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Gita Parihar

Inspirational


4  

Gita Parihar

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गुण्डाधुर, आदिवासी वीर

गुण्डाधुर, आदिवासी वीर

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मुरिया विद्रोह जल, जंगल ,जमीन के साथ सामंत व औपनिवेशक समूह के विरुद्ध था। इसके अंत के बाद राजा भैरमदेव बस्तर के राजा बने किन्तु बस्तर की जनता भैरमदेव के भाई कालेन्द्र सिंह का सम्मान करती थी, जो उस समय बस्तर के दीवान थे।

राजा भैरमदेव की 2 पत्नियां थी, किन्तु वे निसंतान थे। कालेन्द्र सिंह खुद को भावी राजा के रूप में देखते थे। किंतु विधि का विधान देखिए कि राजा भैरमदेव के अंतिम दिनों में उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई। कालेन्द्र सिंह ने खुद के राजा बनने में आई इस बाधा से निपटने के लिए कुछ आदिवासी नेताओ को बुला कर यह अफवाह फैला दी कि कुंवर रुद्र प्रताप सिंह में राजा के अंश नही हैं और वे राजा बनने के योग्य नही है। इसमें उनका साथ राजा की दूसरी पत्नी ने भी दिया किन्तु उनकी यह साजिश कामयाब नही हुई।राजा ने अपने अंतिम दिनों में किशोर रुद्र प्रताप को राजा घोषित कर दिया।

कालेन्द्र सिंह उनके खिलाफ षड्यंत्र रचते रहते।

 रुद्र प्रताप, कालेन्द्र सिंह से डरते थे।इस वजह से उन्होंने अंग्रेजों से हाथ मिला लिया और कालेन्द्र सिंह को दीवान पद से हटाकर पंडा बैजनाथ को जो अंग्रेजों के चापलूस थे,नया दीवान बना दिया।इस फैसले से आदिवासी राजा के विरुद्ध हो गए और विद्रोह कर दिया। इन परिस्थितियों का फायदा उठाते हुए कालेन्द्र सिंह ने भूमकाल की भूमिका रची। इसके लिए नेतानार गांव के एक उत्साह से भरे युवक जिसे बाहरी लोगों से नफरत थी , गुण्डाधुर को युद्ध के नेतृत्व और आगे की रणनीति तैयार करने की जिम्मेदारी सौंप दी गई।

राजा और अंग्रेजों के खिलाफ गुण्डाधुर ने अलग-अलग जनजातियों से नेता चुन कर पूरे बस्तर को जिसमे डेब्रिधुर, सोनू माझी, मुंडी कलार, मुसमी हड़मा, धानु धाकड़, बुधरु और बुटुल थे, उन्हें एक सूत्र में बांध दिया। गुण्डाधुर के विश्वसनीय लोगों ने गांव-गांव जा कर लोगों को एकत्रित किया। विरोध चिन्ह के रूप में डारा-मिरी का उपयोग किया गया, जिसमें आम की टहनी पर लाल मिर्च को बांध दिया जाता था।

1910 को पुसपल के बड़े बाज़ार में बाहरी व्यापारियों को मारा गया, 5 फरवरी 1910 

को पूरा बाज़ार लूट लिया गया और आदिवासियों में  बांट दिया गया। गुण्डाधुर ने ऐसे बहुत बाज़ार लुटवा कर बंटवा दिए।। 13 फरवरी तक लगभग दक्षिण-पश्चिम बस्तर गुण्डाधुर के समर्थकों के कब्जे में था। नेतानार का एक साधारण युवा अद्भुत संगठन करता सिद्ध हुआ।जब यह बात अंग्रेजो तक पहुंची एक सैन्य टुकड़ी के साथ कप्तान गेयर राजा और दीवान की मदद के लिए भेजे गए। राजा, पंडा बैजनाथ और गेयर ने सभी आदिवासिओ को शांत करने की नीतियां की घोषणा की,जो कार्यान्वित नहीं हुई।

22 फरवरी को पुनः विरोध हुआ जिसमें 15 मुख्य क्रांतिकारी नेता गिरफ्तार किये गए, परंतु अंग्रेज सैनिक गुण्डाधुर को पकड़ना तो दूर, उनका चेहरा भी नही देख पाए। कप्तान गेयर को गुण्डाधुर के साहस का अनुमान हो गया था।महीनों तक गुण्डाधुर छोटी- बड़ी लड़ाइयों का नेतृत्व करते हुए उसे छकाता रहा।करीब 14-15 लड़ाइयों में विजयी होने के बाद और कप्तान गेयर को भगाने के बाद गुण्डाधुर और उनके समर्थक नेतानार में लड़ाइयों का उत्साह मनाने के लिए एकत्रित हुए। सोनू मांझी जो गुण्डाधुर के विश्वनीय थे, उन्हें अंग्रजो ने पैसे और सत्ता का लालच देकर ख़रीद लिया।सभी आदिवासी युद्ध से थके थे, भर पेट भोजन और महुवे के नशे में चूर थे।तभी सोनू मांझी ने मौके का फायदा उठाते हुए,गेयर को सूचना दे दी। 25 मार्च की सुबह बड़ी संख्या में अंग्रेज सैनिकों ने बंदूको के साथ नेतानार की तरफ बढना और कस्बों में आदिवासियों पर गोलीबारी करना शुरू कर दिया। गोलियों के आवाज़ से गुण्डाधुर सचेत हो गए।परंतु उनके कोई भी साथी खुद खड़े होने लायक नहीं थे। गुण्डाधुर ने अपनी तलवार उठायी और घने जंगलों की ओर बढ़ गए ,वे पकड़े जाना नहीं चाहते थे क्योंकि वे जानते थे कि उनके पकड़े जाना, महान भूमकाल का पूर्ण अंत होना होगा।

गेयर ने आदेश दिया कि आदिवासियों को देखते ही गोली मारदी जाए और प्रमुख नेताओं को बंदी बना लिया जाए। 21 माटी पुत्र शहीद हो गए, डेब्रिधुर और उनके प्रमुख 7 क्रांतिकारियों को बंदी बना लिया गया जिसमें माड़िया मांझी भी शामिल थे , जिन्हें कुछ दिन बाद नगर के बीच इमली के पेड़ पर फांसी दे दी गयी। 

इस घटना के बाद कालेन्द्र सिंह के मित्रों ने आदिवासियों के साथ मिलकर अंग्रेजो के साथ संधि की जिसमे अवेध घुसपैठ, आदिवासियों पर अत्याचार का अंत और बस्तर की भूमि पर शांति की स्थापना थी। जो गुण्डाधुर का स्वप्न्न था।

1910 के इस महान घटना में न गुण्डाधुर मारे गए न पकड़े गए, अंग्रेजी फाइल यह कह कर बन्द कर दी गयी कि कोई बताने में समर्थ नही है कि गुंडाघुर कौन और कहां है। बस्तर के जंगल के चीखते सन्नाटे आज भी वीर गुण्डाधुर का इंतज़ार कर रहे हैं।

वर्तमान के छत्तीसगढ़ में गुण्डाधुर स्मृति में साहसिक कार्य एवं खेल क्षेत्र में उत्कृष्ट प्रदर्शन के लिए गुण्डाधुर सम्मान स्थापित किया गया है।


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