चूहा, चप्पल और मास्टर प्लान
चूहा, चप्पल और मास्टर प्लान
बाहर बारिश हो रही थी और अंदर का माहौल एकदम 'सेट' था। पाँचों दोस्त—आर्यन, रिया, समीक्षा, लकी और बबलू—लैपटॉप को बीच में रखकर एक डरावनी फिल्म देख रहे थे। लाइटें बंद थीं और सिर्फ लैपटॉप की नीली रोशनी उनके चेहरों पर पड़ रही थी।
बबलू के पास पॉपकॉर्न का एक बहुत बड़ा टब था, जिसे वह किसी खजाने की तरह अपनी छाती से चिपकाए बैठा था। लकी बीच-बीच में चश्मा ठीक करते हुए कह रहा था, "देखना, अब इस दरवाजे के पीछे से भूत निकलेगा, मेरी कैलकुलेशन यही कहती है!"
समीक्षा ने उसे कोहनी मारी, "चुप कर लकी! मास्टरमाइंड मत बन, फिल्म देखने दे।"
वह भयानक आहट
फिल्म में जैसे ही सस्पेंस बढ़ा, अचानक बबलू को अपने पैर के पास कुछ सरसराहट महसूस हुई। उसे लगा शायद लकी शरारत कर रहा है। उसने धीरे से कहा, "ओए लकी, पैर मत लगा, पॉपकॉर्न गिर जाएंगे।"
लकी बोला, "भाई, मैं तो हाथ भी नहीं हिला रहा।"
तभी, लैपटॉप की रोशनी में एक काली परछाईं बबलू के पैर से होती हुई सीधे पॉपकॉर्न के टब के अंदर जा घुसी। चूहा!
मचेगा अब कोहराम
"भूत! पॉपकॉर्न के अंदर भूत है!" बबलू ने चीख मारी और पूरा का पूरा टब हवा में उछाल दिया। जैसे ही पॉपकॉर्न की बारिश हुई, वो चूहा घबराकर रिया की गोद में कूद गया।
"आह्ह्ह!" रिया चिल्लाई और सोफे से ऐसी उछली कि सीधे आर्यन के ऊपर जा गिरी। लैपटॉप हाथ से छूटा और ज़मीन पर गिरकर बंद हो गया। अब कमरे में घुप अंधेरा था और सिर्फ भागने की आवाज़ें आ रही थीं।
लकी ने अंधेरे में हाथ-पैर मारते हुए चिल्लाया, "डरो मत! मैं मास्टर प्लान एक्टिवेट कर रहा हूँ!" उसने चूहे को पकड़ने के लिए अपनी जैकेट उतारी और हवा में लहराई। पर चूहा तो नहीं फंसा, जैकेट समीक्षा के मुँह पर जा लिपटी।
समीक्षा को लगा किसी गुंडे ने हमला कर दिया है। उसने आव देखा न ताव, 'कराटे चॉप' की ऐसी बौछार की कि अंधेरे में जो भी सामने आया, पिटता गया।
- लकी की नाक पर एक मुक्का पड़ा— "ओए, मैं मास्टर हूँ, विलेन नहीं!"
- बबलू के पेट पर एक लात पड़ी— "अरे मेरी लस्सी... मेरा पॉपकॉर्न!"
गहराई भरा क्लाइमैक्स
आर्यन ने किसी तरह मोबाइल की टॉर्च जलाई। नज़ारा देखने लायक था—लकी मेज के नीचे घुसा हुआ था, बबलू अपने बिखरे हुए पॉपकॉर्न देखकर रो रहा था, और रिया पर्दे से लिपटी खड़ी थी।
और वो चूहा? वो बड़े आराम से लैपटॉप के कीबोर्ड पर बैठा हुआ था, मानो कह रहा हो— "फिल्म तो अब शुरू हुई है दोस्तों!"
पाँचों ने एक-दूसरे की हालत देखी और गुस्सा भूलकर पागलों की तरह हँसने लगे।
सुखविंदर की कलम से
"ज़िंदगी की सबसे गहरी यादें अक्सर उन छोटी-छोटी शरारतों में छिपी होती हैं जो हमें डराती भी हैं और हँसाती भी। कभी-कभी एक छोटा सा जीव हमारे बड़े-बड़े 'मास्टर प्लान' को फेल कर देता है ताकि हम अपनी गंभीरता छोड़कर खुलकर हँसना सीख सकें। असली एक्शन मैदान में नहीं, दोस्तों के साथ बिताए उन पलों में है जहाँ हम एक-दूसरे को पीटते भी हैं और प्यार भी करते हैं।"
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