दोस्त
दोस्त
उस मुस्कान में एक गजब का सानिध्य था। ट्रेन एक स्टेशन पर रुकी हुई थी और यात्रियों के चढ़ने उतरने से अफरातफरी मची हुई थी। उसका भी ध्यान किताब से हट कर डिब्बे के हलचल पर चला गया। इसी में सामने बर्थ पर उसे वह मुस्कान दिखी। "इसे पता नहीं है कि मेरी उम्र कितनी है जो यह मुझे देख मुसकुरा रहा है " यह सोचते हुए वह मन ही मन खुश भी हो रही थी। उस मुस्कान में कोई उच्छृंखलता नहीं थी, तो उसे कोई अनजान भय भी नहीं महसूस हुआ।
तभी उस लड़के ने उसके हाथ में किताब की ओर इशारा करते हुए कहा यह बहुत ही रोचक किताब है। उसकी सारी खुशफहमी दूर हो गई। आकर्षण किताब का था उसका नहीं। और ऐसा पहली बार नहीं हुआ था, दुबई एअरपोर्ट पर भी एक अनजान व्यक्ति ने उससे बातचीत में दिलचस्पी दिखाई थी सिर्फ़ उसके हाथ में एक विख्यात लेखक की किताब देख कर। कभी कभी वह किताबों को अखबार से कवर कर देती थी अनचाही बातचीत से बचने के लिए।
फिलहाल तो वो लड़का उसे उसी विषय पर अन्य लेखकों की रचनाओं के बारे में बता रहा था। और वह भी इतनी चाव से सुन रही थी जैसे वर्षों से पहचान हो। इस दुनिया में कई छोटी छोटी दुनिया है और जो एक तरह की किताबें पढते हैं वो एक ही दुनिया के बाशिंदे होते हैं और एक दूसरे को भीड़ में भी पहली बार देखते ही पहचान लेते हैं।
ट्रेन के साथ साथ उनकी बातचीत भी आगे बढी, किताब के दायरे से बाहर, दुनिया और समाज का विशलेषण।
फिर अपने अपने बर्थ पर फिर अपने किताबों की दुनिया में खो गये, जो नींद में मिल गई। आँख खुली तो वह जा चुका था। कोई बात नहीं, फेसबुक पर तो फिर मिल ही जाएगा। अरे , धत ! नाम तो पूछा ही नहीं !
फेसबुक ने तो सब रिश्तों को एक ही नाम दे दिया 'दोस्त ' पर उन अनकहे रिश्तों को का क्या नाम होता है जो एक ही तरह की किताबें पढ़ते हैं ?
