेन्द्र ने देखा कि एक आदमी उसी ओर चला आ रहा है जिधर रूपा की लाश पड़ी हुई थी। अंधेरे में साफ साफ दिखाई नहीं दे रहा था। जीतेन्द्र दूर से ही उस आदमी पर नजर रख रहा था। जीतेन्द्र ने देखा कि अचानक उस आदमी का पैर किसी से टकराया और वह गड्ढे में गिर पड़ा। वह सीधा रूपा की निर्वस्त्र लाश के ऊपर गिरा था इसलिए वह एक स्त्री की निर्वस्त्र ला देखकर चिल्लाने लगा। उसकी चिल्लाहट सुनकर दो चार लोग और आ गये और वे भी लाश को देखकर चिल्लाने लगे। इस दृश्य को देखकर जीतेन्द्र डर गया और वहां से भागने लगा। भागने की आवाज सुनकर वे लोग भी उसे पकड़ने भागे और आखिर उसे पकड़ ही लिया। सबने जीतेन्द्र की जमकर पिटाई की और पुलिस को वहीं बुलवा लिया। घटना की सूचना पाते ही चौधरी सुरेन्द्र सिंह और महेन्द्र सिंह दोनों भागे भागे आये और जीतेन्द्र की करतूत देखकर उसे मारने लगे। बड़ी मुश्किल से पुलिस ने जीतेन्द्र को बचाया।
"तू पैदा होते ही मर क्यों नहीं गया हरामखोर" चौधरी सुरेन्द्र सिंह बिलख पड़े। "अपनी मां के साथ कुकर्म करने में तुझे जरा भी शर्म नहीं आई" ?
"इसका जिम्मेदार मैं ही हूं। रूपा बार बार शिकायत करती रही पर मैंने उसकी बात को सीरीयसली लिया ही नहीं। यदि मैं उसकी बात मान लेता तो इस हवस के पुजारी से उसे बचा सकता था। इसे फांसी पर लटका दो इंस्पेक्टर साहब।" कहते कहते सुबक पड़ा था सुरेन्द्र। पर अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत !

