Sheel Nigam

Drama


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Sheel Nigam

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डूबता सूरज उगती कोंपल

डूबता सूरज उगती कोंपल

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 आज अशरफ़ के लिए बहुत खुशी का दिन था। उसकी विदेशी पत्नी ऐलिस ने एक नन्हीं सी जान को जन्म दिया था जो उन दोनों के प्यार का पहला तोहफ़ा बन कर इस दुनिया में आयी थी। अरब महासागर में उभरे हुए द्वीपों की श्रृंखला में से उस छोटे से द्वीप में सागर किनारे उगे नारियल के पेड़ों में से झुके हुए एक पेड़ के तने पर बैठा हुआ वह अपनी बीती हुई ज़िंदगी की यादों में खो गया।  

आज से पाँच वर्ष पहले जब वह महज़ अठारह वर्ष का था, इसी पेड़ के झुके हुए इस तने पर बैठा हुआ सागर के उस पार उगते हुए सूरज को बड़ी लालसा भरी नज़रों से निहार रहा था। सागर किनारे बैठा अक्सर ऐसा किया करता था। वह एक बहुत ही गरीब परिवार का बेटा था पर उसके सपने बहुत ऊँचे थे।उसके पिता समुद्र से मछली पकड़ने का काम करते थे। दो ही तो व्यवसाय संभव थे उस टापू पर, अथाह समुद्र से मछली और टापू पर उगे पेड़ों के नारियल। बस इतनी सी ही दुनिया थी इन टापूवासियों की। सरकारी महकमे से रहने को घर और खाने को राशन मिल जाता था। सरकार की ओर से ही एक छोटा सा अस्पताल और दसवीं कक्षा तक स्कूल, जहाँ सारी सुविधाएं निशुल्क मिलतीं थीं। उस स्कूल में सिर्फ पाँचवीं तक पढ़ाई करके वह अपने पिता के साथ मछली का व्यवसाय करने लगा था। इसके साथ अपनी बीमार माँ और एक छोटे भाई, जो जन्म से ही गूंगा था,की देखभाल करने की भी उसकी ज़िम्मेदारी उसकी ही थी। बड़ी सादगी की ज़िंदगी जी रहा था अशरफ़, पर हमेशा से ही कुछ बड़ा काम करने की हसरत लिए सागर के उस पार उगते सूरज को देखा करता। कभी कभी उसका मन होता उगते सूरज के रथ पर सवार होकर पूरी दुनिया का चक्कर लगा ले। यह तो उसकी कोरी कल्पना की उड़ान थी। भला सूरज के रथ पर भी आज तक कोई सवार हुआ है? उसकी लालसा रोज़ पंख लगा कर उड़ा करती और शाम को डूबते सूरज के साथ वापस उसी द्वीप पर वापस आ जाती। 

आज वह अपनी बेटी के सुनहरे भविष्य के सपनों में खोया हुआ था पत्नी और नवजात बेटी को अस्पताल में देख कर उसका मन फूला नहीं समा रहा था। शाम होते ही वह अस्पताल से सीधे घर न जा कर सागर किनारे डूबते हुए सूरज को अपनी सभी हसरतों के पूरा हो जाने की खुशी में सलाम कर ही रहा था कि उसे सागर में उठती भँवरें दिखाई दीं। बड़ी ही कातिल होतीं हैं ये महासागर की भँवरें, अगर कोई नौका या तैरता हुआ इंसान इन भँवरों में फँस जाए तो कब और कैसे काल के गाल में समा जायेगा कोई भी नहीं समझ पाता। एक ही क्षण में सब समाप्त हो जाता है। ऐसी ही एक भँवर में से आज से पाँच साल पहले उसने एक विदेशी महिला रोज़ी को निकाल कर बचाया था, जब वह इसी तरह सागर किनारे बैठा था और वह विदेशी महिला रोज़ी अपनी छोटी सी नौका में सर्फ़िंग करती हुई उस बड़ी सी भँवर में फँस गयी थीऔर डूबने ही वाली थी कि उसने बड़ी ही फ़ुर्ती से तैर कर डूबने से बचा लिया था। उस कमसिन सी नाज़ुक महिला को अपनी बलिष्ठ भुजाओं में समेट कर सागर के तट पर लाया, उसके फेफड़ों में भरा पानी निकाला और उसे कृत्रिम श्वाँस दे कर बेहोशी से बाहर निकाला। डर और शॉक के कारण वह विदेशी महिला कई दिनों तक बीमार रही। उसकी तीमारदारी भी उसने अपने घर में रह कर की। 

रोज़ी कुछ दिनों में ठीक तो हो गयी पर वह अशरफ़ के अहसान से इतनी अभिभूत हो गयी कि उसे लगा कि उसे अशरफ़ और उसके परिवार की गरीबी दूर करने के लिए कुछ करना चाहिए। अब तक उसके साथ जो भी अच्छा व्यवहार हुआ, मानवीयता के नाते हुआ था उसमें भाषा की समस्या आड़े नहीं आयी थी। पर अब उसे अपनी भावनाओं को समझाने के लिए भाषा की जरूरत थी क्योंकि न तो वह उनकी भाषा 'दिवेही' समझती थी और न वो लोग उसकी भाषा 'अंग्रेज़ी' या 'फ्रेंच' समझ पाते थे। रोज़ी ने अपने हाव-भाव से उनके प्रति कृतज्ञता तो प्रकट की पर असल में वह क्या कहना चाहती थी समझा न पाई । उस द्वीप के अस्पताल में एक भाषा अनुवादक था विवियन, जिसकी मदद से रोज़ी ने अपनी इच्छा ज़ाहिर की। उसने बताया कि वह चाहती थी कि वह अशरफ़ को अपने देश ले जाये और उसे किसी लायक बना कर धन कमाने में उसकी मदद करे जिससे वह अपने गूंगे भाई और माता-पिता की गरीबी दूर कर सके।अपने प्रति किये गए जीवन-दान का ऋण चुकाने का यही अच्छा तरीका उसे समझ में आया। विवियन ने जब अशरफ़ और उसके माता-पिता को रोज़ी की यह इच्छा बताई तो पहले तो अशरफ़ के माता-पिता अशरफ़ को अकेले इतनी दूर भेजने को राज़ी नहीं हुए पर बहुत समझाने-बुझाने पर उन्होंने उसे एक शर्त पर विदेश जाने दिया कि जब भी मौका मिलेगा वह उनसे मिलने उनके टापू पर अवश्य आएगा। 

रोज़ी की पेरिस में ट्रैवलिंग एजेंसी थी और एक रेस्तराँ भी था। पहले तो उसने अशरफ़ को रेस्तराँ में छोटा-मोटा काम दे कर अंग्रेज़ी बोलना सिखाया। फिर उसे ट्रैवलिंग टूअर्स ले जाने की ट्रेनिग दी। इस बहाने वह साल में एक बार वह टूरिस्टों के साथ अपने टापू पर भी आकर अपने परिवार वालों से मिल जाता और अपने कमाए हुए वेतन से उनकी मदद भी कर जाता। दो वर्ष के अंदर ही उसने इतना धन कमा लिया कि उसने अपने टापू पर एक गेस्ट-हाउस बना लिया और अब उसके टूरिस्ट लोग उसके ही गेस्ट-हाउस में ठहरने लगे जिससे उसकी आमदनी और भी बढ़ गयी। गेस्ट- हाउस का काम उसके पिता और गूंगे भाई साहिल ने संभाल लिया और अशरफ़ अब ज्यादातर पेरिस में ही रहने लगा। 

रोज़ी के रेस्टोरेंट में एक रिसेप्शनिस्ट थी प्रिंसेस, जिसे सब प्रिन्सी कहते थे, बहुत ही नाज़ुक सी खूबसूरत कमसिन सी लड़की थी वह। अशरफ़ को पहली ही नज़र में भा गयी थी प्रिन्सी, वह उसे मन ही मन चाहने लगा था। पर अपने प्यार का इज़हार नहीं किया था उसने, एक संकोच था मन में। अब वह पढ़ा-लिखा सा बाँका नौजवान हो गया था। 

एक बार जब वह टूर ले कर वापस आया तो उसे प्रिन्सी की कुर्सी खाली मिली। पता करने पर मालूम हुआ कि वह कई दिनों से काम पर नहीं आ रही थी। कई दिन इंतज़ार में बीत गए, प्रिन्सी काम पर नहीं लौटी। ऑफिस से उसके घर का पता लेकर अशरफ़ एक दिन उसके घर पहुँच गया। काफ़ी देर तक कॉल बेल बजने पर भी जब दरवाज़ा नहीं खुला तो उसने फोन करके रोज़ी को वहाँ बुला लिया। रोज़ी ने लोकल पुलिस की मदद से दरवाज़ा खुलवाया तो देखा प्रिन्सी बिस्तर पर बेहोश पड़ी थी। पास ही मेज़ पर शराब की एक बोतल और कुछ नींद की गोलियाँ रखीं थीं। उन दोनों ने मिल कर प्रिन्सी को अस्पताल पहुँचाया। 

कुछ दिनों में जब प्रिन्सी की हालत थोड़ी सुधरी और डॉक्टर के द्वारा उसकी काउंसलिंग की गयी तो पता चला कि वह पिछले पाँच सालों से अपने एक पुरुष मित्र रॉबर्ट के साथ लिव-इन-रिलेशनशिप में रह रही थी। अचानक ही रॉबर्ट उसे छोड़ कर चला गया था। इस सदमे को वह बर्दाश्त नहीं कर पाई और रॉबर्ट को भूलने के लिए उसने शराब और नींद की गोलियों में अपने आप को डुबो दिया था। अब अशरफ़ के सामने थी प्रिन्सी और उसका टूटा हुआ दिल … वह उसे इतना चाहता था कि वह उसके टूटे दिल का सहारा बन सकता था पर इस समय प्रिन्सी रॉबर्ट के प्यार से आहत थी इसलिए वह अभी अपने प्यार का इज़हार नहीं कर सकता था। अभी उसके लिए इतना ही काफ़ी था कि वह उसके करीब था और उसकी देख-भाल कर रहा था। वह प्रिन्सी को देखने रोज़ अस्पताल जाता और जब वह पूरी तरह से ठीक हो गयी तो खुद अपनी कार में उसे उसके घर छोड़ने आया। 

धीरे-धीरे प्रिन्सी और अशरफ़ की नज़दीकियां बढ़तीं गयीं। प्रिन्सी भी रेस्तरां में अपने काम पर लौट आयी थी। काम के बाद दोनों अपना ज्यादातर समय साथ गुज़ारने लगे। दोनों के मन में प्यार के अंकुर पनपने लगे थे। पर एक बार प्यार में धोखा खाने के बाद अब प्रिन्सी सतर्क थी। इसलिए जब अशरफ़ ने उसके प्रति अपने प्यार का इज़हार किया तो प्रिन्सी ने उसके सामने शादी की शर्त रख दी। अशरफ़ को तो मानो मुँह-माँगी मुराद मिल गयी। 

उसने प्रिन्सी से शादी करने का प्रस्ताव हाथों-हाथ लिया पर एक शर्त रखी कि वह शादी अपने घर जा कर ही करेगा जिससे उसके माता-पिता और भाई भी शादी मैं शामिल हो सकें। इसके लिए उन दोनों को उसके घर जाना होगा। प्रिन्सी का अपना कहने को कोई नहीं था। बचपन में ही उसके माता-पिता का तलाक हो गया था और उसका पालन-पोषण 'फोस्टर केयर' में हुआ था। अपनी शादी का निमंत्रण उसने अपने फोस्टर माता-पिता को भी दिया. सभी लोग उनकी शादी में शरीक़ हुए। शादी के बाद दोनों एक वर्ष तक वहीं रहे। 

और आज ....प्रिन्सी ने एक प्यारी सी गुड़िया को जन्म दिया था। क्या था अशरफ़ का जीवन, आज से पाँच वर्ष पहले ? महासागर की विशालकाय लहरों की एक भँवर ने उसके जीवन की दिशा ही बदल दी.… उसके जीवन में इतनी खुशियाँ भर दीं कि उसे लगा कि वह सच में सूरज के सात घोड़ों वाले रथ पर अपनी प्रिन्सी और नन्हीं सी बिटिया के साथ घूम आया है और आज की इस शाम… डूबते सूरज को सलाम करने वह फिर से सागर किनारे आ बैठा था।


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