सिद्धि एक धोखा
सिद्धि एक धोखा
सिद्धि एक धोखा
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मैं बहुत हद तक आर्य समाजी विचारधारा से प्रभावित रहा हूं, हालांकि मैंने गीता, रामायण, अधिकांश पुराणों का अध्ययन किया है। फिर भी सिवाय आदि शक्ति गायत्री को छोड़कर मेरी आस्था किसी पूजा पाठ, किसी भगवान और किसी धर्मग्रंथ तक में नहीं रही। मेरे पास अनगिनत यक्ष प्रश्न थे, जिन्हें मैं पूछा करता था और बड़े- बड़े ज्ञानियों से भी कोई संतोषजनक उत्तर नहीं मिलता था। अंधभक्ति करने वालों से आध्यात्मिक चर्चा करके मुझे बहुत आनंद आता था।
मेरे कोई भी प्रश्न साधारण नहीं थे, बल्कि कोई शांति से जवाब देना शुरू भी करे तो अंत तक उसका क्रोध आपे से बाहर हो जाता था। मेरे माता पिता, भाई-बहिन तक मुझसे कन्नी काटते थे, रिश्तेदारों की तो बात ही मत करो।
मेरे रिश्ते के एक फूफा हुआ करते थे। वे गायत्री के बड़े साधक थे, परन्तु अक्सर मेरे पिता का उपहास उड़ाते रहते थे। इसलिए मैंने उन्हें कभी कोई भाव नहीं दिया। जब भी वे आते लोग उनके पांवों में लोट-पोट हो जाते थे और मैं तुच्छ सा प्राणी उनके सम्मान में टस से मस नहीं होता था। तब उन्हें जो सम्मान मिलता था, उसका आनन्द उनके हृदय से गधे के सींग की तरह गायब हो जाता था। वे मुझे अजीब सी नज़रों से देखते थे।
इसके साथ ही एक घटना का जिक्र और करता हूं, क्योंकि बचपन में मैं एक ऐसे व्यक्ति के संपर्क में आ गया था। जो धार्मिकता का चोला ओढ़कर रहता था, उसका निवास हमारे पड़ोस में ही था। वो ऐसा धार्मिक व्यक्ति था, जो अक्सर छोटे बच्चों को बिगाड़ने में उनसे अश्लील बातें करने में आनन्द लेता था। और ईश्वर ने एक दिन उसे बहुत बड़ा दण्ड दिया।
मैं मंदिरों में या तीर्थ स्थलों में अधिक विश्वास नहीं रखता था। हां कभी कभार मित्रों के साथ चला जरुर जाता था। गायत्री परिवार, ब्रह्माकुमारी संस्था, गीता प्रेस के साहित्य के अलावा अन्य धर्मों के साहित्य जैसे ईसाई, मुस्लिम, सिख, जैन, बौद्ध आदि का अध्ययन भी किया है। लेकिन लगाव आर्ष साहित्य से ही रहा। दयानंद सरस्वती द्वारा लिखित सत्यार्थ प्रकाश ने तो खोपड़ी ही खोल दी।
समय बीता...और पारिवारिक जिम्मेदारियों के चलते धर्म अध्यात्म से धीरे- धीरे दूर होता चला गया। इस बीच काफी आर्थिक हानि भी झेलनी पड़ी, क्योंकि मेरे ही खानदान के राधाकिशन पुत्र नारायण सिंह के कारण मुझे लाखों की हानि हुई। मैं समझता हूं कि यह बंदा सिर्फ अपने परिवार वालों को धनवान बनाने के लिए ही पैदा हुआ था, क्योंकि इसका काम था लोगों से धन लेकर अपने परिवारीजनों के लिए एशो-आराम की सुविधाएं उपलब्ध कराना। बाद में इसके ही परिवार वालों ने इसे हाशिए पर फैंक दिया और इसे आत्महत्या करके अपनी जीवन लीला समाप्त करनी पड़ी। इसके द्वारा लिया गया उधार इसके परिवारीजनों ने नहीं चुकाया।
समय बीता...
वर्ष 2022 में पुनः गीता प्रेस की कल्याण का सदस्य बना। मेरी आस्था वापस से सनातन की ओर मुड़नी शुरू हुई। और संयोगवश नेपाल के प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों का भ्रमण करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। श्रीराम जन्मभूमि अयोध्या भी गया । मैं स्पष्ट कर दूं कि ये धार्मिक यात्राएं मेरा एक पैसा खर्च किए बगैर ही सम्पन्न हुईं । और इसका श्रेय जाता है मेरे प्रेरणास्रोत डाॅ. नरेश कुमार सिहाग एडवोकेट जी व डॉ. विकास शर्मा जी हरियाणा वालों को।
मेरे जीवन में सबसे बड़ी उथल-पुथल मची फरवरी 2024 में। सुबह का समय था मेरे मस्तिष्क में एक अजीब तरंग सी दौड़ी। मुझे लगा मैं बेहोश हो जाऊंगा पर हुआ नहीं। मैंने सामान्य होने की बहुत कोशिश की पर हो न सका। धीरे - धीरे में भ्रम का शिकार हो गया। मुझे लगा कि मृत्यु मेरे सम्मुख खड़ी है और अब सब खत्म। मैं ब्रेन अटेक का शिकार हो चुका था। मस्तिष्क में विचारों का ऐसा तूफान आया कि मुझे रात्रि के घोर अन्धकार में भी सैकड़ों सूर्यों सा प्रकाश नजर आता। नींद मुझसे कोसों दूर। नाकारात्मक विचारों से दिमाग भर गया था। कुलमिलाकर मैं मस्तिष्क रोगी हो चुका था। इस बीच मुझे जो अनुभव हुए वो बहुत ही डराने वाले थे। कुछ अनुभवों को आपसे साझा कर रहा हूं - भूत प्रेतों में विश्वास सा होना और उन्हें महसूस सा करना, कोई सामने ज्यादा टैटै करे तो उसकी टैटै उसी समय हमेशा के लिए शांत करने का विचार आना। और कभी- कभी मन का इतना निराश होना व टूटना कि आत्महत्या जैसे विचार आना। अकेले में लगता था कि अभी कोई सामने ब्रह्म राक्षस प्रकट हो जायेगा। मैं अपने मन से लड़ते हुए, अपना उपचार कराता रहा। नियमित दवा ली और यह कोर्स लगभग तीन साल तक चला। अब सब सामान्य है। मशहूर गायक हनी सिंह भी कुछ ऐसी ही बीमारी का शिकार हुए थे। अधिकांश इस बीमारी से पीड़ित लोग स्वयं को अवतार घोषित कर देते हैं। क्योंकि अनुभव इतने खतरनाक होते हैं कि अधिकतर इस तरह की बीमारी को कुंडली जागरण या सिद्धि प्राप्त होना समझा जाता है।
मैं अकेले में ईश्वर से प्रार्थना करता था कि हे ईश्वर! मैंने कभी किसी की
बेईमानी की है, कभी किसी का अहित किया है तो मुझे आपका हर फैसला मंजूर है लेकिन अगर मैंने हद दर्जे तक की ईमानदारी की है और आडम्बरों से दूर रहा हूं, सिर्फ तुझ निराकार ईश्वर में विश्वास रखा है तो फिर अब आपको मुझे ठीक करना ही होगा। मैं कुछ नही जानता।
उसके बाद मैं धीमें - धीमें सामान्य होता गया। ईश्वर को खूब सारा धन्यवाद किया और आजतक उन्हें में कोटि -कोटि प्रणाम करता हूँ।
मैं कुछ रहस्यमयी घटनाओं का जिक्र करता हूं जो मेरे साथ फरवरी 2024 से पहले घटित हुईं । आगे क्या घटित होगा इसका आभास सा मुझे पहले ही हो जाता था, अगर किसी व्यक्ति के संबंध में कोई विचार मन में आता चाहे वो उसकी मृत्यु के बारे में ही क्यों न हो,चार छः दिन में सत्य हो जाता था। और तब मेरे लिए ये सामान्य ज्ञान सा था क्योंकि मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता था। मुझे क्या हानि होने वाली है, इसका भी अंदाजा हो जाता था, लेकिन आप कहेंगे कि फिर आप फायदे में रहते होंगे नहीं, क्योंकि जो होना था वो होकर ही रहता था फिर मैं कितनी भी कोशिशें करूं। हानि से बचने के लिए मैं तमाम कोशिशें करता था, पर बच नहीं पाता था। और सबसे बड़ा सत्य यही है कि जो होगा वो होकर रहेगा। कोई सिद्धि , कोई ज्ञान उसे रोक नहीं सकता।
कल तक जिन प्रश्नों का जवाब मैं ढूंढता था, लोगों से पूछता था, आज उन्हीं सब प्रश्नों के जवाब और भविष्य में खुद जानता हूँ। परन्तु मैं कुछ भी ईश्वरी नियमों में बदलाव नहीं कर सकता। पोंगा पंडित ग्रहों की शांति या आसुरी शक्तियों के डर दिखा- दिखा कर आम जन को खूब मूर्ख बनाते हैं। कोई सिद्धि सटीक जानकारी नहीं दे सकती। कुल मिलाकर यहां पूर्ण कोई नहीं है। जिन्हें हम भगवान मानते आ रहें हैं वे भी नहीं। कोई भी सिद्धि हर समय कार्य नहीं करती। ये बस इस तरह है जैसे बैटरी चार्ज होने पर ही हम उसका लाभ ले सकते हैं और डिस्चार्ज होते ही सब सामान्य।
ईश्वर हमारे जन्म के समय से हमारे साथ होते हैं, जैसे -जैसे हमारी उनके लिए आस्था बढ़ती है वो पास आते जाते हैं,वो हमें सुरक्षा कवच देते हैं पर जैसे- जैसे हमारे अंदर कपट, चोरी, झूठ, मक्कारी आती जाती है। वो हमसे दूर होते जाते हैं। मंदिर में जाने या घंटों पूजा करने से ईश्वर को कोई फर्क नहीं पड़ता। उनको तो बस आपकी निश्छल सेवा, कपट रहित मन से मतलब है।
आज मेरे पास मेरे हर सवाल का जवाब तो नहीं है, बल्कि भविष्य में जन्म लेने वाले हर प्रश्न का जवाब है और यह सिर्फ मेरे लिए ही सटीक है। मैं जैसा सोचता था, ईश्वर ठीक वैसे ही है। हाँ ईश्वर के अनुभव के लिए मुझे बड़ी कठिन परीक्षा देनी पड़ी।
अब मुझे दुनिया बिल्कुल अलग ढंग से दिखती है। मेरी बातें शायद आप में से कई लोगों की समझ में नहीं आयेंगी, क्योंकि आपकी यात्रा अभी बहुत लम्बी और बाकी है....।
- मुकेश कुमार ऋषि वर्मा

