Saroj Prajapati

Inspirational


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Saroj Prajapati

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गुमनाम शहीद वीर जवान

गुमनाम शहीद वीर जवान

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नवंबर का महीना शुरू होते होते, कश्मीर की ऊंची पहाड़ियों पर बर्फबारी शुरू हो चुकी थी। इन ऊँचे ऊँचे पहाड़ों पर रहने वाली घुमंतू बकरवाल जातियां भी बर्फबारी शुरू होते ही अपने मवेशियों के साथ नीचे मैदानों की ओर चल दी। 

15 वर्षीय अहमद का परिवार ही यहां रह गया था क्योंकि उसकी अम्मी को तेज बुखार था। अहमद के पिता नहीं थे। हां एक छोटी बहन थी। अपने छोटे से परिवार की पूरी जिम्मेदारी किशोर अहमद के ही कंधों पर थी। अहमद के पास चार बकरियां व तीन भीड़ थी और यही उनके जीवनयापन का आधार थे।

जिस रोज उसके समुदाय के लोगों ने नीचे उतरने का फैसला किया था, उसी रात उसकी अम्मी को तेज बुखार हो गया। ऐसे में उनको बाहर निकालना जान जोखिम में डालने से कम ना था और यहां रहकर भी फंसने का ख़तरा था। कहे भी तो किससे! सबका अपना सामान, अपने मवेशी व परिवार।

उसको चिंतित देख कर उसकी अम्मी ने कहा भी कि ‌" तू फिकर ना कर। मैं चल लूंगी धीरे-धीरे। "

"नहीं अम्मी, मैं आपकी जान खतरे में नहीं डाल सकता ।

कोई बात नहीं, जैसे ही आपका बुखार कम होगा, हम नीचे उतर जाएंगे और अब मैं बच्चा नहीं हूं, जो अकेले डर जाऊंगा। मुझे यहां का चप्पा चप्पा मालूम है। "

"लेकिन सुन तो अहमद, तू कैसे अकेले.....!"

"लेकिन वेकिन कुछ नही अम्मी! मैंने कह दिया ना।" कहकर वह अपने मवेशियों को लेकर चल दिया।

उसे देख कर समुदाय के लोगों ने कहा भी "आज नीचे नहीं उतरना क्या!"

"नहीं चचा जान, अम्मी की तबियत सही नहीं। हम एक दो रोज बाद नीचे उतरेंगे।"

लेकिन आज चार रोज हो गए थे। अम्मी का बुखार कभी उतरता और कभी चढ़ता इस बीच बर्फबारी भी बढ़ती

जा रही थी। मवेशियों को भी बाहर ले जाना ठीक ना था। हां, अहमद ऊँचे ऊँचे पहाड़ों पर अकेला ही घूमता रहता। एक दिन उसे ऐसे ही घूमते हुए, बर्फ में जूतों के निशान दिखाई दिए। अहमद को समझ नहीं आया, इतनी ऊंचाई पर कौन आ सकता है। और निशान देखने से फौजी जूतों के लग रहे थे। हमारी भारतीय चौकी तो यहां से काफी दूर, निचाई पर है। उसने मन ही मन कहा।

उसे कुछ समझ नहीं आ रहा था। वह घर की ओर भागा और अपनी मां को सारी बातें बताई। सुनकर उसकी मां का चेहरा थोड़ा गंभीर हो गया।

"अम्मी, आप सुनकर परेशान क्यों हो गई। बताओ ना!"

" तबियत ठीक नहीं ना! बेचैनी हो रही है। बस और कोई बात नहीं।"

अहमद खाना खाकर लेट गया लेकिन नींद आंखों से कोसों दूर थी। यह जूतों के निशान यहां कैसे !

अहमद ने करवट ली तो देखा, उसकी अम्मी और बहन सो चुकी थी। वह उठा और उसी ओर चला दिया। जहां उसे निशान दिखाई दिए थे।

अहमद को दूर से ही कुछ लोगों की आवाज़ सुनाई दे रही थी। यह कौन हो सकते हैं और रात के अंधेरे में क्या कर रहे हैं यहां!

अहमद ने पता लगाने की ठानी। वह छुपते छुपाते वहां तक पहुंच गया, जहां से आवाजें आ रही थी। एक चट्टान के पीछे छुपकर वह देखने लगा। जहां वह खड़ा था। ऊंची चोटी पर कुछ लोग रस्सी के सहारे ऊपर चढ़ रहे थे । उनके पास काफी हथियार थे। अहमद ने ध्यान से देखा, उनकी वर्दी सैनिकों की थी लेकिन यह क्या! यह तो हमारी भारतीय सेना की वर्दी नहीं !

फिर ! फिर ये लोग कौन! कहीं पाकिस्तानी तो नहीं। अक्सर उसने अपने बड़े बुजुर्गों से सुना है कि पाकिस्तानी आतंकवादी कई बार यहां पहुंचने की कोशिश करते हैं।

"लेकिन चाचा, यहां तो मैंने कोई आतंकवादी नहीं देखा!"

"अरे बुजदिलों की इतनी हिम्मत नहीं कि इतनी ऊपर आ सके और आकर तो दिखाएं। हम हैं ना यहां पर ! उन्हें मजा ना चखा दे तो! "

लेकिन आज तो दुश्मन यहां पर आ ही गए। अहमद ने नजर दौड़ाई तो उन लोगों की संख्या काफी थी।

या अल्लाह! इनकी तादाद तो बहुत है। पता नहीं हमारी सेना को इसकी खबर होगी भी या नहीं! मुझे कुछ करना होगा। हां मैं करूंगा।

वह जल्दी से अपनी अम्मी के पास गया और उन्हें सारी बातें बताता हुए बोला " अम्मी मुझे उनके मंसूबे ठीक नहीं लग रहे। मुझे कुछ करना ही होगा वरना!"

"तू क्या करने की सोच रहा है !"

"अम्मी मैं नीचे सेना की चौकी पर जाता हूं और उनको सारी खबर दूँगा।"

"कहीं तू पकड़ा गया तो या रास्ता भटक गया तो!"

"अम्मी मुझे यहां का एक एक चप्पा पता है। आप अल्लाह से दुआ करो कि मैं अपने नेक इरादों में कामयाब होकर, दुश्मनों के गलत मंसूबों पर पानी फेर सकूं।"

इस बार अहमद की अम्मी ने दोनों हाथ ऊपर उठाए और बोली या परवरदिगार, यह भी आज अपने अब्बू के नक्शे कदम पर चला है। इस पर अपनी मेहर बनाए रखना।

"जा अहमद, अल्लाह तुझे तेरे नेक इरादों में कामयाबी बक्शे। या आमीन!"

अपनी अम्मी का आशीर्वाद पाकर अहमद तेजी से बर्फ से फिसलता हुआ नीचे की ओर चल दिया। भारतीय चौकी काफी नीचे थी। लगभग दो घंटे के सफर के बाद उसे आखिर चौकी नजर आ ही गई। उसने वहां पर मौजूद सैनिकों को जो जो उसने ऊपर देखा था, सारी खबर दी।

सुनकर सब का चौंकना लाजमी था। क्योंकि भारतीय सेना की वहां कोई भी चौकी ना थी। इसका मतलब तो यही था कि दुश्मन वहां कब्जा करने के लिए पहुंच चुका है।

लेकिन भारतीय जवानों के होते हुए,ऐसा कब संभव हो पाया है। जल्दी से सारे सैनिक अपने हत्यारों से लैस होकर चल पड़े। जैसे ही वे आगे बढ़े अहमद ने कहा

"हुजूर ,जिस रास्ते को आप चुन रहे हैं ,वह बहुत लंबा है। इससे पहुंचने में तो आपको सुबह हो जाएगी। मैं आपको छोटे रास्ते से लिए चलता हूं।"

भारतीय सेना के अफसर को उसकी बात सही लगी और वह उसके पीछे चल दिए और जल्द ही भारतीय सेना दुश्मनों के सामने थी।

सेना के ऑफिसर ने अहमद को कहा " नौजवान अब आगे का सफर हम खुद तय करेंगे। आगे खतरा है। अब तुम अपनी अम्मी के पास लौट जाओ।"

"नहीं हुजूर, मेरा आपके साथ रहना जरूरी है। मुझे इस इलाके की अच्छे से जानकारी है। मैंने बेशक से फौजी की वर्दी नहीं पहनी और मुझे हथियार चलाना नहीं आता लेकिन आपकी हथियारों को उठाने व पकड़ाने में मदद कर सकता हूं। मैं आपके साथ ही रहूँगा।"

उनके काफी कहने के बाद भी अहमद वापस नहीं गया।

भारतीय सेना ने गोलाबारी शुरू कर दी। भारतीय सेना को अचानक से सामने देख दुश्मनों के होश उड़ गए। उन्होंने सपने में भी नहीं सोचा था कि भारतीय सेना को इतनी ऊपर उनके होने की खबर भी लग सकती है। वह जब तक संभलते, भारतीय सेना ने काफी आतंकवादियों को मार गिराया लेकिन उनकी संख्या काफी ज्यादा थी और भारतीय सैनिकों की कम। हां, जोश और जज्बा दुश्मनों से कहीं ज्यादा! भारतीय सेना की वह छोटी सी टुकड़ी पूरी वीरता से लड़ी और दुश्मनों को खदेड़ने में कामयाब हो गई। इस जंग में उस टुकड़ी के कैप्टन व 2 सैनिकों को छोड़, सभी सैनिक शहीद हो गए और साथ में शहीद हुआ वह नन्हा सिपाही। जिसके कारण उस चोटी पर फिर से भारत का तिरंगा लहरा रहा था।

उन सभी ने शहीद जवानों के साथ-साथ, उस भारत माता के नन्हे लाल को भी सलामी दी, जिसने अपने प्राणों की परवाह ना करते हुए, भारत मां की रक्षा की खातिर अपने प्राण न्योछावर कर दिए।

साथ ही अहमद की मां को शहीद की मां का दर्जा और सम्मान दिया गया।

अहमद जैसे कितने ही गुमनाम जवान भारत मां की रक्षा के लिए हंसते हंसते शहीद होकर, अपना नाम स्वर्णिम अक्षरों में लिखवा कर अमर हो गए।



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