दो बच्चों की माँ
दो बच्चों की माँ
वो माँ है.... दो मासूम डरे-सहमे हुऐ बच्चों की माँ.... जिसके बच्चों का पिता अपनी माँ की पुकार पर सरहदों पर डटा है। लाखों करोड़ों लोगों की मां की रक्षा की जिम्मेदारी उसके दो बच्चों के पिता ने भी ली है।
वो बार-बार समझाती है, अपने दोनो बच्चों को, उनके पिता का जन्म एक बड़े उद्देश्य के लिए हुआ है। वो अकेली ही काफी है उन दोनो के लिये... पर दशहरे-दिवाली, होली पर उसके बच्चों को अपने पिताजी की कमी बहुत खलती है। जब भी पिता घर आते है, तब ही उनके घर त्यौहार सी खुशियाँ आती है।
वो माँ आज ले आयी है अपने दोनो बच्चों को, जगतजननी माँ के दरबार में.... शायद बच्चों को यहाँ कुछ त्यौहार की खुशियाँ मिल जाए !
विराट पंडाल, विशाल प्रतिमा और चमकते चेहरे, सम्मोहित सी चुप खड़ी सब देख रही थी। दंग रह गई थी वो ....सब ही माँ से कुछ ना कुछ माँगने आये है यानी इतनी चमक दमक के पीछे भी दुःख उपस्थित है...
किसी का तन स्वस्थ नही हैं, किसी का मन.... कोई अपने रिश्तों मे उलझ कर दुःखी है, कोई अपने अकेलेपन से। किसी का दिल पैसो की कमी से टूट गया और कोई पैसो की गर्मी से व्याकुल है....सैकड़ों अपना मनचाहा मांगने के लिए भीड़ में खड़े है। ओह्ह....कितना कष्ट है इस संसार में।
वो दो बच्चों की माँ, जगतजननी दुर्गा माँ से, भारत माँ के लाल की सलामती की दुआएँ माँग कर लौट गयीं।
