चंद्रुका चतुर्दर
चंद्रुका चतुर्दर
चंद्रुका चतुर्दर
(आधी रात का मेहमान — एक हास्य कथा)
चंद्रु बाबू को नींद से ज़्यादा चैन की तलाश थी।
हर रात, जैसे ही वह तकिए पर सिर रखते, एक नन्हा आतंकवादी — मच्छर — उनका स्वागत करता।
“झिन-झिन-झिन…”
कान के पास ऐसा बजता जैसे कोई डीजे पार्टी चल रही हो, और चंद्रु बाबू उसका VIP गेस्ट हों।
उन्होंने मच्छरदानी लगाई, मॉस्किटो कॉइल जलाया, मोबाइल ऐप से अल्ट्रासोनिक ध्वनि चलाई —
पर मच्छर था कि मानता नहीं था।
शायद वह भी टेक-सेवी था… और चंद्रु बाबू का ब्लड ग्रुप उसका फेवरेट स्नैक।
एक रात, जब चंद्रु बाबू ने थक-हार कर सोने की कोशिश की, तभी फिर वही आवाज़ —
“झिन-झिन-झिन…”
चंद्रु बाबू उठे, चप्पल उठाई, और युद्ध की मुद्रा में खड़े हो गए।
पर मच्छर तो निन्जा निकला — गायब!
तभी खिड़की से एक और मच्छर आया।
फिर एक और।
फिर पूरा “मच्छर महासंघ”।
चंद्रु बाबू चिल्लाए —
“हे भगवान! ये आधी रात का कौन सा सम्मेलन है?”
तभी एक मच्छर, थोड़ा मोटा और रौबदार, उनके सामने आया।
उसने छोटे-से माइक में कहा:
“नमस्कार! मैं हूँ मच्छर प्रसाद, आधी रात का मेहमान।
हम आपके खून के स्वाद के दीवाने हैं।
आपका ब्लड ग्रुप ‘Tasty+’ है।
हमने वोटिंग की — और आप चुने गए हैं ‘रात के सबसे स्वादिष्ट मानव’।”
चंद्रु बाबू की आँखें फटी की फटी रह गईं।
उन्होंने कहा —
“ये तो सरासर अन्याय है! मैं नींद चाहता हूँ, खून नहीं देना!”
मच्छर प्रसाद मुस्कराया —
“चिंता मत कीजिए, हम केवल एक बूंद लेंगे… पर बारी-बारी से।”
चंद्रु बाबू ने हार मान ली।
उन्होंने चप्पल नीचे रख दी, और मच्छरों से कहा —
“ठीक है, पर एक शर्त है — काटो, पर कान के पास मत गुनगुनाना। वो सबसे ज़्यादा चुभता है।”
मच्छर प्रसाद ने सिर हिलाया।
और फिर सब मच्छर लाइन में लग गए — जैसे कोई वैक्सीनेशन ड्राइव चल रही हो।
सुबह चंद्रु बाबू उठे, शरीर पर नक्शा बना हुआ था —
हर मच्छर ने अपनी कला दिखाई थी।
कोई ने पीठ पर बाइट किया, कोई ने टखने पर, और एक ने तो माथे पर “M+” लिख दिया।
पर एक बात तय थी —
अब चंद्रु बाबू को नींद नहीं आती थी,
पर हास्य ज़रूर आता था।
“चंद्रु का चतुर्दर” अब उनका स्थायी रूममेट बन चुका था।
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“चतुर्दर” एक कल्पनाशील, हास्यपूर्ण शब्द है.कहानी के शीर्षक में प्रयोग किया है !
शब्द को तोड़कर देखें:
- चतु = चार
- दर = दरवाज़ा, द्वार, या प्रवेश बिंदु
इससे यह अर्थ निकल सकता है कि चंद्रु के चारों ओर चार संकट, चार मच्छर, या चार दिशाओं से आने वाली परेशानियाँ हैं.
जैसे कि वह एक चार-दरवाज़ों वाला युद्धक्षेत्र बन गया हो।
लेकिन चूंकि यह शब्द पारंपरिक हिंदी में नहीं मिलता, इसका प्रयोग हास्य, व्यंग्य और कल्पना के लिए किया गया है — एक नया शब्द जो कहानी की चुटीली दुनिया को दर्शाता है।
चुटीला🦟 “चतुर्दर😁😁😁
