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Ragini Pathak

Inspirational


4.5  

Ragini Pathak

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देश की सेवा सर्वोपरी

देश की सेवा सर्वोपरी

6 mins 390 6 mins 390


"अमर!अमर,कहाँ है?इधर आओ अभी इसी वक्त"गुस्से में गरजती आवाज में अपने बेटे को पुकारते हुए रघुनाथजी अपने घर के अंदर घुसे। उनके गुस्से से पूरा का पूरा घर हिल गया,


लेकिन सोफे पर बैठा उनका बेटा अमर टस से मस नही हुआ। उसको देखकर ऐसा लग रहा था जैसे अपने पापा को वो सुनकर भी अनसुना कर रहा हो उसको कोई फर्क ना पड़ता हो उनकी बातों सेडर के रसोई से भागती हुई अमर की माँ रमा जी आयी।


रमा-"क्या हुआ जी इतने गुस्से में क्यों है"


"मुझसे क्या पूछती हो अपने नवाब जादे से पूछो,आजकल नया शौक पालकर रखा है अपने पड़ोसी शर्मा के घर सब्जियां और जरूरत के सामान बाजार से खरीद के घर तक पहुंचा कर आते है और अपने घर मे नवाब बने फिरते है एक काम नही होता, ऑनलाइन बिल भरने में भी इनको परेशानी होती है,मैं यहाँ इनको विदेश पढ़ने भेजने के इंतजाम में बैंकों के चक्कर काट रहा हूं और ये महाशय जनसेवा कर रहे है"-रघुनाथ ने कहा


रमा-"अमर ये क्या बोल रहे हैं तेरे पापा, तू क्यों करता है ये सब,तुझे कितनी बार समझाया है,तुझे विदेश जाना है बेटा, अपने परिवार का नाम रोशन करने,वहाँ पैसा शोहरत सब मिलेगा, तू समझता क्यों नहीं"


दरअसल, रघुनाथ जी अपने एकलौते बेटे को विदेश पढ़ने के लिए भेजना चाहते है,ताकि समाज मे अपना रुतबा बना सके और खुद के सपने को पूरा कर सके, इसके उलट अमर बचपन से ही इंडियन आर्मी के ख्वाब देखता आ रहा है जिसके लिए वो बहुत बार रघुनाथ जी से कह चुका था लेकिन हर बार वो मना कर देते, ये कहकर की उस नौकरी में कुछ भी नही रखा,जितना सम्मान एक सैनिक को घर और समाज नही देता उससे अधिक सम्मान विदेश से आये हुए को मिलता है। बस इसी बात की टकराव दोनो बाप बेटे के बीच थी इस टकराव में कोई संदेश वाहक की भूमिका में होता तो वो थी रमा जी जिनको दोनो तरफ से नाराजगी का सामना करना पड़ता।


अमर इतना सुनकर भी अभी भी उसी तरह बैठा हुआ था तभी अमर की बड़ी बहन ने कहा"अमर चुप क्यों है,कुछ बोलता क्यों नहीं, क्यों तू आजकल पड़ोसियों के काम करता है,और तू तो जनता है कि पापा शर्मा अंकल को पसन्द नही करते तो फिर तूने ये काम क्यों किया"


अमर-"दीदी क्या गलत किया मैंने,यही तो पापा चाहते है मुझ से कराना, वही कर रहा हूँ, रही बात इनकी पसन्द की तो जो इनकी बात में हां में हाँ मिलता है उसको ये पसन्द करते है फिर चाहे वो घर वाले हो या पड़ोसी।"


"इनको सिर्फ अपनी बात मनवाने ,खुद को सही साबित करने की आदत पड़ चुकी है,तुम एम.बी.ए करना चाहती हो तो उसके लिए इनके पास पैसे नही,मैं आर्मी में जाना चाहता हूं तो मुझे बैंक से कर्ज लेकर विदेश भेजना चाहते है।क्यों करुँ मैं घर के कोई काम जब मै अपने देश की सेवा नही कर सकता, मेरा देश भी तो मेरा घर ही है,विदेश में जाकर नौकरी कर सकते है तो पड़ोसी की मदद करने में क्या बुराई है मेरे लिए तो पड़ोसी की सेवा करना और विदेश जाकर नौकरी करना दोनो ही एक समान है।"

आखिरी बात शर्मा अंकल के बेटे(अखिल) को दुश्मनों की गोली लगी है तो पूरा परिवार रो रहा था अंकल जी बहुत टेंशन में थे इसलिए मैंने उनकी मदद की। आखिर वो हमारे देश के वीर सैनिक के पिता है। मुझे तो उनपर और अखिल भैया पर गर्व है जो उन्होंने अपने एकलौते बेटे को देश की सेवा के लिए भेज दिया, बिना किसी स्वार्थ के और इसी बात से पापा उनसे नफरत करतेहैं क्योंकि उन्होंने इनकी राय नही मानी थी और इनको सच का आईना दिखा दिया था कि कर्ज लेकर विदेश भेजने से अच्छा मैं अपने बेटे को फर्ज निभाने देश की सीमा पर भेज दूँ ताकि अपनी भारत माँ का कर्ज चुका सकूँ उनकी रक्षा करके,माँ पूछिये इनसे कि क्या मुझे अपने कर्ज के पैसों से परमवीर चक्र दिला पाएंगे" कहकर अमर गुस्से में वहाँ से चला गया।


रघुनाथ जी ने अपना बाकी सारा गुस्सा अपनी पत्नी और बेटी पर निकाल दिया ये कहते हुए की तुम दोनो ने ही अधिक लाड प्यार में बिगाड़ दिया है।

अगले दिन शनिवार को रघुनाथ जी ने अपने घर की खिड़की से देखा तो घर के बाहर भारी भीड़ उमड़ पड़ी थी।रघुनाथ घर से निकल कर बाहर गए।

वहाँ जोर जोर से अखिल के नाम के नारे लग रहे थे।


जब तक सूरज चांद रहेगा अखिल तुम्हारा नाम रहेगा,

अखिल हमारा अमर रहे।


रघुनाथ और अमर भी उस भीड़ में थे,सेना की गाड़ी जब अखिल के पार्थिव शरीर को लेकर आयी, तिरंगे में लिपटा अखिल का चेहरा उगते सूरज के समान चमक रहा था।


उमड़ी भीड़ के नारे,शर्मा जी को मिलता सम्मान, और भारतीय सेना द्वारा अखिल के लिए दिया गया सम्मान, सम्मान में पत्रकारों की उमड़ी भीड़, किसी भी माता पिता के सिर को गर्व से ऊंचा करने के लिए काफी था।पूरे राजकीय सम्मान से अखिल का अंतिम संस्कार किया गया। अंतिम संस्कार के बाद जब शर्मा जी ने कहा"कि अगर उनको अपने एक नही चार बेटे भी देश के लिए कुर्बान करने पडते तो वो खुशी खुशी कर देते, लेकिन ईश्वर ने उन्हें सिर्फ एक ही संतान दी."


आज ये बात सुनकर रघुनाथ जी खुद को सम्भाल नही पा रहे थे वो शर्मा जी का चेहरा देखकर सोचने लगे कि इनकी आंखों में इतना गर्व क्यों?


उन्होंने शर्मा जी से कहा"यार शर्मा मुझे बहुत दुःख हो रहा है अखिल के बारे जान कर तूने खुद को कैसे सम्भाला है मै समझ नही पा रहा हूँ इसीलिए मैं डरता हूँ और तुझे समझाया था कि मत भेज सेना में इकलौते बेटे को"


शर्माजी-"यार मरना तो सबको है,एक दिन,आज नही तो कल, तो क्यों ना कुछ ऐसा कर के मरे की जीवन भर याद किये जायें, इस बात की क्या गारंटी है कि आर्मी में ना जाने से वो मेरी बुढ़ापे तक सेवा करता, जिनके जवान बेटे रोड एक्सीडेंट, बीमारी या किसी अन्य वजह से मर जाते है उनका क्या?देख मेरे भाई जीवन एक बार मिलता है इसलिए इसमें धन संचय करने की बजाय, अपने सपनो को जियो, देश के लिए कुछ अच्छा करो,जीवन मे ऐसा काम करो कि लोग आपके ना रहने पर आपको अच्छे कामो के लिए याद करें। ना कि गलत कामो के लिए बद्दुआ।"


रघुनाथ जी आज अंदर तक हिल चुके थे और शर्माजी की बात से सहमत भी थे, उन्होंने घर आकर अमर से कहा"अमर तुम भारतीय सेना में जाने का अपना सपना पूरा कर सकते हो,मैं नही भेज रहा हु तूमको विदेश,अब मेरे नही तुम अपने सपने को पूरा करो।


आज अमर को भारतीय सेना की वर्दी में देखकर खुशी से रघुनाथ जी की आंखे छलछला गयी। उन्होंने कहा "कैप्टन साहब पिता का सैल्यूट स्वीकार कीजिये, मुझे तुझ पर गर्व है मेरे बेटे"


अमर ने आगे बढ़कर अपने मातापिता के पैर छुए तो रघुनाथ जी ने बेटे को गले से लगा लिया और मां प्यार से बलाये लेने लगी तभी दीदी ने कहा" अमर अब तो तू कैप्टन हो गया,अब बता घर के काम करेगा कि नही"और दोनो भाई बहन हँस पड़े।


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