कुमाता
कुमाता
कुमाता
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पता नहीं किसने कहा था कि ‘पूत कपूत हो सकता है, पर माता कुमाता नहीं हो सकती ।’
अखबार उलटते -पलटते उसके मस्तिष्क में यह बात तब आई जब उसने एक ताजी घटना पढ़ी कि कैसे एक मां ने अपनी बेटी को चंद धन के लिए बेच दिया । यह तो आजकल की आम बात है । यह सोचकर वह फिर से अखबार उलटने- पलटने लगा, तभी उसके मस्तिष्क में एक पुरानी घटना ताजा हो गई । कैसे उसकी स्वयं की मां ने पुस्तैनी जायदाद से उसे वंचित कर दिया । बल्कि उसने बड़े बेटे होने का पूरा-पूरा फर्ज निभाया । जब उसके स्वयं के भाई दुधमुंहे थे तब बाप के साथ मिलकर मेहनत मजदूरी करके घर की माली हालत सुधारी और स्वयं के भविष्य की चिंता न करके अपनी मां व छोटे भाइयों पर ध्यान दिया । जब छोटे भाई जवान हुए तो उसी मां ने उन्हें भड़काया और सबने मिलकर उसे पीटपाटकर अलग कर दिया । सारी संपत्ति पर अपना अधिकार जमा लिया । उसका स्वयं का बाप मूक दर्शक बना रहा । कुल मिलाकर मौन स्वीकृति ।
संसार के झूॅंठे रिश्तों के बारे में सोचकर उसका हृदय सिहर उठा...।
- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा
