हिमालय
हिमालय
हिमालय
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ऋषि वैदिक विद्यापीठ के आचार्य कुमार वर्मा कक्षा में पर्वतराज हिमालय के संबंध में अपने विद्यार्थियों को जानकारी दे रहे थे।
‘प्रिय बच्चों! जैसा कि तुम सभी जानते हो कि हमारा भारतवर्ष महान देश है । अपने भारतवर्ष में छः ऋतुओं का वर्ष भर में आना- जाना रहता है । यहां के पर्वत प्रसिद्ध हैं , खासकर हिमालय पर्वत तो अपने देश का प्रहरी है । यह उत्तरी सीमा में स्थित है । पूर्व से पश्चिम तक 2400 किलोमीटर की लंबाई में फैला हुआ है । हिमालय की प्राकृतिक शोभा दर्शनीय है । इसका विशाल तथा भव्य व्यक्तित्व सबको अपनी ओर आकर्षित कर लेता है । एवरेस्ट चोटी हिमालय का ताज बनकर चमक रही है । श्वेत बर्फ पर जब सूर्य की किरणें पड़ती हैं तो ऐसा मालूम पड़ता है जैसे केसर पिघल कर बह रही हो । जो बादल इससे टकराते हैं, वे पानी बनकर इसको स्नान कराते हैं । उसके बाद इसका धुला हुआ रूप और भी निखर जाता है । हिमालय से टकराकर बड़े-बड़े तूफान शांत हो जाते हैं । हिमालय हमें जीवन दान देता है । गंगा, यमुना, सिंधु व ब्रह्मपुत्र आदि नदियों का यही जन्मदाता है । इसकी विशाल गोद में तमाम जंगल और असंख्य वनस्पतियां हैं । हिमालय पर अनेक पशु- पक्षी विहार करते हैं ।’
सभी बच्चे बड़े मनोयोग से आचार्य श्री की बातें सुन रहे थे । आचार्य श्री ने अपनी बातें जारी रखीं।
‘प्रिय बच्चों! हिमालय भारत का मुकुट है । आध्यात्मिक दृष्टि से तो हिमालय का वर्णन जितना किया जाए कम है । अधिकांश वैदिक -सनातन धर्म के ग्रंथों में हिमालय का वर्णन मिल जाता है । हिमालय क्षेत्र में जड़ी बूटियों का खजाना है । बद्रीनाथ, केदारनाथ, गंगोत्री, यमुनोत्री यहीं पर हैं । हिमालय केवल पर्वत नहीं, बल्कि भारत की संस्कृति, सुरक्षा और समृद्धि का आधार है । हमें इसकी रक्षा करनी चाहिए ।’
सभी बच्चों ने एक साथ अपनी सहमति दी । इसी के साथ आज का पाठ समाप्त कर आचार्य श्री मुस्कुराते हुए कक्षा से बाहर चले गये।
- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
कार्यकारी संपादक - शोध समालोचन
ग्राम रिहावली, डाक घर तारौली गूजर, फतेहाबाद, आगरा, उत्तर प्रदेश,283111
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