डर
डर
वह अपनी किशोर बेटी रंजना की सुरक्षा के लिए, बहुत चिंतित रहते हैं। उन्होंने अपने जीवन में, मासूम लड़कियों पर घात लगाने वाले ,कई 'भेड़िये' देखे हैं। उन्हें लगता रहता है कि बिटिया पर, किसी की बुरी नजर न पड़े। बुरे लोगों की संगत भी बुरी होती है। ऐसे लोग अपने जाल में, किसी को भी फांस लेते हैं .... कुकर्मियों का जाल...!
वह दिन उनको भूलता नहीं जब रंजना के सामने ही, उनके दिलजले दोस्त ने तंज कसा था, " मुझ पर क्या छींटाकशी कर रहे हो, राहुल प्रसाद! खुद के गरेबान में हाथ डालकर देखो। तुम्हारा उठना बैठना, कैसे घटिया लोगों के साथ रहा! नर्क में भी जगह नहीं मिलेगी , उन सबको! "
यह तो अच्छा हुआ कि मित्र महोदय का कोई जरूरी फोन आ गया। इसी से उनकी जबान, और अधिक 'फिसलने' से रुक गई। नहीं तो जो छीछालेदर होती, सोचकर ही प्रसाद जी को पसीने आ जाते हैं! इस घटना कई दिन बात तक, उन्हें लगता रहा कि बेटी की प्रश्नवाचक दृष्टि, उनका पीछा कर रही थी। जो पिता, सन्तान की बुनियादी उम्मीदों पर भी, खरा न उतरे - लानत है उस पर!
वे भय से आँखें मूंदे हुए है। अपने जीवन के किसी भयावह प्रकरण को, विचारों से, बाहर निकालने का यत्न कर रहे हैं। परन्तु वह याद तो हटती ही नहीं है। किसी जिद्दी बच्चे की तरह, अड़ गई है। तब वे इंस्पेक्टर राहुल प्रसाद नहीं थे; बी. कॉम. प्रथम वर्ष में पढ़ने वाले, एक किशोर थे। गाँव से शहर आए थे। ब्वॉयज हॉस्टल में रहते हुए, पढ़ाई पूरी करने का लक्ष्य रहा। साधारण घर के बच्चों की आकांक्षायें भी साधारण ही होती हैं। जो भी हो, पढ़ने में, वह ठीकठाक रहे।
उन्हें याद है, जब बहला फुसलाकर , किसी तरूणी को, छात्रावास में लाया गया था। सुनने में आया था कि उसका कुछ लड़कों ने 'शोषण' किया। आग लगती है तो धुआँ उठता ही है! अगले ही दिन उसने, दुपट्टे को गले में बांधकर , पंखे से लटककर, आत्महत्या कर ली थी।
फिर तो पुलिस की पूछताछ शुरू हुई। बड़े घर के वे लड़के , जो उस कांड के लिए जिम्मेदार थे, साफ बच निकले; बल्कि उन्होंने, उस लड़की नेहा के चरित्र को, मलिन करने वाली बातें फैला दीं। रुतबा और पैसे मिल जायें तो क्या कुछ, खरीदा नहीं जा सकता?! राहुल भी साक्षी थे, नेहा के छात्रावास में आने के। किन्तु वे गवाही न दे सके, उन दुष्कर्मियों के खिलाफ! उनकी ठसक से डरकर या फिर उनके द्वारा दिए प्रलोभन के कारण - वे स्वयं नहीं समझ पाते। कई बार अपनी ही भावनाओं को समझ पाना , दुष्कर हो जाता है!
राहुल को चुप रहने का पुरस्कार मिला। कई महंगे उपहार और उन दुष्टों की, मण्डली में प्रवेश। राहुल के सहपाठी, उनके भाग्य से जलते थे। राहुल प्रसाद ने भी किसी भाँति खुद को समझा लिया कि पीड़िता के आचरण में ही कोई खोट रही होगी। फिर भी पता नहीं क्यों, राहुल प्रसाद उस बाला का चेहरा आज तक नहीं भूल पाये।
उन आँखों में, एक निराली सी चमक थी। सरस आँखों में, जीवन का उछाह ...! आखिर वह , वहाँ क्यों आई होगी?! क्या पढ़ाई के लिए कोई पुस्तक, या फिर नोट्स लेने?? याकि लड़कों का छात्रावास देखने की, एक भोली सी जिज्ञासा ?? उन लड़कों में उसका कोई ' खास' दोस्त रहा, जिसने अपनी विकृत वासना की तुष्टि के लिए, ऐसा खेल खेला?? ऐसे प्रश्न उनके मन को, पहले नहीं मथते थे। किन्तु अब वे दिनोंदिन, सयानी होती बिटिया को देखते हैं। जिजीविषा से भरी उत्साहित दृष्टि... उस लड़की की जीवन से छलकती हुई आँखे , उस रात ही बुझ गई थीं। उसने तो रात में ही, छात्रावास के रिसेप्शन वाले कमरे में, फाँसी लगा ली थी!!
"डैडी देखिये मैं किसे लाई हूँ !" कहते हुए रंजना ने घर में प्रवेश किया तो उनकी चीख निकल गई। बिटिया की यह नई सहेली तो हूबहू नेहा जैसी थी! वही हँसती हुई सी आँखें ...! उनके प्राण मानों हलक में आ गए और चेतना खोने लगी।
पिता को अचेत होकर गिरते देख, रंजना उद्विग्न हो उठी, "डैडी क्या हुआ आपको?!"
वह बेचारी कहाँ जानती थी कि नेहा कौन थी ...उसके पिता और नेहा को कौन सा तार जोड़ता था ... यह तो कदापि नहीं जानती थी कि उसकी वह सखी, नेहा की जुड़वाँ बहन, मेहा की बेटी थी; जिसने बिलकुल, अपनी मरी हुई मौसी की शकल पाई थी!!
