दर्द के बाद -नई शुरुआत
दर्द के बाद -नई शुरुआत
मुकेश के जाने के बाद मीरा बिलकुल अकेली हो गई थी और साल भर की नन्ही नयना कि भी सारी ज़िम्मेदारी अब उस पर ही थी। अब भी जब वह ख़ाली बैठती है तब उस गाड़ी की कर्कश आवाज़ सुनाई दे जाती है जो उसे भीतर तक डरा जाती है।
बात कुछ छः सात महीने पहले की है। मुकेश और मीरा नन्ही नयना को प्राम में लेकर, रात के खाने के बाद बाहर सड़क पर घूमने निकले थे। यूँ ही दोनो को उस रात खाना खाने के बाद क़ुल्फ़ी खाने का मन किए और दोनो नन्ही नयना के साथ निकल पड़े थे। लेकिन किसे पता था कि मुकेश आज घर से वापस नही आने के लिए निकल रहा है। अभी घर से थोड़ी दूर ही बढ़े होंगे दोनो की अचानक एक ट्रक तेज़ी से कर्कश हॉर्न बजाता हुआ और बदहवासा भागता सामने वाली मोड़ से आया और मुकेश को अपने नीचे घसीटता हुआ आगे तक ले गया। आगे जा कर सामने वाली इमारत से टकरा गया। पल भर में मीरा की आँखों के सामने खून से लटपथ निश्चेत मुकेश पड़ा था। अपनी चीख भी उसे धीमी सि लग रही थी। गोद में नयना और सामने मुकेश ऐसी हालत में।
जुटी हुई भीड़ ने मुकेश के अस्पताल जाने का इंतज़ाम किया। अस्पताल में मुकेश को मृत घोषित किया गया। मीरा पर मानो दुखों का पूरा बादल ही टूट पड़ा था। वह अपने माता-पिता की अकेली संतान थी और माता-पिता का देहांत दो साल पहले हो गया था। सास-ससुर आए और बेटे के सारे संस्कार पूरे कर वापस चले गए यह कहते हुए की अब जब मुकेश ही नही तो उनका कैसा रिश्ता। मुकेश की मीरा से शादी के ख़िलाफ़ थे मुकेश के माता-पिता। बस बेटे के मोह से उन्होंने मीरा को मान दिया था। यह मीरा भी अच्छे से जानती थी।
मुकेश की जितनी जमा-पूँजी थी, इन साथ महीनों में उससे ही घर की खर्चे चाल रहे थे और वह पूँजी भी धीरे धीरे ख़त्म हो रही थी। मीरा को समझ ही नही आ रहा था की वह क्या करे।
वहीं उसे अकेली देख, आए दिन मुकेश के अफिस के दोस्त सहानभूति दिखने घर आ जाते, लेकिन नज़र कभी भी साफ़ नही होती। मीरा असहज हो जाती, फिर भी बरदस्त करती क्योंकि इन लोगों ने ही मुकेश के पैसे कम्पनी से निकलवाने में मदद की थी।
उस दिन तो हद ही हो गई जब मुकेश का ख़ास दोस्त मीरा के सामने शादी का प्रस्ताव राख दिया। नयना की परवरिश और अकेले ज़िंदगी बिताने की कठिनाई को बताते हुए उसने कहा की मीरा क़्यों नही उससे शादी कर लेती है। वह उसे नयना के साथ अपनाने को तैयार है। मीरा सकए में आ गई। उसे कुछ समझ नही आया और उसने उसे तुरंत निकल जाने को कहा।
मीरा बहुत ही ज़्यादा चिंतित थी। मीरा ने तो जैसे-तैसे करके स्नातक तक की पढ़ाई की थी और ऐसे में नौकरी मिल पाना भी बहुत ही कठिन था। सहारा के लिए कोई भी साधन नही था उसके पास। ऐसे में उसने बहुत सोंचने के बाद एक फ़ैसला लिया की अब वह नई शुरुआत करेगी अपने लिए और अपनी बेटी नयना के लिए। मीरा को खाना बनाना बहुत अच्छा लगता था इसलिए उसने टिफ़िन सर्विस की शुरुआत करने की सोंची। शुरुआत दो लोंगो को टिफ़िन देने से करी और कड़ी मेहनत से सफलता मिली अब लगभग पचास टिफ़िन थे उसके पास। काम और बढ़ाया अब छोटी केटरिंग भी करने लगी। बहुत सी मुश्किलें आई लेकिन सबका डट कर मुक़ाबला किया। आज “ मीरा की रसोई” शहर की नामचीन रेस्टरेंटो में से एक है। अब भी जब कोई कठिनाई सामने आती है मीरा मन में दोहराती है “ मैं कमजोर नही हूँ” और यही अपनी बेटी नयना को सिखाती है।
