दीवाली और दिवालियापन
दीवाली और दिवालियापन
संयुक्त परिवार में रहना कितना सुखद हो सकता है इसका अंदाजा मेरे पड़ोसियों को देख कर मुझे हो गया था |तीन बेटे व बहुओं वाले परिवार में, सभी एक पर एक सुन्दर थे |पर जैसा आप सब जानते हैं, प्रकृति के अपने नियम हैं|अक्सर मुखरा बीवी को शांत पति व शांत पत्नी को बड़बोला पति नसीब होता है, यहाँ भी यही हुआ था |
बड़े भैया,बड़े ही बातूनी व सबसे ज्यादा शौक़ीन थे |उन्हें देवानंद सा सदाबहार इंसान कह सकते हैं |उनकी पत्नी पड़ले दर्जे की मुर्ख स्त्री थीं |एक स्त्री होने के नाते यह कहना उचित नहीं जान पड़ता हैं पर उन्होंने अपना दिमाग इस्तेमाल ही नहीं किया था| पति की आज्ञा पालन करने वाली 21वीं सदी में, २०वीं सदी की नारी थीं |मंझले भैया धीर -गंभीर व शांत चित्त तो उनकी पत्नी बेहद स्मार्ट व इंटेलीजेंट थीं|उनका दिमाग उन्हें चुप ना रहने देता |छोटे भाई बिलकुल शहरी हीरो से थे और उनकी धर्मपत्नी गावँ की हिरोइन|
हमारे मोहल्ले में होली -दिवाली मिलने का बड़ा अच्छा रिवाज था |तीनो भाईयों में से दो छोटे भाई तो पुलिस अधिकारी थे |अतः होली- दिवाली थाने व ड्यूटी के नाम थीं |पर बड़े भैया बड़े शौक से दिवाली की शॉपिंग करते |जिसमें आधा बजट अपनी पत्नी की साडी पर खर्चते |उनकी दिली तमन्ना यही रहती कि उनकी बेगम मोहल्ले की ब्यूटी क़्वीन कहलाएँ| इस बार दसहजार की मरून बनारसी शिफॉन उठा लाये |साडी वाकई बहुत सुन्दर थी| बाकि दोनों बहुओं को भी दिखाया गया |दिल ही दिल में बहुत पसंद आया पर ऊपर से किसी ने तारीफ ना की |बस माधवी दीदी का तो मुंह ही उतर गया था |तुरंत भैया के पास शिकायत कर आयीं|
"सुनोजी! कोई खास ना हैं ये साडी! मंझली -छोटी देख कर मुंह बना रहीं थी |"अब भैया बड़े परेशान हो गए |धर्मपत्नी नाराज होगी तो त्यौहार का भला क्या मजा रह जायेगा |मंझली तो सबसे स्मार्ट थी |उसने एक बनारसी बॉर्डर खरीद कर सुनहली नेट की साडी में जुड़वा लिया |उसकी साडी बेशकीमती लगने लगी |छोटी डॉली, उन्हें जलाने के लिए रेशमी सलवार सूट ले आयीं|बस इस बार तो मानों सब खार खाके बैठे थे कुछ भी हो जाये ,जलेंगे नहीं बल्कि जलाएंगे !
दिवाली की सुबह से पूजा पाठ, पकवान की तैयारियां चल रही थीं| माधवी भाभी मुंह बनाये ,निशा भाभी के आगे -पीछे हो रही थीं |निशा भाभी को सब समझ में आ रहा था कुछ तो साडी फेर-बदल की सोच रही हैं और वही हुआ |
"तुम गेहुंए रंग की हो निशा तुम पर मैरून बनारसी खूब जंचेगी |"
"अच्छा !"निशा अनजान बनती हुयी बोली |
"तुम अपनी सुनहली नेट की साडी मुझे दे दो और तुम मेरी बनारसी पहन लो| "
"नहीं दीदी !आपकी इतनी मंहगी साडी कहीं हमसे ख़राब ना हो जाये ?"
"अरे कुछ नहीं होगा तुम बच्ची थोड़े ही हो ?"
" मैं बच्ची नहीं !पर मेरे बच्चे पठाखे फुलझड़ियां चलाएंगे उन्हें तो नहीं रोक सकती .......!"
पर जाने क्या हुआ था उन्हें| दिवाली की अमावस काली रात में सोन परी बन मटकने का मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहती थी या फिर सचमुच भैया ने ये आइडिया सुझाया था |उन्होंने अगला दाँव खेला |
"देख मंझली ! मेरी ना मानना हैं तो मत मान !पर ये तेरे बड़े भैया का आदेश है |उन्हें मेरे दूधिया रंगत पर सुनहली साडी ही अच्छी लगती हैं |हमने बहुत ढूंढा मार्केट में |आउट ऑफ़ स्टॉक थी |तुम्हे मुझसे साडी बदलनी ही पड़ेगी।
अँधा क्या चाहे दो ऑंखें !एक 2500 की लागत के बदले १०००० की साड़ी मिल रही थी |निशा ने हामी भर दी |छोटी ने खुद को इस प्रतियोगिता से अलग रख उन दोनों की साडी के हेरा -फेरी के खूब मजे लिए |सब सजधज के दिवाली मिलने निकले |मंझले व छोटे भैया अपनी ही दुनिया में मस्त पुलिस गाड़ी से उतरे.........
बड़ी भाभी वाक़ई सोने की जीती -जागती दुकान लग रहीं थीं | पर सबका ध्यान बाकि दोनों बहुओं पर था |मंझली पर मरून साड़ी बहुत जँच रही थी |निशा (मंझली) की ख़ुशी का ठिकाना ना था |पहली नज़र में जिस साड़ी पर दिल आ गया था वो पहन कर फूली ना समा रही थी |इतनी महँगी साड़ी बिना ड्राईक्लीन के तो लौटाएगी नहीं |इस बीच के सारे त्योहार व रिश्तेदारों के घर घूमना निपटा लेगी | इधर माधवी भाभी व बड़े भैया तो हाथ मलते ही रह गए|पति के बटुुए को खााली करके भी बेेेचैन ही थी पैसे भी गए, साड़ी भी गयी और उन्हें देख मेरा मन ये गाना गाने लगा था :- "ना खुदा ही मिला ना मिसाल -ए -सनम, ना इधर का रहे, ना उधर के रहे.............
छोटी सबसे समझदार थी। उसको इनके तरह सुन्दर दिखने व दिखाने का शौक ना था। उसने नया मोबाइल फोन खरीदा और इस यादगार दीवाली की ढेरों तस्वीरें कैद कीं।
कई बार दूसरों से तारीफ पाने की धुन में हम इतने बावले हो जाते हैं कि अपनी प्राथमिकताएं ही भूल जाते हैं |अति हर चीज़ की बुरी होती है अतः त्योहारों पर दिखावे में ना पड़ें !खुशियां मन के अंदर हैं उन्हें जगाएं और सच्चा आनंद पाएं !
