rahul srivastava

Others


4  

rahul srivastava

Others


कला पत्थर सफ़ेद पत्थर

कला पत्थर सफ़ेद पत्थर

13 mins 23.9K 13 mins 23.9K

शाम ढल रही थी । साँझ की लालिमा लिए सूरज पश्चिम की तरफ अस्‍त हो रहा था। आकाश में पक्षियों का झुंड वापस अपने ठिकानों की तरफ लौट रहे थे। नदी अपने में मगन होकर हवा के साथ कदम ताल कर रही थी। किनारें नदी की धार के थपेडों से गुनगुना रहे थे। वहीँ रेत में कई दिनों से पडे एक डेढ फीट के दो पत्‍थर शांत और खामोशी से इस अनुपम सौंदर्य का आनंद ले रहे थे। ये काले और सफेद पत्‍थर पहाडों से नदी की धार में बहकर आए हैं। वहीं कुछ दूरी पर बच्चे खेल रहे थे। सूरज की आखिरी किरण भी जब मंद होने लगी बच्‍चे वहां से जाने लगे। धीरे धीरे रात की चादर बिछने लगी। झिंगुरुओं की घुंघुरुओं की आवाजें शांत वातावरण को अब और सुरीली बनाने लगीं।


तभी कानों को साफ करते हुए काले पत्‍थर ने धीरे से आँख खोली। आसपास देखने के बाद वह सफेद पत्‍थर की तरफ एकटक देखने लगा। उसने सोचा कि लगता है सफेद पत्‍थर ज्‍यादा ही डर गया है। उसने धीमी स्‍वर में उसे बुलाया "सुनो, भाई"!

सफेद पत्‍थर ने आँखों को हाथों से मलते हुए कहा, "क्‍या है?" 

काले ने बोला "तुम डर रहे हो क्या ? और यहां क्‍या कर रहे हो ? "

उबासी लेते हुए सफेदे पत्‍थर ने कहा " हाँ थोडा भयभीत हूं। पहाड़ों से नीचे आते समय मुझे बहुत चोट लगी है। पानी का वेग बहुत तेज था। कभी चटटानों के किनारों से टकराता कभी उपर से गिरता कैसे पहुंचा हूं यह मैं ही जानता हूं। अपनी सुनाओ तुम यहां कैसे पहुंचे ?"

काले पत्‍थर ने गहरी सांस लेते हुए अपनी आंखें बंद की। फिर थोड़ी देर बात ऑख खोलते हुए बोला "मैं भी एक बडे पहाड़ का समूह था। एक दिन पूरा पहाड़ हिलने लगा आसपास के सभी पहाड़ और पेड पौधे भी हिलने लगे। सभी ने चिल्‍ला कर कहा भूकंप आया है। सभी लोग एक दूसरे को कस के पकड़ लें। हमने कस के एक दूसरे को पकड़ लिया।लेकिन भूकंप से कंपन इतना तेज था कि पहाड़ों में दरार बन गई। मैने बहुत कोशिश की कस के पकड़ा रहूं। लेकिन दरार के कारण मेरी पकड़ ढीली पड़ गयी। मैं टूटकर अलग हो गया। 

अलग होने के बाद मैं नीचे एक छोटे पहाड़ के किनारे पर गिरा। उस पहाड़ के किनारे से मेरा भार नहीं सहन हो पाया और वह भी मेरे साथ उस नदी में गिर गया। पता नहीं वह अब कहां है।" इतना सुनते ही सफेद पत्‍थर की आंखें लाल हो गईं। वह जोर से चीखा "वह तुम थे जो मेरे ऊपर अचानक इतने वेग से गिरे कि मैं अपने आपको संभाल नहीं पाया।" सफेद पत्‍थर का गुस्‍सा देखकर काला पत्‍थर थरथर कांपने लगा। सफेद पत्‍थर का गुस्‍सा अभी शांत नहीं हुआ। वह क्रोध में बोला "मुझे याद है कि भूकंप के तेज कंपन से हम सभी बहुत डरे थे। मैने कस के दूसरे पत्‍थर को पकड़ा था। मुझे उम्‍मीद थी कि मैं नहीं टूटूंगा। लेकिन तुम मेर उपर अचानक इतने जोर से गिरे कि मैं खुद को संभाल नहीं पाया टूट कर अलग हो गया।" काला पत्‍थर जो कांप रहा था। वह शर्मिंदा था। वह कुछ बोल नहीं पा रहा था। उसने देखा कि सफेद पत्‍थर थोडा शांत है। तब उसने कहा "मुझे माफ कर दो भाई! मेरा तुम्‍हें तोडने का कोई इरादा नहीं था। वो तो भूकंप की वजह से ऐसा हुआ। इसमें मेरी कोई गलती नहीं है।" सफेद पत्‍थर का गुस्‍सा थोडा कम हुआ। उसने सोचा कि मैं इसे क्‍यों कोस रहा हूं। इसमें इसकी क्‍या गलती है। ये भी तो दुखी है अपने परिवार से अलग होकर। उसने प्‍यार से काले पत्‍थर से कहा तुम उदास मत हो। अब कोई कर भी क्‍या सकता है। थोड़ी देर तक वहां सन्‍नाटा छाया रहा।


सफेद पत्‍थर की जिज्ञासा अभी शान्‍त नहीं हुई थी। वह काले पत्‍थर की ओर देखा वह आगे की कहानी जानना चाह रहा था। उसने सन्‍नाटे को तोडते हुए काले पत्‍थर से कहा "तुम्हारेे साथ फिर क्‍या हुआ ?" इतना सुनते ही काले पत्‍थर की आँखों में आंसू आ गए। उसे इसका पछतावा हो रहा था। तभी सफेद पत्‍थर ने कहा" तुम कहां गुम हो गए भाई! अपनी कहानी तो पूरी करो।" काला पत्‍थर ने गहरी सांस ली फिर बोला "तुम्‍हारे ऊपर गिरने के बाद वहां से मैं नीचे नदी की तेज धार में गिरा। बहते बहते हुए एक झरने के मुहाने पर पहुंचा। वहां से पानी को नीचे गिरता देखा तो मैं डर कर पीछे मुड़ गया। तभी पीछे से नदी की एक बहुत तेज धार ने धक्‍का दिया और मैं पानी के साथ नीचे गिरता चला गया। नीचे गिरते समय मेरी आँखे बंद हो गई। मुझे बहुत जोर से चोट भी लगी। चोट असहनीय थी। मैं थक भी गया था पानी में बहते हुए कब नींद आ गई पता ही नहीं चला। पता नहीं कबसे यहां पडा हूं। अब जब तुमने आवाज लगाई तब मेरी नींद खुली।"


कुछ देर शांत रहने के बाद काले पत्‍थर ने चांद की तरफ मुंह कर पूछा "मित्र यह कौन सी जगह है।" सफेद पत्‍थर ने भी चांद की तरफ मुंह करके मासूमियत से कहा "मुझे भी नहीं मालूम मित्र यह कौन सी जगह है। लेकिन हाँ यहा कितनी शांति है। शीतल और मंद बयार कितना सुखद अहसास करा रही है । चाँदनी रात है। आकाश में तारे टिमटिमा रहे हैं। नीचे देखो तो लगता है। जमीन पर बिछी रेत के कण देखो कैसे चमक रहे हैं। मानो रेत पर किसी ने दर्पण लगा दिया है। आकाश के तारे यहां प्रतिबिंबित हो रहे हों। दोनों की बातों से उदासी भी महसूस हो रही थी।" देानों की बातों का सिलसिला काफी देर तक चलता रहा। जब वे उपर देखतें तो अपने बीते दिनों के बारे में सोचते लेकिन जब जमीन पर देखते तो भविष्‍य को लेकर सहम जाते। दोनों के मस्तिस्क में रह रह कर यह सवाल भी उठता कि अब उनका क्‍या होगा क्‍या वो इसी तरह पडे रहेंगे या फिर कोई और विपदा आनी शेष है। इसी उधेडबुन में दोनों बैठे थे। रेत के कण हवाओं के साथ उनके उपर उछल कूद कर रहे थे। दोनों इससे बडा आराम मिल रहा था।


इस सुखद अहसास की अनुभूति के बीच उन्‍हें कुछ लोगों के चलने आवाज सुनाई दी। तीन से चार लोग उनकी तरफ आ रहे थे। जब वह करीब आ गए तो साफ दिख रहा था कि चार लोग थे। उनकी बातों से लग रहा था कि वह टूरिस्‍ट हैं। उसमें से एक कैमरा निकालकर फोटो खींचने लगा। बाकी अपना बैग नीचे रख कर वहीं पास में बैठ गए। एक जो बाकियों से थोडा मोटा था वह रेत में लेट गया। वह हाथों को तकिया बनाकर करवट हुआ। उसके हाव भाव से लग रहा था कि उसे बहुत आराम मिल रहा है। तभी उसके मुँह से निकला "आह! कितनी सुंदर जगह है। आज अगर हम यहां नहीं रुकते तो इतना अदभुत नजारा नहीं देख पाते।" बाकी दोनों साथियों ने भी उसकी बात का समर्थन करते हुए बोले "सही कर रहे हो यार। अगर दिन में रास्‍ता बंद नहीं हुआ होता तो हम कहां अद्भुत सौंदर्य को देख पाते।" तभी एक जो उनमें कद में सबसे छोटा उसने बात काटते हुए कहा कि "मै बहुत परेशान हूं। शहर में आज हुए दंगे में बहुत लोग प्रभावित हुए हैं। कई निर्दोष लोगों की जान चली गई। सुना है महिलाएं और बच्‍चे भी मारे गए गए हैं।" उनकी बातों को सुनकर दोनों पत्‍थर सहम गए। वह उनकी बातों को और ध्‍यान से सुनने लगे। तभी एक टूरिस्‍टर जो काफी देर से शांत बैठा था। उसने कहा कि यह दंगे तो हर देश में किसी न किसी रूप में होते रहते हैं। यह होता इंसानों के बीच ही है लेकिन ये अलग अलग तरह के होते हैं। कहीं यह दंगा धर्म को लेकर कहीं अमीर गरीब लेकर। दोनों पत्‍थर भी और ध्‍यान से उनकी बातें सुनने लगे।


लेटे हुए टूरिस्‍ट को उसकी बातें समझ में नहीं आईं तो उसने विस्‍तार से समझाने के लिए कहा। तब उसने कहा कि "अब अमेरिका में देख लो जो कि दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश है। क्‍या वहां दंगे नहीं होते हैं। वहां वर्षो से दंगा इंसान के रंग को लेकर है। यानि की काले और सफेद के बीच। यहां सफेद जिनको गोरा कहा जाता है वह कालो से नफरत करते हैं। इस नफरती दंगे का नाम रंगभेद है।" इतना सुनते ही काले और सफेद पत्‍थर अपने रंग को देखने लगे और डर से कापने लगे। वे और ध्‍यान से उनकी बात सुनने लगे। वह टूरिस्‍ट फिर कहने लगा "यह केवल अमेरिका में ही नहीं विश्‍व के तमाम देशों में रंगभेद को लेकर झगडे और लडाइयां होती रहती हैं। हर साल दंगों में पूरी दुनिया में सैकडों मासूम लोग मारे जाते हैं।" तभी फोटो खींचने गया युवक लौट आया। वह अपने कैमरों में खींची तस्‍वीरों को सभी को दिखाने लगा। थोडी देर सब वहीं बैठे रहे और बातें करते रहे। फिर वहां से चले गए। उनके जाने के बादा दोनों पंत्‍थर और उदास हो गए। उनकी बातें सुनकर उन्‍हे अपना भविष्‍य अंधकारमय लगने लगा। दोनों ने आखें बंद कर ली और मन ही मन टूरिस्‍टों की रंगभेद की बातों को लेकर भविष्‍य की रेखाएं खींचने लगे।


सूरज की पहली किरणों का छोटे छोटे पौधे और उनपर नींद में आधी पलके खोले रंग बिरंगे फूलों ने खिलखिलाते हुए स्‍वागत किया। अलसाते हाते हुए दोनों पत्‍थरों ने भी आंखें खोली। उन्‍होंने देखा कि कुछ लोग नदी में स्‍नान कर रहें है। सूरज धीरे धीरे उपर उठ रहा था। वह भी प्रभात की गुलाबी धूप में चमक रहे थे। तभी वहां कुछ बच्‍चे पहुंच गए। वे सब वहीं रेत में खेलने लगे। कभी रेत में गोल निशान बनाते आडी तिरछी लाइने खींचते हुए बच्‍चों खेलते हुए देखना दोनों पत्‍थरों को बहुत अच्‍छा लग रहा था। रात में टूरिस्टों की बात सुनकर उनके माथे पर जो चिंता की लकीरें थीं बच्चों को देखकर दूर हो गईं। धीरे धीरे धूप तेज हो गई। बच्‍चे बहुत थक गए थे। सब वहां से चले गए। वहां एक खामोशी छा गई। खामोशी का तोडते हुए सफेद पत्‍थर ने कहा बचपन कितना आजाद होता हे। न कोई बन्‍धन न कोई जिम्‍मेदारी । काले पत्‍थर ने भी उसकी हां में हां मिलाई और कहा मैं तो इनके चेहरों की हँसी देख रहा था। खेलते हुए इनमें कितना उमंग था। मैं भी जब उपर पहाड़ों से जुडा था तो मुझमें भी कोई भय ओर चिंता नहीं थी। मैं बाहें फैलाकर पास से गुजर रहे बादलों को छूने की कोशिश करता था। हवाएं उसे दूर ले जाती थी। खेल खेल में हम बादलों को पकड़ने का प्रयास करते थे। कितने सुकून भरे दिन थे वो दिन। आगे हमारा क्‍या होगा पता नहीं। सफेद पत्‍थर भी उसकी बातों को सुनकर अपने अतीत में खो गया।


दोनों पत्‍थर रेत में पडे हुए भविष्‍य की कल्‍पना में खोए हुए थे। वहां कुछ लोग आए दोनों को उठाने लगे। हाथों के स्‍पर्श से उनको एक सिहरन से हुई। उन्‍होंने देखा कि कुछ लोग उन्‍हें उठाकर ले जा रहे हैं। वह भय से कांप रहे थे उनके दिमाग में टूरिस्‍टों की बात घूम रहीं थी। कई आशंकाए दोनों के मन में चल रहीं थी। आदमियों ने पत्‍थरों को ले जाकर एक जगह पर रख दिया। वहाँ कई सारे पत्‍थर थे। दो आदमी इन पत्‍थरों को तोड़ रहे थे। अब तो इनकी आशंकाए सच लगने लगी। यह सब देखकर वह अवचेतन हो गए। कब रात हो गई इन्‍हें पता ही नहीं चला। इसी तरह पड़े पड़े एक हफ़्ता बीत गया। रोज सुबह ठक ठक की आवाज आती शाम को बंद हो जाती। दोनों को वहाँ क्या हो रहा है पता ही नहीं।


एक दिन बड़े जोर से टन की आवाज हुई। तेज आवाज से कई दिनों से मूर्छित काले पत्‍थर में चेतना लौट आई। उसने आखें खोली तो समाने देखा एक बडा सा घंटा हिल रहा था। उसकी गूंज दिवारों से टकराकर मंद हो रही थी। वहां एक आदमी कुछ बुदबुदा रहा था और काले पत्‍थर के ऊपर जल गिरा रहा था। उस आदमी ने काले पत्‍थर को अच्‍छी तरह से साफ करके नहलाया। फिर उसने फूलों की माला पहनाई कुछ पत्‍ते रखे। इसके बाद उसने लोटे से दूध उसके उपर गिराया। उसने देखा कि एक एक करके कई लोग आए। किसी ने लोटे से जल किसी ने दूध उसके उपर गिराया। उन्‍होंने हाथों से काले पत्‍थर को स्‍पर्श करके उसी हाथ को अपने माथे पर लगाया। ऐसा बड़ी देर तक चला। काला पत्‍थर इससे थोडा सहमा भी हुआ था। आंखे खोलकर वह सफेद पत्‍थर को खोजने की कोशिश करता। वह सफेद पत्‍थर को अपने पास न देखकर परेशान हो गया। तब भी वह अथक प्रयास करके थोडी आंखें खोलकर उसे खोजता। मन ही मन सोच रहा था कि यह कब खत्‍म होगा और मैं अपने दोस्‍त को ढूढ पाउंगा। 


काफी देर बाद वहां से सभी लोग चले गए। वहां सन्‍नाटा छा गया। तब काले पत्‍थर ने आंखें खोली और चारो ओर सफेद पत्‍थर को खोजने लगा। उसे सफेद पत्‍थर कही नहीं दिखा। वह सोचने लगा कि दुख के समय में मिला दोस्‍त पता नहीं कहां चला गया। उसके मन में कई सवाल उठ रहे थे। यही सब सोच कर उसके मन में बुरे ख्‍याल आ रहे थे। 

तभी "मित्र... मित्र...." की आवाज उसे सुनाई दी। जानी पहचानी आवाज सुनकर वह इधर उधर देखने लगा। तभी फिर आवाज़ आई कि "सामने की दिवार पर उपर देखो"। उसने उपर दिवार पर देखा तो वहां सफेद पत्‍थर था। उसे देखकर उसकी आँख में आंसू आ गए। ये अपनापन लिए हुए खुशी के आंसू थे। उसने लड़खड़ाते स्‍वर में उससे पूछा "तुमको मैं बड़ी देर से ढूंढ रहा हूं। मन सशंकित हो रहा था कि तुम्‍हारे साथ क्‍या हुआ होगा। लेकिन तुम सुरक्षित हो दिल को बहुत सुकुन मिला।" सफेद पत्‍थर को भी काले पत्‍थर को देखकर उतनी ही खुशी हुई जितनी काले पत्‍थर को हुई थी। काले पत्‍थर ने पूछा तुम वहां कैसे पहुंच गए। सफेद पत्‍थर ने कहा यही तो बताने जा रहा था तभी तुमने पूछ लिया। "मै यहां कैसे ऊपर पहुंचा यह तो मुझे नहीं मालूम। हाँ, थोडी देर पहले लाउडस्‍पीकर की आवाज से मेरी आँखे खुली। मैंने अपने आपको यहां पाया। तुम्‍हारी याद आई। तुम्‍हे आसपास ढूढने लगा। तब मेरी नजर बगल में खुली जगह पर एक पंडाल पर गई। उसमें बहुत लोग बैठे हैं। सामने बडी सी टीवी की तरफ सब देख रहे थे। मैं भी टीवी देखने लगा। टीवी पर मैंनेे देखा मंदिर के अंदर कुछ लोग एक काले पत्थर के ऊपर जल और दूध गिरा रहें हैं। मैंने और ध्‍यान से देखा तो वह तुम थे। इसी बीच मंदिर के बाहर का दृश्य दिखाने लगे। मैं भी उत्सुक होकर देख रहा था। टीवी पर जब मंदिर के दरवाजे को दिखा रहे थे तब मैंने एक पत्थर देखा जिसपर लाल रंग से बड़े अक्षरों में " शिव मंदिर" लिखा था। लेकिन पत्थर पर बनी अपनी धारियों को मैं पहचान गया कि यह मैं ही हूं। उसके बाद तुम्‍हें खोजते हुए अंदर झांका तो तुम दिख गए। उसमें कोई बोल रहा था कि यह नदी के किनारे स्थित गांव का नया शिव मंदिर है। अब लोगों को भगवान शिव की पूजा करने के लिए दूसरे गांव नहीं जाना पडेगा।"


यह सुनकर काला पत्‍थर थोडा निश्चिंत हुआ। दोनों पत्‍थरों में भविष्‍य को लेकर जो डर था। अब काफी कम हो गया था। यह दोनों की बातों से महसूस हो रहा था। दिन भर दोनों बाहर चल रही गतिविधियों के बारे में चर्चा करते रहे। बीच बीच में कोई आ जाता तो दोनों चुप हो जाते। आज दोनों बहुत चहक रहे थे और खुश भी थे। बातें करते करते कब अंधेरा हो गया उन्‍हें पता ही नहीं चला। थोड़ी देर बाद किसी ने आकर वहां दिया जला दिया। जिसकी छोटी सी लौ में दोनों कठिनाई से एक दूसरे को देख पा रहे थे। लेकिन प्रसन्न थे। अब दोनों के बीच में एक नया साथी "दिया" भी आ गया था। दिया शांत था और अपनी छोटी सी लौ से पूरे कमरे के चारों कोनों में पहुंचने की कोशिश कर रहा था। तभी कोई आया और हाथ जोड़कर कुछ देर खड़ा रहा फिर वह दरवाजा को बाहर से बंद करके चला गया। दिया जब तक तेल था जलता रहा। अंत में उसकी लौ फड़फड़ाने लगी मानो वह अभी और जलना चाह रही हो। तभी उसकी लौ तेज होकर बुझ गई। कमरे के अंदर घुप अंधेरा छा गया। तब दोनों पत्‍थर भी बात करते करते कब सो गए। पता ही नहीं चला।


 



Rate this content
Log in