Sanjay Aswal

Drama


4.8  

Sanjay Aswal

Drama


छलावा

छलावा

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बात उन दिनों की है जब मैं अपनी बहनों के साथ सर्दियों की छुट्टियां मनाने अपने गांव गया हुआ था। मेरी ही तरह और बच्चे भी गांव आए हुए थे।गांव में सर्दियों में काफी चहल पहल हो जाती है। गांव में काफी भीड़ भाड़ और उत्सव जैसा माहौल हो जाता है, हर तरफ शोर, हल्ला गुल्ला, बच्चों की उधम चौकड़ी से ऐसा लगता है, जैसे गांव फिर से जी उठा हो। ऐसा नहीं है कि गांव में लोग नहीं है, पर जो है वो अपने कार्यों में व्यस्त रहते हैं। धान और भुट्टा (मक्काई) कट चुका है और गेंहू की बुआई के लिए खेत तैयार हो रहे हैं। खेतों में जगह जगह गोबर का ढेर लगाया जा रहा है, गांव के लोग आज कल बहुत व्यस्त हैं, बच्चे महिलाएं सभी गोबर उठा उठा कर खेतों में ले जा रहे हैं, ताकि खेतों को ज्यादा खाद मिल सके।

गांव के मर्द खेतों से खरपतवार को हटा रहे हैं और खेतों में आग लगा कर झाड़- झंकड़ को साफ करने में लगे हैं।

कुछ गांव के लोग अपने खेतों में गोट( खेतों में किसी कोने में दोनों तरफ छप्पर लगा कर उसमे अपने जानवरों को बांध कर कुछ समय वहीं उसी छप्पर में रहते हैं ताकि खेतों में ज्यादा से ज्यादा गोबर इकट्ठा हो सके) लगा रहे हैं। गेंहू की बुवाई का समय नजदीक आ गया है, इसलिए काम जल्दी जल्दी हो रहा है।

इधर मैं अपने दोस्तों के साथ मिल का छुट्टियों का भरपूर मजा ले रहा हूं, दिन भर गांव में आवारागर्दी करना, खेलना, नहाने के लिए नदी में जाना, वहां बैठ कर हिसर, किंगोड़ा, तूंगा, तिमला( जंगली फल) आदि फल खूब खाते हैं, इसी तरह दिन गुजर रहे हैं।

अभी रात में खाना खाने के बाद हम सब ख्वाल ( गांव का एक छोटा मोहल्ला) में बाहर ही खटिया लगा के दादी से कहानी सुन रहे थे, कुछ तो अभी जुगनू पकड़ने में व्यस्त हैं, रात बहुत धीरे धीरे गहरा रही है और हम सब सोने की तैयारी करने लगे हैं, अभी नींद आईं ही थी कि सहसा गांव में हर तरफ शोर होने लगा, हलचल बढ़ गई, सभी उठ गए कि आखिर क्या माजरा है, बुजुर्ग आपस में बात करने लगे, और हम सब बच्चे डर के मारे अपने अपने माता पिता, दादी, दादा, ताई, से चिपक कर रोने लगे, समझ ही नहीं आ रहा था कि इतनी रात कौन शोर कर रहा है और क्यों ?

गांव के बुजुर्गो ने सभी बड़े लड़कों से मशाल बनाने और उस ओर जाने के लिए कहा जिधर से शोर आ रहा था। किसी ने बताया कि शोर उस ऊपर वाले खेत में जो गोट लगी है वहीं से हुत हूत की आवाज आ रही है। किसी ने बताया कि वो गोट तो गिरीश की है,और शायद वो मुसीबत में है।

सभी बुजुर्ग आपस में मंत्रना कर रहे थे कि कैसे गिरीश को बचाया जाए, और हम सब सुन रहे थे कि कोई गांव का गिरीश भाई संकट में है, पर समझ नहीं आ रहा था कि उन्हें आखिर हुआ क्या है ? और किस तरह से वो संकट में हैं ? अभी हम बुजुर्गो की बात सुन ही रहे थे कि एक जोर की आवाज गूंजने लगी कि उसे "केरी" (गांव की लक्ष्मण रेखा, जो गांव को बुरी बला से बचाती है) की तरफ ले जाने का प्रयास हो रहा है, और अगर उसने उसे "केरी" के बाहर ले गया तो फिर उसे कोई नहीं बचा सकता, हम सभी बच्चे, दादी, चाचियां सब परेशान,

हतप्रद थे कि कौन गिरीश भाई ले जाएगा और क्यूं ? आखिर माजरा क्या है ? सभी गफलत में थे, उधर बुजुर्ग, लड़कों के साथ मिल कर मशाल बना रहे थे, और जल्दी जल्दी उसे रोकने के लिए कह रहे थे। मशाल बनने के बाद सभी बड़े लड़के मशाल जला कर उस दिशा की ओर भागे जहां से आवाज आ रही थी।

उधर दूसरी ओर वो, गिरीश भाई को एक खेत से दूसरे खेत की ओर ले जा रहा था, और गिरीश भाई की जान संकट में थी, अगर शीघ्र उसे ना रोका गया तो वो, गिरीश भाई को मार देगा। सभी लड़के तेजी से भाग रहे थे, परन्तु पहाड़ में उकाल (चढ़ाई) में चढ़ना आसान नहीं होता, खेती सीढ़ी नुमा होती है जिससे एक खेत से दूसरे खेत में जाने में समय अधिक लगता है, फिर भी लड़के ऊपर खेत की ओर भागे जा रहे थे कि किस तरह से गिरीश को "केरी" पार करने से रोका जाए।

इधर गांव में सभी महिलाएं, बच्चे, बुजुर्ग डरे परेशान उस ओर देखे जा रहे थे। मैं बहुत डरा हुआ था, अपनी दादी से चिपका हुआ था, और पूछ रहा था कि दादी क्या हुआ, तो दादी ने बताया कि गांव का एक जवान लड़का ऊपर पहाड़ वाले खेत पर "गोट" पर था, तो उसे "भूत" गांव की "केरी"की ओर ले जा रहा है, जहां उसकी जिंदगी खतरे में है। गांव के सभी लोग उसे बचाने उन खेतों की ओर भागे हैं। ये सुनकर मेरी तो जान ही निकल गई।

तभी एक बार फिर गांव में शोर गूंजा, लेकिन ये शोर पास वाले ताई जी के यहां से आ रहा था। ताई जी बहुत वृद्ध थी। यही कोई ८० साल के आसपास। वो जोर जोर से चिल्ला रही थी, सभी उधर भागे तो देखा कि ताई जी की शरीर में देवी आ गई है, उनकी आंखे लाल हो गई है, उनके वृद्ध शरीर में जान आ गई ऐसा लगता है, वो अपने पैरों में खड़ी थी, जबकि बिना डंडी के ताई चल फिर भी नहीं सकती, तो ये कैसे संभव हुआ कि वो चल रही है। वो सच में साक्षात चंडी लग रही थी। मैंने ये सब अपनी आंखों से देखा तो मुझे विश्वास नहीं हो रहा था, पर ये सत्य है जो मेरे सामने हो रहा है। इसी बीच ताई जी ने एक जोर की छलांग लगाई नीचे उबरा(भूतल)की ओर, सभी अचंभित थे, जो चल नहीं सकती आज भाग रही है दौड़ रही है, सच में असंभव सा था वो मंजर। ताई जी तेजी से खेतों कि ओर दौड़ने लगी, उनकी रफ्तार बहुत तेज थी इतनी कि कोई जवान लड़का भी पहाड़ के खेतों में इतना तेज नहीं दौड़ सकता, वो तेजी से खेतों खेतों से होकर उस तरफ दौड़ रही थी, जिधर गिरीश भाई गांव की केरी पार करने जा रहा था। ताई जी बहुत तेजी से उस तक पहुंच गई और गिरीश भाई को "केरी"से एक खेत पहले पकड़ लिया, इतने में एक जोर का धमाका हुआ जैसे कोई पहाड़ या चट्टान दरक गई हो, उधर गिरीश भाई ताई जी की गोद में बेहोश हो गए। गांव के लड़के भी वहां पहुंच गए, वो ताई जी को वहां खुद से पहले पहुंचे देख कर अचंभित थे, कि एक वृद्धा में ऐसी क्या शक्ति आ गई कि वो उन लोगों से पहले पहुंच गई।

अब सभी लड़कों ने गिरीश भाई को खाट में लेटा कर उन्हें गांव में ले आए। सारे लोग वहां इकठा हो गए थे, ताई जी गिरीश भाई के सिर को मलाश( सिर की मालिश) रही थी और कुछ बुदबुदा रही थी मानो कोई मंत्र पढ़ रही हो, कुछ लोगों ने गिरीश भाई के मुंह में पानी के छीटें मारे जिससे वो धीरे धीरे होश में आने लगे, सभी खुश थे। मैं भी वहां अपनी दादी के साथ ये सब देख रहा था। गिरीश भाई पूछ रहे थे कि उन्हें क्या हुआ ? उन्हें सच में कुछ याद नहीं था, वो बहुत डरे, सहमे से लग रहे थे। कुछ लोगों ने उन्हें आराम से उठा कर बैठा दिया, फिर लोगों ने उनसे पूछा कि तुम्हे कुछ याद है कि क्या हुआ तुम्हारे साथ ? तो वो लड़खड़ाती आवाज में बताने लगे कि रात को खाना खाने के बाद वो उबला भुट्टा खाते खाते अपनी गोट की तरफ पहुंचे, तो तब सब सामान्य था, फिर वो अपनी खाट पर लेट गए और भुट्टा खाने लगे कि उनकी गोट के पीछे वाली छप्पर में कुछ हलचल सी हुई तो वो ये जानने कि कहीं कोई गाय, बैल या बकरियां, ढ्यबरा(भेड़)अपने रस्सी से खुल तो नहीं गए, छप्पर के पीछे भुट्टा खाते खाते चले गए, तो क्या देखते हैं कि एक ढ्यबरा (पहाड़ी भेड़) ऊपर वाली खेत की ओर भागने लगी है, उन्हें लगा उनका ढ्यबरा शायद रस्सी से खुल गया है और वो उसके पीछे ऊपर वाले खेत में उसे पकड़ने दौड़ने लगे, वो भेड़ उन्हें गांव कि केरी की ओर ले जा रही थी, और वो बाशिभूत होकर उसके पीछे दौड़ रहे थे, उन्हें कुछ भी पता नहीं था कि आखिर वो ऐसा क्यों कर रहे हैं, वो तो बस दौड़ रहे थे। तभी ताई जी ने बताया कि वो भेड़ कुछ नहीं एक छलावा( भूत) था, जो रूप बदल कर गिरीश को गांव की केरी के पार ले जा रहा था क्यूं कि गिरीश ने भूना हुआ भुट्टा खाया जो उसे खुले में या रात को अनजानी जगह पर नहीं खाना चाहिए था, ये छलावा भुने हुए चीज पर जल्दी असर करते हैं, अगर छलावा उसे गांव कि केरी के उस पार ले जाता तो गिरीश का बचना मुश्किल था, लेकिन जैसे ही छलावा गिरीश को ले जाने लगा, मुझे, (, ताई जी) देवी की आवाज हुई कि उसे बचा लो और मैं उस ओर दौड़ पड़ी, और गिरीश को बचा लिया।

ये घटना जब भी मेरे जहन में आती है तो मेरे आंखों के सामने फिर से वही परिदृश्य घूमने लगता है कि क्या वास्तव में ऐसा कुछ आज के जमाने में भी संभव है, आज इस घटना को ३० साल से ज्यादा का समय हो गया है पर लगता है कल की ही बात हो।

ये एक सच्ची घटना पर आधारित कहानी है, पहाड़ों में आज भी भूनी हुई किसी भी चीज को खुले में, अनजानी जगहों पर, रात में या कहीं जंगलों में खाने के लिए मना किया जाता है, ऐसा कहा जाता है कि ऐसा करने पर छलावा (भूत) उसे छल लेता है।


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