Swati Rani

Inspirational


4.2  

Swati Rani

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डाक्टर

डाक्टर

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"बेटा मैने सपना देखा आज जिसमें तुम उजले कोर्ट में, स्थेतोस्कोप लिये घुम रही थी", राधा देवी ने बहुत उम्मीदों के साथ अपनी छोटी बेटी स्वाति को कहा। 

वैसे तो उनके तीन संतान और थी, दो बड़े बेटे अमर, राजेश और एक बेटी राधिका। 

बड़ा बेटा अभिषेक और छोटी बेटी स्वाति पढ़ने में बहुत होशियार थे। 

बनियों कि फैमिली थी इनकी तो लड़कों को तवज्जो तो मिलना ही था। 

बड़ा बेटा राऊरकेला में काॅनवेंट में पढ़ने गया, ओम प्रकाश जी को उससे उम्मीदें थी, आई. आई. टी. कि, पर जिसने करोड़ो रूपये का बिजनेस देख लिया उसको कहा पढ़ाई में मन लगना था। 

गलत संगत में पड़कर, लौट के बुद्धु घर को आये, छोटा- मोटा होटल मैनेजमेंट का कोर्स कर लिया और आ गया वापस बिजनेस संभालने। 

"हुं... आ गये बाप का नाम मिट्टी में मिला के, इतने होनहार होकर भी, वेटर का पढ़ाई पढ़ने गये थे, बाहर पैसे लगाने", राम प्रकाश जी ताने देते थे अमर को। 

पर अमर ने राम प्रकाश जी का बिजनेस भी अच्छा संभाला। 

छोटा तो था ही नालायक उससे तो कोई उम्मीद ही ना थी, कितने बार पटना के डान बास्को के हाॅस्टल से भाग-भाग के आ गया था। 

राम प्रकाश जी उसको वापस लेकर जाते तो हजारों शिकायतें आती, टिचर कहते कि ये कहता है मेरे बाप के पास बहुत पैसा है मैं नहीं पढुंगा । 

तीसरी राधिका वो जैसे बनियों के घर में होता है, पढ़ो-लिखो और शादी कर दो वहीं माहौल में पली-बढ़ी थी, घर कि सब लड़कियों के साथ और पढ़ने में भी कुछ खास ना थी। 

राधिका से सात साल छोटी और सबकी चहेती स्वाति थी, बचपन से उसमें पढ़ने का अलग जुनून था। 

एक ज्योतिष ने तो बता दिया था, आपकी ये बिटिया डाक्टर ही बनेगी। 

पर फिर भी बनियों का स्वभाव बेचारी कि माँ ने राम प्रकाश जी से लड़-झगड़ कर उसको इंगलिश मिडियम के छोटे से स्कूल में दाखिला दिलाया, पर पढ़ाई उसमें हिन्दी ही होती थी। 

स्वाति सारा दिन पढ़ती, और उसी में अच्छा करने की कोशिश करती। 

स्वाति के टीचर बोलते ये लड़की जरूर कुछ अलग करेगी। 

बिना ट्युशन के स्वाति 10 के परीक्षा में स्कूल में टाॅप कर गयी। 

अब उसका एडमिशन शहर के एक बड़े स्कूल में हो गया जहाँ से उसने 11 और 12 क्लास पास किया। 

अब आयी प्रमुख समस्या आज तक खानदान में कोई लड़की बाहर नहीं गयी थी। जितने मुंह उतनी बातें, देखते हैं कितना हिम्मत है राम प्रकाश जी में कि बेटी को बाहर पढ़ने भेज दे, आज तक तो ऐसा हुआ नहीं हमारे समाज में। जलने.वाले हजारों थे।

आखिर अमर जिसको कहीं ना कहीं अब तक ये एहसास हो चुका था कि ना पढ़ने से उसने क्या खोया है, पापा को बोला हिम्मत करके कि स्वाति को बाहर भेज दो चाहे दुनिया जो भी बोले। 

अमर अपने पापा के टूटे हुये सपनों को स्वाति के माध्यम से पूरा करना चाहता था, मन में उसने सोचा जो मैं ना कर पाया मेरी बहन करेगी। 

तब तक राम प्रकाश जी भी स्वाति के लगन से प्रभावित थे आखिर हो भी क्यों ना, आखिर एक ऐसै परिवार जहाँ पैदा होते के साथ लड़कियों कि किस्मत में चूल्हा-चौकी लिखी जाती थी वहां स्वाति ने दो बार स्कूल टाॅप करके उनका सीना गर्व से चौड़ा जो किया था। 

आखिर स्वाति दिल्ली गयी, आकाश इंस्टीट्यूट में दाखिला हुआ और हाॅस्टल में रहने लगी। 

स्वाति खुब मन लगा कर पढने लगी पर चुकी बहुत छोटे स्कूल और बिना ट्युशन के पढ़ी थी, उसको बहुत कठिनाई आने लगी। 

पर मन में एक ही जजबा था कि कुछ करना है क्योंकि अगर वो बिना डाॅक्टर बने जाती तो उसके माँ-पापा का दिल टूट जाता। 

स्वाति को पता था ये मुहिम आसान नहीं था, पर वो सब भूल के भिड़ गयी। 

दिन को दिन ना समझा ,ना रात को रात, सारा दिन बस पढ़ाई। 

"ये तो बहुत घमंडी है सारा दिन पढ़ती है, लगता है इसे ही डाक्टर बनना है, हम तो ऐसे ही आये है यहाँ" लड़कियाँ ऐंठती थी उसको देख कर। 

पर उनको क्या पता जितना उनको स्कूल या ट्युशन से पता था वो तो स्वाति अब सीख रही थी। 

अर्जुन के जैसे स्वाति कि आंखे बस मछली कि आँखो(डाक्टर) बनने पर थी। 

रास्ता बहुत कठीन था, पर असंभव कुछ भी नहीं ये भी उसको पता था। 

एक वक्त आलम ये था कि जब लड़कियाँ शापिंग और मजे करती स्वाति सिर्फ चाय और खाने के लिये पढ़ाई का टेबल छोडती, मतलब ,डबल मेहनत। 

फिर बारी आई रिजल्ट कि, ये क्या स्वाति का रिजल्ट में नाम नहीं था। 

स्वाति बहुत रोयी और फिर राम प्रकाश जी ने गाना गाते हुये स्वाति को समझाया कि वो थोड़ा सहज महसूस करे, और बोले, "किसका है ये तुम को इंतजार मैं हूँ ना", बेटा एक बार और कोशिश करो, कोशिश करने वालो कि कभी हार नहीं होती। 

स्वाति जानती थी कि अगली बार का रिस्क लेना मतलब कोई गारन्टी नहीं थी होगा ही, कुछ सौ सीटें और लाखों के तादाद में बच्चे। 

पर उसको घर जाकर आम लड़कियों वाली जिंदगी भी नहीं जीना था, कुछ अलग करना था।

फिर से लग गयी स्वाति तैयारी में, ये दो साल उसके जिंदगी के ऐसे थे जैसे उसने ना होली खेली ना दीवाली देखी। 

किसी भी त्योहार में परिवार को याद करके रो लेती थी, फिर जुट जाती थी कोल्हु के बैल जैसे। 

गर्मी, बारिश, ठंडी कुछ ना दिखा उसे। 

आखिर इम्तिहान के बाद स्वाति घर वापस आ गयी, अब जो भी हो, क्योंकि उसका हिम्मत जवाब दे गया था। 

रिजल्ट आया और ये क्या स्वाति को मुंबई का मेडिकल काॅलेज मिल गया था। 

सब परिवार में खुश थे, मोहल्ले में मिठाईयाँ बांटी गयी। 

राम प्रकाश जी के आंखों में आँसू थे, आखिर बिटिया डाक्टर जो बनने वाली थी। 

उधर अमर कि आंखे भी छलछला गयी थी क्योंकि जो सपना वो पूरा ना कर पाया स्वाति ने कर दिखाया था। 

राधा देवी ने जा कर माता रानी के मंदिर में अपनी मन्नतों का चढ़ावा चढ़ाया ।


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