गुलामी
गुलामी
अंग्रेजो ने हमारे देश पर करीब दो सौ साल राज किया ,उनके नागरिक यहां पर बड़े बड़े अधिकारी बन कर आए ,।
भारत में कार्य करने वाले कई ब्रिटिश अधिकारियों को इंग्लैंड लौटने पर कोई सार्वजनिक पद/जिम्मेदारी नहीं दी जाती थी। वजह यह बताई जाती थी की उन्होंने एक गुलाम राष्ट्र पर शासन किया है जिसकी वजह से उनके विचार और व्यवहार में फर्क आ गया होगा। अगर उनको यहां ऐसी कोई बड़ी जिम्मेदारी दी जाए, तो वह आजाद ब्रिटिश नागरिकों के साथ भी उसी तरह से ही व्यवहार करेंगे जैसा की भारत में करते थे । इस बात को समझने के लिए नीचे दिया गया किस्सा अवश्य पढ़ें...
एक अंग्रेज महिला थी जिसका पति ब्रिटिश शासन के दौरान पाकिस्तान और भारत में एक सिविल सेवा में बड़ा अधिकारी था। उस महिला ने अपने जीवन के कई साल भारत के विभिन्न भागों में बिताए, अपनी वापसी पर उन्होंने अपने संस्मरणों पर आधारित एक सुंदर किताब लिखी।
उस महिला ने लिखा कि जब मेरे पति एक जिले के डिप्टी कमिश्नर थे तो मेरा पुत्र करीब चार वर्ष का था और मेरी पुत्री एक वर्ष की थी। वह सब डिप्टी कलेक्टर को मिलने वाली कई एकड़ में बनी एक हवेली में रहते थे।
सैकड़ों भारतीय लोग डीसी के घर और परिवार की सेवा में लगे रहते थे। प्रति दिन पार्टियां होती थीं, जिले के बड़े बड़े जमींदार हमें अपने शिकार कार्यक्रमों में आमंत्रित करने में गर्व महसूस करते थे और हम जिसके पास जाते थे, वह इसे अपना सम्मान मानता था। हमारी शान और शौकत ऐसी थी कि ब्रिटेन में महारानी और शाही परिवार को भी मुश्किल से मिलती होगी।
हमे ट्रेन यात्रा के दौरान डिप्टी कमिश्नर के परिवार के लिए राजसी ठाट से लैस एक आलीशान कंपार्टमेंट दिया जाता था। हम जब ट्रेन में चढ़ते तो सफेद कपड़े वाला ड्राइवर दोनों हाथ बांधकर हमारे सामने खड़ा हो जाता और यात्रा शुरू करने की हमसे अनुमति मांगता। अनुमति मिलने के बाद ही ट्रेन चलती थी।
हम सब एक बार जब यात्रा के लिए ट्रेन में सवार हुए, तो परंपरा के अनुसार, ट्रेन चालक आया और हमसे अनुमति मांगी। इससे पहले कि मैं कुछ बोल पाती, मेरे पुत्र का किसी कारण से मूड खराब था। उसने ड्राइवर को गाड़ी न चलाने को कहा। ड्राइवर ने तुरंत ही आज्ञा मानते हुए कहा,*" जो आज्ञा छोटे सरकार, कुछ देर बाद स्टेशन मास्टर समेत पूरा स्टाफ इकट्ठा हो गया और मेरे चार साल के पुत्र से भी मिन्नते करने लगा, लेकिन उसने ट्रेन को चलाने से मना कर दिया। उनकी बात उसने नही मानी तो आखिरकार, बड़ी मुश्किल से, मैंने अपने बेटे को कई चॉकलेट के वादे पर ट्रेन चलाने के लिए राजी किया और फिर हमारी यात्रा आरंभ हुई।
कुछ महीने बाद, वह महिला अपने दोस्तों और रिश्तेदारों से मिलने इंग्लैंड लौट आई। वह जहाज से लंदन पहुंचे, उनकी रहने की व्यवस्था वेल्स में एक काउंटी में थी जिसके लिए उन्हें ट्रेन से यात्रा करनी थी। वह महिला स्टेशन पर एक बेंच पर अपनी पुत्र और पुत्री को बैठाकर टिकट लेने चली गई।
वहां लंबी कतार के कारण बहुत देर हो चुकी थी, जिससे उस महिला का पुत्र बहुत परेशान हो गया था। जब वह ट्रेन में चढ़े तो आलीशान सजे कंपार्टमेंट की जगह फर्स्ट क्लास की सीटें देखकर उनके बच्चे को फिर गुस्सा आ गया।
ट्रेन ने अपने समय पर यात्रा शुरू की तो वह बच्चा जोर जोर से चीखने-चिल्लाने लगा। वह ज़ोर से कह रहा था, "यह कैसा उल्लू का पट्ठा ड्राइवर है। उसने हमारी आज्ञा के बिना ट्रेन चलानी शुरू कर दी है। मैं पापा को बोल कर इसे जूते लगवा लूंगा।"
महिला को बच्चे को यह समझाना मुश्किल हो रहा था कि यह उसके पिता का जिला नहीं है, यह एक स्वतंत्र देश है। यहां डिप्टी कमिश्नर जैसा तीसरे दर्जे का सरकारी अफसर तो क्या प्रधानमंत्री और राजा को भी यह अधिकार नहीं है कि वह लोगों को अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए अपमानित कर सके।
हम भले ही खुद को आजाद कहते हैं ,आज भले ही हमने अंग्रेजों को खदेड़ दिया है लेकिन हमने गुलामी को अभी तक देश से दूर नहीं किया। आज भी कई अधिकारी, एसपी, मंत्री, सलाहकार और राजनेता अपने अहंकार को संतुष्ट करने के लिए आम लोगों को घंटों सड़कों पर खड़ा कर परेशान करते हैं।
ये सारे प्रोटोकॉल आम जनता की सुविधा के लिए होना चाहिए, ना कि उनके लिए परेशानी का सबब बनाना चाहिए।
पर यह सब हमारे देश में ना जाने कब खत्म होगा।
