STORYMIRROR

chandraprabha kumar

Action Classics Inspirational

4  

chandraprabha kumar

Action Classics Inspirational

दीपोत्सव लक्ष्मी गणेश पूजा

दीपोत्सव लक्ष्मी गणेश पूजा

4 mins
252

दीपावली का त्यौहार मनाने के सम्बन्ध में अनेक मान्यतायें और कथायें हैं, जिसमें सबसे ज़्यादा प्रचलित कथा ये है कि जब भगवान् श्रीराम रावण को मारकर सीताजी सहित अयोध्या आये, तो इसी दिन उनका भव्य स्वागत के साथ राजतिलक किया गया था ।श्रीराम के वनवास से लौटने की इस ख़ुशी में अयोध्या के नर -नारियों ने अपने अपने घर में दीपोत्सव मनाया था।तबसे यह रोशनी का पर्व बन गया। 

 दीपोत्सव श्रीराम कथा के बहुत पहले से भी मनाया जाता था। इस दिन भगवान् विष्णु द्वारा बलि राज को पाताल का राजा बनाया गया था ।इससे इन्द्र ने स्वर्ग को सुरक्षित जानकार स्वर्ग में दीपोत्सव मनाया था। 

भारत एक कृषि प्रधान देश है। मानव की मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति कृषि से होती है। इस समय देश के कृषकों के घर नया अन्न आता है, जिसकी ख़ुशी में दीपक जलाए जाते हैं।

ऐसी भी कथा आती है कि चतुर्दशी के दिन भगवान् कृष्ण ने नरकासुर राक्षस का वध किया था, जो अत्यन्त अधर्मी, अत्याचारी तथा क्रूर कर्मी था। तब सम्पूर्ण जनता ने आनंदित होकर दीपोत्सव मनाया था। 

कहा जाता है कि इसी दिन राजा चन्द्रगुप्त विक्रमादित्य ने अपने विक्रमी संवत् की स्थापना की थी। और धर्म, गणित, ज्योतिष के दिग्गज विद्वानों को आमंत्रित कर यह मुहूर्त निकलवाया था कि नया संवत् चैत्र शुक्ल प्रतिपदा से माना जाए। 

दीपावली के दिन माता लक्ष्मी व गणेश जी की पूजा होती है। ऐसा क्यों किया जाता है इसके सम्बन्ध में भी कई कथायें हैं। लोक मान्यता के अनुसार वनवास से लौटने पर भगवान् राम ने सबसे पहिले भगवान् गणेश व लक्ष्मी की पूजा की थी। तभी से दीवाली पर लक्ष्मी गणेश की पूजा करने की परम्परा शुरू हुई। 

 कार्तिक मास की अमावस्या तिथि को माता लक्ष्मी का प्राकट्य दिवस माना जाता है । देवताओं और राक्षसों के प्रयास से समुद्र मन्थन हुआ तो इसमें कार्तिक मास की त्रयोदशी के दिन ही भगवान् धन्वंतरि निकले इसलिए धनतेरस मनाई जाती है। और अमावस्या के दिन माता लक्ष्मी बाहर आयीं इसलिए हर साल कार्तिक मास पर माता लक्ष्मी की पूजा होती है। 

दीवाली का त्यौहार चातुर्मास के दौरान आता है । इस बीच श्रीहरि योगनिद्रा में होते हैं। उनकी निद्रा भंग न हो इसलिये दीवाली के दिन लक्ष्मी माता के साथ उनका आवाहन नहीं किया जाता । ऐसे में माता लक्ष्मी अपने दत्तक पुत्र गणेश जी के साथ घरों में पधारती हैं। 

मॉं लक्ष्मी धन और ऐश्वर्य की देवी हैं। धन ऐश्वर्य ज्यादा आ जाये तो अहंकार हो जाता है। अहंकार के चलते मनुष्य धन को संभाल नहीं पाता । गणपति बुद्धि के देवता है ।जहाँ गणपति का वास होता है वहॉं संकट टल जाते हैं और सब कुछ शुभ ही शुभ होता है। धन का सदुपयोग करने की क्षमता विकसित होती है। इसलिए लक्ष्मी जी के साथ गणेश जी का पूजन किया जाता है कि घर में लक्ष्मी का वास हो और शुभता व समृद्धि बनी रहे। 

माता लक्ष्मी कैसे क्षीर सागर से प्रकट हुईं, इस बारे में कथा कही जाती है। एक बार माता लक्ष्मी अपने महालक्ष्मी स्वरूप में इन्द्रलोक में वास करने पहुँचीं ।माता की शक्ति से देवताओं की शक्ति बढ़ गई। इससे देवताओं को अभिमान हो गया कि अब कोई उन्हें पराजित नहीं कर सकता।

एक बार देवराज इन्द्र अपने ऐरावत हाथी पर सवार होकर जा रहे थे, उसी मार्ग में ऋषि दुर्वासा जी भी माला पहनकर गुज़र रहे थे। इन्द्र ने उन्हें नमस्कार किया तो प्रसन्न होकर ऋषि दुर्वासा ने अपनी माला फेंककर इन्द्र के गले में डाली। लेकिन इन्द्र उसे संभाल नहीं पाये और वह माला ऐरावत हाथी के गले में पड़ गई। हाथी ने सिर हिलाया तो वह माला ज़मीन पर गिर गई और हाथी के पैरों के नीचे आ गई। माला का यह अपमान क्रोधी ऋषि दुर्वासा सहन नहीं कर पाये और नाराज़ हो गये। 

ऋषि दुर्वासा ने इन्द्र को शाप दिया कि-“ जिस लक्ष्मी के कारण तुम इतना अहंकार कर रहे हो, वह पाताल लोक चली जाये। “

ऋषि दुर्वासा के इस शाप के कारण माता लक्ष्मी पाताल लोक चली गईं। लक्ष्मी के चले जाने पर देवता कमजोर हो गये। और दानव प्रबल हो गये। 

तब जगत् के पालनहार नारायण ने महालक्ष्मी को वापिस बुलाने के लिये समुद्र मन्थन कराया। दैत्यों और देवों के प्रयास से समुद्र मन्थन हुआ, तो उसमें से चौदह रत्न प्रकट हुए और कार्तिक मास की अमावस्या के दिन लक्ष्मी बाहर आयीं। इसलिए इस दिन इनकी पूजा विघ्नहर्ता गणेश जी के साथ होती है। 

कार्तिक मास भगवान् विष्णु का प्रिय महीना है। इसी महीने भगवान् विष्णु योगनिद्रा से जागते हैं और सृष्टि में आनन्द व कृपा की वर्षा होती है। इसी महीने लक्ष्मी धरती पर भ्रमण करती हैं और भक्तों पर कृपा करती हैं। भगवान् विष्णु इस मास में नारायण रूप से जल में निवास करते हैं। धार्मिक लोग कार्तिक मास में सूर्योदय से पूर्व स्नान करते हैं। और तुलसी पर दीपक जलाते है। 

धन तभी उपयोगी और वरदान बनता है, जब किसी के पास इसका उपयोग करने के लिये बुद्धि व विवेक हो। शाश्वत सुख प्राप्त करने के लिये व्यक्ति को आध्यात्मिक धन की आवश्यकता होती है। 


Rate this content
Log in

Similar hindi story from Action