rahul srivastava

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4.5  

rahul srivastava

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एडमिशन फ़ीस

एडमिशन फ़ीस

10 mins 23 10 mins 23

अप्रैल का आंतिम सप्‍ताह का शनिवार था। सुबह हुई बारिश से मौसम खुशगवार हो गया था। शाम को भी हल्‍की हल्की बारिश हो रही थी। बिरजू सड़क के बाईं तरफ टैक्‍सी खड़ा करके सवारी का इंतजार.. कर रहा था। उसने घड़ी देखी सात बजने में पांच मिनट बाकी थे। उसने सोचा चलो जब तक सवारी नहीं मिलती है...चाय ही पी लेता हूं । वहीं खड़े खड़े उसने आसपास नजर दौड़ाई...। बाईं तरफ बीस कदम की दूरी पर ठेले पर एक आदमी चाय छान रहा था। वह चाय वाले के पास गया। उसने चाय वाले से अलग से एक स्‍पेशल कड़क चाय बना के लिए कहा। और चाय बनने का इंतजार करने लगा। थोड़ी देर में उसे चाय मिल गई। वह चाय पीने लगा। साथ ही वह टैक्‍सी की तरफ भी देख रहा था। 

अभी उसने आधी चाय ही ...पी थी कि उसने देखा कि एक महिला उसकी टैक्‍सी की तरफ आ रही है। वह करीब 34- 35 साल की रही होगी। वह टैक्‍सी के पास आकर रूक गई। वह आसपास टैक्‍सी के ड्राईवर को खोज.. रही थी। बिरजू ने अभी आधी चाय खत्‍म की थी। महिला को देखते ही झट से आधी चाय फेंक दी। जेब से पांच का सिक्‍का निकाल कर चायवाले को दिया। वह यह सोच कर टैक्‍सी की तरफ लपका... कहीं सवारी चली न जाए। वह टैक्‍सी के पास पहुंच कर महिला से पूछा, मैम!...आपको कहीं जाना है। मैडम ने उसे उपर से नीचे तक देखा फिर सशंकित नजरों से देखते हुए.. पूछा.. यह तुम्‍हारी टैक्‍सी है?

बिरजू ने हाँ, में सिर हिलाते हुए कहा, जी मैम ! महिला ने आश्वस्त होकर कहा, मुझे रेलवे स्‍टेशन जाना है। 

चलिए बैठिए मैम !... कहकर बिरजू ने टैक्‍सी का पिछला दरवाजा खोलकर मैडम को टैक्‍सी में बिठाया।

महिला के बैठने के बाद वह टैक्‍सी को स्‍टार्ट करके रेलवे स्‍टेशन की ओर चल दिया। कुछ दूर चलते ही महिला ने बिरजू से कहा कि जरा जल्‍दी करो मेरी 7: 40 की ट्रेन है। कहीं छूट न जाए?

इतना सुनते ही.... बिरजू ने गाड़ी की रफ़्तार बढ़ा दी और बोला मैम... आप चिंता ना करे मैं आपको समय से पहले पहुंचा दूंगा...। 

यह सुनते ही महिला थोड़ी निश्चिन्त...हो गई। उसने कंधे पर टंगे पर्स को उतार कर अपने बगल में सीट पर रख दिया। वह आराम से बैठ कर कुछ सोचने लगी। तभी उसका फोन बजने लगा और वह फोन पर बात करने लगी।

बिरजू बारिश के कारण सड़क पर आंख गड़ाकर... ध्‍यान से गाड़ी चला रहा था। 

तभी....उसे पीछे से सुबकने की आवाज आई। उसने सामने के मिरर में देखा। महिला रो रही थी। उसकी आँखों से आंसू निकल रहे थे। वह कह रही थी कि बेटे के एडमिशन फीस जमा करना है। मंडे को लास्‍ट डेट है। आज बहुत कहने पर उसे आफिस से एक महीने की सैलरी एडवांस मिली है। मंडे को वह बच्‍चे की फीस जमा करा देगी। शायद वह अपनी बहन से बात कर रही थी। बात करने के बाद फोन रख दिया। रुमाल निकाल कर उसने अपने आंसुओं को पोछा। वह कोशिश कर रही थी की अपने आपको स्थिर रखे। वह खामोश आंखों से शीशे से बाहर रोड के दूसरी तरफ लगे स्ट्रीट लाइट को देखने लगी। उसकी नजरें... लाइटों को देख रही है लेकिन वह मन ही मन कुछ सोच रही थी। बिरजू ये सब देख रहा था लेकिन... वह कुछ बोला नहीं। 

बिरजू फ़ोन पर महिला के एडमिशन की बात को सुनकर मन ही मन सोचने लगा। उसने भी तो आज ही अपने दोनों बच्‍चों का एडमिशन एक छोटे इंग्लिश मीडियम स्‍कूल में करवाया है। स्कूल भले ही छोटा है लेकिन फ़ीस हम जैसे लोगों के लिए तब भी अधिक है। उसके पास भी उतने पैसे नहीं थे। अपने कई जानने वालों से उधार माँगा। लेकिन सबने मना कर दिया। वो भी कहाँ से देते सबको अपने बच्चों का एडमिशन कराना है। थक हारकर उसने फीस के लिए पांच प्रतिशत ब्‍याज पर पैसे एक सूदखोर से लिया। तब जाकर उसने फ़ीस जमा किया..।

इस मंहगाई के जमाने में घर का खर्चा चलाना कितना मुश्किल है। वह यही सब सोच रहा था कि स्‍टेशन आ गया। उसने गेट के पहले सड़क के किनारे टैक्‍सी रोककर बोला मैडम!.. स्‍टेशन आ गया। महिला फोन पर फिर किसी से बात कर रही थी। वह फोन पर बात करते करते उतरी। उसने बिरजू को किराया दिया और स्‍टेशन के अंदर चली गई। 

मैडम के जाने के बाद बिरजू ने देखा कि एक पुलिस वाला आ रहा है। वह समझ गया कि पुलिस वाला गाड़ी हटाने के लिए बोलेगा। वह हटाने के लिए बोले इससे पहले उसने गाड़ी.... स्‍टार्ट करके दूसरे गेट के सामने सड़क के किनारे लगा दिया। 

वहीं वह गाड़ी से उतरकर दूसरी सवारी का इंतजार करने लगा। इस दौरान वह कपड़ा निकाल कर शीशा साफ करने लगा। बारिश के कारण शीशा धुंधला हो गया था। वह शीशा साफ कर रहा था कि उसने देखा कि पिछली सीट पर महिला का पर्स छूट गया है। उसने पर्स उठाया। पर्स खोला उसमें सौ-सौ के नोटों की दो गड्डियां यानी बीस हजार रुपये थे।

उसने घड़ी देखी 7 : 45 हो रहा था। उसने सोचा.... ट्रेन तो अब तक चली गई होगी। पता नहीं उसने क्या सोचा ? बिना देरी किये उसने अपनी गाड़ी का दरवाजा लॉक किया और प्‍लेटफार्म की तरफ भागा। उसने सोचा हो सकता है ट्रेन पांच दस मिनट लेट हो। वह प्‍लेटफार्म तक पहुंचा। लेकिन ट्रेन जा चुकी थी। उसने दिमाग में आया....हो सकता हो उसे पर्स के बारे में याद आ गया हो। वह महिला मुझे खोज रही हो। उसने प्‍लेटफार्म पर खोजा पर वह नहीं मिली। फिर उसे खोजते हुए वापस गेट तक आया। लेकिन उसे वह महिला कहीं नहीं दिखी। उसने सोचा...पर्स में हो सकता है कोई मोबाइल नंबर या....उसका पता लिखा कोई कार्ड हो। पर्स में रूपये के अलावा एक सफेद मोटे सीट का प्‍लास्टिक कार्ड था। उसपर एक कंपनी का नाम और नीचे एक कोड के रूप में नंबर लिखा था। बाकी मेकअप का समान जो लगभग सभी महिलाओं के पर्स में होता है, वह था। बिरजू कार्ड को हाथ में लेकर उलट पलट कर देखने लगा। उस पर और कुछ नहीं लिखा था। पर्स में और कोई कागज़ नहीं था। वह सोचने लगा अब वह क्या करे ?

वह पर्स लेकर आधे घंटे तक गेट के पास खड़ा रहा। सोचा शायद महिला उसे खोजते हुए आये। लेकिन जब कोई नहीं आया तो वह अपनी गाड़ी के पास आया। ....कैसे ? यह पर्स महिला के पास पहुँच जाए उसके दिमाग में यही चल रहा था। 

उसने फ़ोन निकाला। 

उसने अपने एक दोस्‍त प्रवीन को फोन किया जो एक कम्‍यूनिकेशन कंपनी में काम करता था। उसने प्रवीन को फोन पर सारी बात बताई। तो प्रवीन ने कहा, अरे यार!... तेरी तो आज लाटरी निकल आई। इतना क्यों परेशान है। पैसे अपने पास रख ले। किसी को क्या पता चलेगा। लेकिन बिरजू भी एक आम आदमी ही था। वह इस रूपये का महत्‍व समझता था। उसे महिला की पीड़ा याद आ रही थी। उसने प्रवीन से कहा कहो तो... पर्स को थाने में दे दूं। हो सकता है महिला खोजते खोजते थाने तक पहुंचे और उसे पर्स मिल जाए। 

प्रवीन ने कहा थाने में तू रहने दे......पर्स लेकर अभी घर जा। सुबह पर्स लेकर घर आना फिर देखते हैं क्‍या करना है। फोन काटने के बाद बिरजू, थोड़ी देर वहीं रुका रहा। फिर उसने फैसला किया....कि वह घर चलता है।

अगली सुबह 10 बजे बिरजू पर्स लेकर प्रवीन के घर पर पहुंचा। बिरजू ने पर्स में से कार्ड निकाल कर प्रवीन को देते हुए कहा इस कार्ड पर केवल कंपनी का नाम और कोड की तरह एक नंबर लिखा है। प्रवीन ने कार्ड देखा!

कार्ड पर कंपनी का नाम और नीचे नंबर लिखा था। उसने कार्ड देखकर बोला ये कैसा... कार्ड है ? न नाम है न पता और न तो कोई फ़ोटो लगी है ? ...इस कार्ड से उस महिला को कैसे...खोजेंगे ?

तभी उसके दिमाग में आया कि गूगल में कंपनी का नाम डालकर देखता हूं। शायद !... कुछ पता चल जाय। उसने कंप्‍यूटर आन किया। गूगल खोलकर उसने सर्च बॉक्स में कंपनी का नाम डाला। पेज खुलने पर तीसरे नंबर पर कंपनी की वेबसाइट दिखी। उसपर क्लिक करते ही कंपनी का पेज खुल गया। पेज के एक किनारे पर कंपनी का एड्रेस लिखा था और नीचे दो फोन नंबर थे।

प्रवीन ने अपने फोन से पहले लिखे नंबर पर काल किया। रिंग पूरी गई... लेकिन किसी ने फोन नहीं उठाया। उसने दूसरे नंबर पर काल किया। दो बार रिंग बजने के बाद किसी ने फोन उठाया। प्रवीन ने कार्ड पर लिखे कंपनी का नाम लिया और पूछा क्या आप इस कंपनी से बोल रहे हैं। उसने अपने आपको कंपनी का मैनेजर बताया। उसके कंफर्म करते ही प्रवीन ने उसे कार्ड के बारे में बताया। उधर से मैनेजर ने कहा हाँ, हमारे यहां के इंप्‍लाई का कार्ड ऐसा ही होता है। उसने कार्ड का नंबर पूछा। फिर कन्‍फर्म किया कि यह हमारे यहां की एक महिला सुपरवाईजर का कार्ड है। 

प्रवीन ने उसे पर्स के बारे में सारी बात बताई। उसने कहा ठीक है। मैं उनको फोन कर देता हूं। आपने जिस नंबर से फोन किया है वह नंबर उन्‍हें दे दूंगा। वह आपसे कांटेक्‍ट कर लेंगी। यदि नहीं कांटेक्‍ट हो पाता है तो आप दुबारा फोन करिएगा....मैं किसी आदमी को भेज कर पर्स कलेक्‍ट कर लूंगा। प्रवीन ने कहा ठीक है सर।

बिरजू प्रवीन की सारी बातें सुन रहा था। प्रवीन ने फिर भी उसे पूरी बात बताई और कहा फोन का इंतजार करते हैं। 

करीब एक घंटे बाद उस महिला का फोन आया। वह बहुत खुश थी। उसने प्रवीन के घर का एड्रेस नोट किया और बोली अभी 12 : 30 की ट्रेन पकड़ के दो बजे के करीब आउंगी। प्रवीन ने बिरजू से बताया कि वह करीब दो बजे आएगी। बिरजू बोला ठीक है....।

दो बजे के करीब महिला का फोन आया कि मैं ट्रेन से आ गई हूं। दस मिनट में पहुंच जाउंगी। प्रवीन ने बिरजू को फोन पर बताया कि महिला दस मिनट में आ रही है। बिरजू ने कहा ठीक है मैं आ रहा हूं। बिरजू का घर प्रवीन के घर से करीब 1 किमी दूर था। वह पर्स लेकर वहां पहुंच गया। महिला भी थोड़ी देर बाद पहुंची। वह बिरजू को पहचान गई। उसकी आंखों में आंसू थे।

महिला कमरे में आकर बैठ गई। बिरजू ने उसका पर्स उसको पकड़ाया और बोला देख लीजिए आपका सारा पैसा और सामान सुरक्षित हैं ना ? महिला ने पर्स हाथ में लेकर उसे खोल कर चेक किया। सब ठीक ठाक देख कर उसने कहा सब कुछ है। उसने धन्‍यवाद किया। वह शायद जल्‍दी में थी उसने कहा कि उसे वापस जाना है चार बजे की ट्रेन है। प्रवीन ने कहा अभी तो टाइम है। चाय पीकर चले जाइएगा। महिला ने चाय के लिए मना किया। लेकिन प्रवीन के बार बार आग्रह करने पर वह चाय पीने के लिए रूक गई। अभी चाय आने में देरी थी। 

प्रवीन ने उसके परिवार के बारे में पूछा तो उसने बताया कि उसके पति की दो साल पहले एक हादसे में मत्‍यु हो गई थी। उसके परिवार में एक बूढ़ी सास है। मेरा एक ग्‍यारह साल का बेटा है। वह पांचवी कक्षा में पढ़ता है। घर की सारी जिम्‍मेदारी मुझे ही उठानी... पड़ती है। 

उसने बच्‍च्‍ो के फीस के लिए अपने रिश्‍तेदारों से उधार मांगा था। लेकिन सबने न होने की बात कहकर मना कर दिया। मैं काफी दिनों से परेशान... थी।

बहुत ही मिन्नत करने के बाद एक महीने की सैलरी एडवांस में मिली थी। कल शाम को मैं पता नहीं कैसे अपना पर्स टैक्सी में भूल गई। जब मैं ट्रेन में बैठ गई तब मुझे पर्स का याद आया। मुझे कुछ समझ में नहीं आ रहा था कि मैं क्या करूँ ? मैं रात भर सोई नहीं। सुबह जब मैनेजर का फोन आया तब मेरी जान में जान आई। आप लोगों का बहुत उपकार रहेगा मुझ पर.... इतना कहते ही उसके आंसू फिर गिरने लगे।

तभी प्रवीन की पत्‍नी चाय लेकर आ गई। उसने कहा, रोइये मत दीदी! अभी भी बिरजू भाईसाहब! जैसे लोग इस दुनिया में है। जिससे मानवता बची है। अब इन्‍हीं को देख लीजिए इन्‍होंने भी अपने दोनों बच्‍चों का एडमिशन कराने के लिए ब्‍याज पर पैसा उठाया है। अगर चाहते तो यह आपका पैसा रख लेते। अपना उधार चुका देते। लेकिन उन्‍होंने ऐसा नहीं किया। तभी बिरजू बोल पड़ा अरे नहीं भाभी!...अब मेरी इतनी तारीफ मत करो। मैंने भी अपने बच्‍चों का एडमिशन कैसे कराया है। मैं अच्‍छी तरह जानता हूं। मैम के दुख को मैं जनता हूँ। बिरजू की बात सुनकर फिर महिला के आंसू मिकलने लगे। प्रवीन की पत्‍नी ने उसे चुप कराया और बिस्किट का प्‍लेट उसकी तरफ बढ़ाया। महिला ने बहुत कहने पर एक बिस्किट लिया। उसने रूमाल निकाल कर अपने आंसूओं को पोछा। वह बिरजू की तरफ कृतज्ञता के भाव से देखने लगी। फिर...उसने अपना पर्स उठाया और सबको धन्यवाद कहा और वह.... वहां से चली गई।


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