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Dipti Agarwal

Tragedy Action Thriller


4  

Dipti Agarwal

Tragedy Action Thriller


छौपड़ी

छौपड़ी

17 mins 491 17 mins 491

"दीदी ! मुस्कान दीदी ! बचा लो मुझे" , "मुसु यहाँ ऐसा ही होता आया है ऐसा ही होता रहेगा", " मुस्कान ये सदियों से होता आ रहा है नहीं बदलेगा कुछ भी।"

पसीने से तर्र हालत में हरबड़ा कर मैं नींद से उठी। उफ़ यह ख्याल कब पीछा छोड़ेंगे आखिर १ महीने से ऊपर हो चुका है इस बात को पर मेरे ज़हन में उस रात की एक एक बात शीशे सी साफ़ है। १० अप्रिल, हां वो दिन, कितनी खुश थी उस दिन में जब सुबह सुबह मेरे दरवाज़े पर दस्तक हुई थी और मेरी बचपन की सबसे प्रिय सहेली अश्मिता की शादी का आमंत्रण पत्र मिला था मुझे। मेरे तो पाऊँ के नीचे से ज़मीन ही निकल गयी थी मारे ख़ुशी के। विवाह से ज्यादा ख़ुशी मेरे नेपाल जाने की थी। नेपाल ! हाँ काफी समय से मैं नेपाल जाना चाहती थी अक्सर अश्मिता की तस्वीरों में मैंने उसके गाँव की तसवीरें देखी थी जो की नेपाल में था। मेरी कलम के शब्द शायद उस खूबसूरती को कभी ब्यान नहीं कर पाएंगे जो उन तस्वीरों में झलकती थी। 

आखिरकर वो मौका मुझे अश्मिता के विवाह के रूप में मिल गया था। आज भी याद है मुझे, कितना उत्साहित हो कर मैंने अश्मिता को बधाई देने के लिए फ़ोन किया था और उसने बताया था मुझे की ठीक दो दिन में मुझे नेपाल पहुंचना है।

मैंने शीघ्र सारी तैयारियां शुरू की थी और अगले दिन की ही हवाई जहाज की टिकट्स भी बुक कर ली थी। सुबह तड़के की फ्लाइट थी मेरी काठमांडू के लिए फिर वहां से एक गाड़ी बुक कर ली थी मैंने जो मुझे अश्मिता के घर तक ले जाने वाली थी। समय सीमा के अनुसार सब कार्य कुशलता से होते गए पर मैं नहीं जानती थी की आगे कुछ दिनों में मेरे लिए क्या इंतज़ार कर रहा था।

अपनी फ्लाइट से उतर कर गाड़ी चालक के साथ मैं अपने सपनो की नगरी नेपाल की ओर चली। वो पहाड़ी रास्ते, हरियाली, रूह को दस्तक देती मनमोहक ठण्ड, हवा, सब कुछ सपनो सा प्रतीत हो रहा था। तभी अचानक मेरी नज़र एक अजीब चीज़ की और आकर्षित हुई। छोटी - छोटी झोपड़ियां, जी हाँ हर घर से कुछ थोड़ी ही दूर पर छोटी - छोटी झोपड़ियां बानी हुई थी और वह तकरीबन हर घर के बाहर थी। मुझे उस वक़्त प्रतीत हुआ शायद यह शौचालय हैं जो यहाँ के निवासियों ने अपने घरों के बाहर बना रखें हैं ताकि स्वच्छता का ख्याल रखा जा सके। यह देख कर मैं और भी ज्यादा प्रभावित हो चुकी थी। 

घंटो के लम्बे सफर के बाद आखिरकर मैं अश्मिता के घर पहुंची। लाल- पीले रंग के फूलों से और छोटे- छोटे बल्बों से उसके घर की ईमारत जगमगा रही थी। और हैरत की बात यह थी की अश्मिता का घर जो की किसी हवेली से कम नहीं था उसके घर के बाहर भी वही एक छोटी सी झोपड़ी बनी हुई थी। इतनी बड़ी हवेली ताज्जुब है इसके अंदर ही तो शौचालय बनाया जा सकता था फिर ?

अभी मैं अपने सवालों की उधेड़ बुन में ही थी की अश्मिता मुझे देख दौड़ते हुए मेरे पास आ कर मुझसे लिपट गयी। बधाइयों और सफर की बातों के बाद मैंने अश्मिता से इन झोपड़ियों का ज़िक्र किया। मानो जैसे भूत देख लिया हो उसने कुछ यूँ चौंक गयी और बात को घुमाकर मुझे कमरे का रास्ता दिखा दिया। कमरे में जाते वक़्त मैंने उससे उसकी छोटी बहन सुष्मिता की खोज खबर ली।जवाब में वह फिर से घबराते हुए बोली की सुष्मिता की तबियत कुछ ठीक नहीं वो अपने कमरे में हैं। यह कह कर वो अपने कमरे की ओर रवाना हुई और मैं भी मेहमानो के कमरे की तरफ मुड़ गयी। 

लम्बे सफर से थक हार के मैं सोने चली गयी। शाम करीब ८ बजे के पास कुछ गाने की आवाज़ से मेरी नींद टूटी। अश्मिता की मेहँदी का कार्यकर्म शुरू हो चुका था। मैं भी फटाफट तैयार होकर उस कार्यकर्म में शामिल होने के लिए निकल रही थी। मैंने अक्सर तस्वीरों में अश्मिता का पूरा घर देखा हुआ था और मैं जानती सुष्मिता का कमरा कौन सा है और कहाँ है।

सोचा की चल कर सुष्मिता की तबियत का पूछ आऊं उससे मिल आऊं। मैं सुष्मिता के कमरे की ओढ़ बढ़ी उसके कमरे का दरवाज़ा बाहर से बंध था, ताला लगा था। अजीब है सुष्मिता की तो तबियत ख़राब है वो कहाँ चली गयी शायद वो भी मेहँदी कार्यकर्म में गयी होगी। यह सोच कर मैं भी वहां से निकल मेहँदी कार्यकर्म में गयी। 

पूरा हॉल मेहमानो से खचाखच भरा था। सबने सुष्मिता को घेर रखा था कुछ अजीब सी रस्मे चल रही थी जिनसे मैं परिचित नहीं थी। मैं वहां सुष्मिता और अश्मिता के अलावा किसी को जानती नहीं थी। मेरी आँखें सुष्मिता की तलाश में जुट गयी पर वो कहीं दिखाई ना दी मुझे। तभी अचानक मेरी नज़र एक खिड़की की ओर गयी और मैंने देखा सुष्मिता उस खिड़की के बाहर खड़ी हो कर यह सारा कार्यकर्म देख रही थी। शायद भीड़ से बच कर आराम से कार्यकर्म देखने का तरीका ढूँढा था सुष्मिता ने। मैं तुरंत पीछे के दरवाज़े से निकल कर उस खिड़की की ओर गयी। सुष्मिता को देखते ही मैंने उसे ख़ुशी से गले लगाया। र सुष्मिता डर से पीछे हट गयी मानो मैं अछूत थी या फिर वो। 

 हैरत में मैंने सुश्मिता से उसके इस व्यवहार की वजह पूछी घबराती कुछ छुपाती हुई आवाज़ में वो बोली की उसकी तबयत ठीक नहीं। अगर मैं उसके ज्यादा नज़दीक जाउंगी तो शायद मैं भी बीमार पढ़ जाऊं। यही नहीं उसने मुझसे तुरंत जा कर स्नान करने को कहा। मुझे उसकी बचकानी बातों पर उस वक़्त हसी आयी और मैंने पूरे वाक़िये को मज़ाक में उड़ा दिया। सुष्मिता थोड़े ही समय के लिए वहाँ रुकी और फिर अपने कमरे में जाने का बोलकर वहां से चली गयी। 

कुछ देर बाद मैं भी अपने कमरे की ओर चली अपने कमरे में जाते ही पीछे की ओर की खिड़की खोली मैंने। कुछ घुटन सी लग रही थी। खिड़की खोल कर जो देखा उसे देख कर आँखों पे यकीन ना हुआ और कुछ भी समझ नहीं आ रहा था। 

उस खिड़की के ठीक सामने वह झोपड़ी दिख रही थी जिसके बाहर सुष्मिता हाथ में खाने की थाली लेके झोपड़ी के दरवाज़े के बाहर रख के चली गयी।मैं कुछ भी समझ पाती तभी झोपड़ी के अंदर से सुष्मिता निकल कर बाहर आयी और खाने की थाली लेकर भीतर चली गयी। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था यह क्या हो रहा है। क्या यह झोपड़ी शौचालय नहीं है ? तो क्या है यह ? और सुष्मिता अपनी हवेली को छोड़ के इसमें क्यों रह रही है ? और अश्मिता खाना बाहर रख के जानवरों के तरह क्यों चली गयी ?

सारे सवालों ने मुझे परेशान कर दिया था। मैं सच जान ने के लिए व्याकुल थी। बचपन से मैं और अश्मिता दोस्त थे जानती थी की वो अपनी बहन से कितना प्रेम करती थी। फिर अचानक ऐसा क्या हुआ की जानवर तुल्य व्यव्हार उससे किया जा रहा। वो झोपड़ी इतनी छोटी है की उसमे सांस लेना दूभर हो जाये उसमे कोई रह कैसे सकता है? 

मुझसे रहा नहीं जा रहा था। मैंने तुरंत उस झोपड़ी में जाके सुष्मिता से बात करने का मन बना लिया। दरवाज़े की ओढ़ जैसे ही कदम बढ़ाया तभी अश्मिता दरवाज़ा खोल कर अंदर आ गयी। 

"मुस्कान तुम कहाँ थी मेहँदी में कहीं नज़र ही नहीं आयी। तुमने खाना खाया ? चलो बैठ कर कुछ बात चीत करते हैं। जब से आयी हो तब से तुमसे ठीक से बात भी नहीं हुई। कितना कुछ कहना सुनना है। अश्मिता के चेहरे पे कोई शिकंज नहीं थी। मैं हैरत में थी वो सामान्य व्यवहार कैसे कर सकती है। पर मैंने भी मैं पक्का कर लिया था सच तक पहुंचने का। शायद अश्मिता से खुल के पूछूं तो वो बताये।

" हाँ आशु आओ बैठो बातें करते हैं। सुष्मिता सो गयी क्या ? मैंने सीधे सुष्मिता की ही बात छेड़ी। "

" हाँ हाँ वो सो ही गयी होगी अब तक " अश्मिता ने घबराकर हिचकिचाते जवाब दिया।

अश्मिता मुझसे नज़रें चुराते हुए सोफे पर रखे मेरे सलवार कमीज की तारीफ करने लगी। 

" अरे वाह बेहद खूबसूरत चूड़ीदार है। कहाँ से लिया ?"

"अमृतसर से लिया अश्मिता। आशु इधर आओ बैठो मेरे पास आज दिल खोल के बातें करते हैं जाने कब यह मौका फिर से मिले। "

 अश्मिता सीधे मेरे बिस्तर पर आ कर मेरी गोद में सर रख कर लेट गयी। और हमने अपनी बातों का पिटारा खोला। उसके पति , ससुराल सास , दहेज़ सब हर मुद्दे पे चर्चा शुरू हो गयी। माहौल सामन्य था। पर मेरे ज़हन में अभी भी सुष्मिता का ख्याल दस्तक दे रहा था। और आखिरकार मैंने पुछा।

" आशु हम बचपन के पक्के दोस्त हैं और मुझे लगता है हम एक दुसरे को बेहद करीब से जानते हैं। पर क्या ऐसा कुछ है जो तुम मुझसे छुपा रही हो ?

अश्मिता ने बड़ी हैरानगी से जवाब दिया "नहीं मुसु ऐसा तो कुछ भी नहीं तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो ?"

" आशु मैंने कुछ देर पहले तुम्हे उस झोपड़ी के बाहर खाना रखते देखा और फिर सुष्मिता को बाहर आ कर खाना उठा कर भीतर जाते देखा। अब मुझसे झूठ ना कहना यह क्या चल रहा है ? इतनी बड़ी हवेली होते हुए सुष्मिता उस झपड़ी में क्यों हैं ? और तुम उस जानवरों के जैसे बाहर खाना क्यों रख कर आयी ?

मेरे सवालों को सुनते ही अश्मिता ज़ोर ज़ोर से रोने लगी। मैं काफी सहम गयी उसकी यह हालत देख कर।

बचपन से अश्मिता को देखा और जाना था बेहद खुश मिज़ाज़ किस्म की लड़की रही है उसे इस क़दर रोते बिलकते कभी ना देखा था।

" आशु क्या हुआ तुम ऐसे क्यों रो रही हो ? जवाब दो मुझे चिंता हो रही है। "

"मुस्कान, वो सुष्मिता" बस इतना ही बोली अश्मिता तभी अचानक उसकी माँ ने उसे नीचे आने की आवाज़ दी। अश्मिता तुरंत अपने आँसुओं को पोंछ कर बिस्तर से हड़बड़ा कर उठी। 

" मुसु मुझे जाना है अभी "

" आशु रुको मुझे बात बता कर जाओ "

"मुसु अभी कयामत आ जाएगी अगर कोई आ गया और उसने सुन लिया तो"

"आशु मैं बात सुने बगैर तुम्हे ना जाने दूंगी। मेरा दिमाग सवालों से फटा जा रहा है। "

मुझे इस कदर बेचैन देख कर अश्मिता ने अपना फ़ोन निकाल कर कुछ लिखा और मुझे पकड़ा कर भाग गयी। जाते जाते इतना बोली "तुम्हारे हर सवाल का जवाब इसमें हैं मुसु।"

उसके जाते ही मैंने दरवाज़ा बंध किया और फोन देखा एक वेबसाइट खुली थी जिसमे ऊपर लिखा था "छौपड़ी" और नीचे उसके बारे में विस्तार से लिखा हुआ था। 

जैसे जैसे मैंने पढ़ना शुरू किया मेरे चेहरे का रंग उड़ गया। हाथ -पैर ठन्डे पढ़ गए। मैं जो भी पढ़ रही थी उसपर यकीन करना नामुमकिन लग रहा था मुझे।

 पूरी जानकारी पढ़ने के बाद मेरे हाथ से अश्मिता का फ़ोन गिर गया। मैं लपक के खिड़की की ओर भागी सुष्मिता उस झोपड़ी के बाहर बैठी रो रही थी। मैं तुरंत बिना किसी अंजाम की परवाह किये बिना नीचे भागी और सुष्मिता की झोपड़ी के बाहर पहुंची। अचंभित हो सुष्मिता ने मुझे देखा वो इससे पहले कुछ भी कहती मैंने उसे कस कर गले लगा लिया। वो डर गयी।

"दीदी छोड़िये मुझे किसी ने देख लिया तो कयामत आ जाएगी "

" मुझे परवाह नहीं सुष्मिता। तुमने कोई जुर्म नहीं किया। यह सब धकियानूसी अन्धविश्वास है बस। "

मेरी बातें सुन कर सुष्मिता भी भावुक हो गयी और ज़ोर ज़ोर से रोने लगी " दीदी, मुझे बचा लो। यहाँ डर लगता है। मुझे नहीं रहना यहाँ। मुझे ले चलो यहाँ से। "

इससे पहले की मैं उससे कुछ कह पाती,अश्मिता ने पीछे से कस के मेरा हाथ पकड़ा और ज़बरदस्ती मुझे वहां से खींच कर ले गयी।

मैं उसे समझाती रही पर वो नहीं रुकी। सुष्मिता मायूस आँखों से मुझे देखती रही और फिर रोते रोते झोपड़ी के अंदर चली गयी।

मुझे मेरे कमरे में ले जा कर अश्मिता ने गुस्से से कहा "मैंने तुम्हे केवल जानकारी दी थी मुस्कान कुछ करने के लिए नहीं कहा था। तुम कुछ समझती नहीं हो तुम्हारी एक गलती से वो लोग सुष्मिता को और तुम्हे यहाँ से दूर फेक देंगे। और मेरी शादी भी रुक सकती हैं। मैं तुमसे कल सुबह पूरी बात करुँगी दया करके तुम सो जाओ अभी।"

अश्मिता गुस्से में वहां से चली गयी। सच कहूँ तो शायद मैंने अश्मिता की कही कोई बात सुनी ही नहीं। मेरे कानो में सुष्मिता की सिसकियाँ और जो कुछ भी मैंने पढ़ा था वही सब गूँज रहा था।

मैं पूरी रात बिस्तर पर करवटें बदलती रही सुबह के इंतज़ार में। और फ़ोन पर पढ़ा हुआ वह एक एक शब्द मेरी आँखों के सामने घूम रहा था।

छौपदी (नेपाली: छाउपडी) माहवारी की वर्जना का एक रूप है जो हिंदू महिलाओं और लड़कियों को माहवारी के दौरान सामान्य पारिवारिक गतिविधियों में भाग लेने से रोकती है, क्योंकि उन्हें "अशुद्ध" माना जाता है। कहा जाता है कि छौपड़ी का प्रचलन मुख्य रूप से नेपाल के पश्चिमी भाग में है, लेकिन शहरवासियों के लिए भी यही सच है।

माहवारी के दौरान, महिलाओं को घर से प्रतिबंधित कर दिया जाता है और उनकी अवधि के लिए एक झोपड़ी (मुख्य रूप से देश के पश्चिमी क्षेत्र में), या एक मासिक धर्म कुटी के रूप में जाना जाने वाला एक आवास निवास बनाया जाता है। नेपाल में प्रसव भी इसी तरह के कारावास के रूप में होता है। माहवारी के दौरान, महिलाओं और लड़कियों को रोज़मर्रा के जीवन के कार्यक्रमों में भाग लेने से प्रतिबंधित किया जाता है।

माहवारी वाली महिलाओं और लड़कियों को अपने परिवार से अलग रहना पड़ता है, और घरों, रसोई, स्कूलों और मंदिरों में प्रवेश करने से मना किया जाता है। इस समय के दौरान, वे अक्सर अस्तबल या झोपड़ियों में रहती हैं।कुछ स्थानों में, महिलाएं अपने परिवार से अलग, घर में संलग्न कमरे में रह सकती हैं। इस समय अक्सर महिलाएं एक छोटे गलीचे के साथ फर्श पर सोती हैं। वे परिवार के सदस्यों, विशेष रूप से पुरुष परिवार के सदस्यों को नहीं छू सकते हैं, और भोजन और पानी उन्हें इस तरह से प्रदान किया जाता है जिससे कि स्पर्श ना हो सके। माहवारी वाली महिलाओं को परिवार, धार्मिक या सामाजिक कार्यों में भाग लेने से प्रतिबंधित किया जाता है, जैसे कि मंदिर में जाना या शादियों में जाना, और लड़कियों को स्कूल जाने से रोका जाता है।

जिन महिलाओं को माहवारी होता है उन्हें दूध, दही, मक्खन, मांस, और अन्य पौष्टिक खाद्य पदार्थों के सेवन से रोक दिया जाता है, इस डर से कि उनकी अशुद्धता के कारण गाय बीमार हो जाएंगी। माहवारी के दौरान विशिष्ट आहार में सूखे खाद्य पदार्थ, नमक और चावल शामिल हैं। माहवारी महिलाओं को सामुदायिक जल स्रोतों का उपयोग करने या स्नान या कपड़े धोने जैसे दैनिक कार्यों को करने से रोक दिया जाता है।


महिलाओं को छौपड़ी का अभ्यास करते समय कई स्वास्थ्य और सुरक्षा जोखिमों से गुजरना पड़ता है। झोपड़ियों को अक्सर खराब तरीके से बनाया जाता है और उनमें गर्मी या वेंटिलेशन की कमी होती है, जिससे महिलाओं को साल के अलग-अलग समय में अत्यधिक तापमान के संपर्क में आना पड़ता है। महिलाओं को छौपड़ी का अभ्यास करते समय निमोनिया या दस्त जैसी बीमारियां होने का खतरा होता है, और सांप और अन्य जानवरों द्वारा हमला करने की भी संभावना होती है। यदि सर्दियों के दौरान खुद को गर्म रखने के लिए झोंपड़ी में आग जलानी पड़े, तो श्वासावरोध का खतरा अधिक होता है। छौपड़ी का अभ्यास करते समय महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले भी सामने आये है।

जबकि सटीक संख्या उपलब्ध नहीं है, महिलाओं और लड़कियों को हर साल छोपड़ी में रहने के कारन मौत का और बिमारियों का सामना करना पढता है। विशेष रूप से नेपाल के दूर और मध्य-पश्चिमी क्षेत्रों में, कई मौतें सीधे इन झोपड़ियों के उपयोग से संबंधित हैं।

 ये कुछ उदाहरण हैं मौतों के जो छोपड़ी के कारण हुई हैं:

जनवरी 2010 में एक 11 वर्षीय लड़की की मृत्यु माहवारी में झोपड़ी में रखे जाने से दस्त और निर्जलीकरण से हुई। उनके परिवार और पड़ोसियों दोनों ने उन्हें अस्पताल लाने से मना कर दिया क्योंकि उनका मानना था कि वे अपवित्र हो जाएंगे, उन्हें नहीं छूना चाहिए।

मई 2017 में, 14 वर्षीय ललसारा बीका की मृत्यु माहवारी में झोंपड़े में रहने से, एक गंभीर ठंड से संबंधित बीमारी के कारण हुई।

जुलाई 2017 में 19 वर्षीय तुलसी शाही की मृत्यु एक सांप द्वारा उसके सिर और पैर पर काटे जाने से हुई थी। वो एक गाय के तबेले में माहवारी में रह रही थी जिसे वो झोपड़ी के रूप में इस्तेमाल कर रही थी।

जनवरी 2019 में, अंबा बोहोरा, एक 35 वर्षीय नेपाली माँ और उनके बेटों, जिनकी उम्र 9 और 12 वर्ष की थी, उनकी माहवारी में झोपड़ी में रहने के दौरान मृत्यु हो गई।

फरवरी 2019 की शुरुआत में, 21 साल की पार्वती बोगती की दम घुटने से मौत हो गई।

सोर्स  विकिपीडिया

सुबह उठते ही मैं सुष्मिता से मिलने के लिए उसकी झोपड़ी की ओर भागी। झोपड़ी में कोई नहीं था। मैंने आगे पीछे भी देखा पर सुष्मिता कहीं नहीं दिखी। सोचा थोड़ा आगे गली के मोड़ तक देख आऊं उसे। 

मैं थोड़ी दूर ही गयी थी की एक दुसरे घर के बाहर बनी झोपड़ी के पास सुष्मिता खड़ी थी। वो उस झोपड़ी के बाहर किसी लड़की से बात कर रही थी। उसके पास जा मैंने उसे पुकारा। मुझे देख कर वो चौंक गयी। 

"मुस्कान दीदी आप इतने सुबह यहाँ क्यों है?"

"तुमसे कुछ बात करनी थी मुझे सुष्मिता।"

"हाँ दीदी, बताइये"

"यहाँ नहीं, चलो चलते चलते बातें करते हैं तुम मुझे थोड़ा गाओं भी दिखा देना अपना और सुबह की सैर भी हो जाएगी।"

"ठीक है दीदी। क्या मैं अपनी दोस्त श्रुति को भी साथ ले लूँ?"

"हाँ ले लो।"

हम तीनो गाँव की ओर निकले। 

मुझे समझ नहीं आ रहा था की मैं सुष्मिता से किस कदर बात शुरू करूं? झिझक और डर ने मेरे दिमाग को घेर लिया था। तभी अचानक एक ख्याल आया। मैंने तुरंत अपना फ़ोन निकाला और सुस्मिता को एक मैसेज किया। 

"मुस्कान दीदी, आप मेरे साथ चल रहे हो और मैसेज भेज रहे हो। क्या है मैसेज में?"

" कुछ नहीं, किसी दोस्त ने एक अच्छी जानकारी दी तो मैंने सोचा तुम्हे भेज दूँ। पढ़ कर देखो।"

मैंने सुष्मिता को वही जानकारी भेज दी थी जो बीती रात अश्मिता ने मुझे भेजी थी।

सुष्मिता ने जैसे ही वो मैसेज पढ़ा वह चलते चलते रुक गयी। तभी उसकी सहेली ने उसके हाथ से उसका फ़ोन लिया और मैसेज पढ़ा थी। उसकी सहेली भावुक हो गयी और रोने लगी। दोनों बुत बन गयी थी। 

"सुष्मिता इसमें हैरान या शर्म आने की कोई बात नहीं है और ना ही तुम दोनों ने कोई गलती की है ना ही कसूर भर भी है तुम्हारा।" 

मेरी बातें सुनकर सुष्मिता तो कुछ ना बोली पर उसकी सहेली रोते हुए बोली

"दीदी, यह सब किताबी बातें है पढ़ने और जीने में बहुत अंतर होता है। आपको अंदाज़ा नहीं है दीदी हम किस खौफ्फ़ और ज़िल्लत में जीते हैं। कहने को तो यह नया युग है नयी सोच वाली पीढ़ी है पर यहाँ आ कर देखे | कुछ नहीं बदला। अन्धविश्वास के नाम पर बस हमारा शोषण हो रहा है।

७ दिन उस छोटी सी झोपड़ी में चटाई बिछा कर रहते हैं हम ना स्वछता, ना साफ़ पानी, ना सफाई। हर दिन कोई लड़की किसी ना किसी रोग का शिकार हो जाती है।

आज कल के बुरे माहोल में रात के वक़्त घर से बाहर इस झोपड़ी में रहना जिसका दरवाज़ा तक नहीं है , हर पल खौफ्फ़ में गुजरता है कहीं कोई दुष्कर्म ना हो जाये हमारे साथ। इंसान से बचने का सोचें तो जंगली जानवर , सांप, बिच्छू, सब ताक बिछाये बैठे होते हैं। कभी कभी तो लगता है भैंस, भेड़, बकरी, इन सब में और हममे ज्यादा अंतर नहीं हैं।"

श्रुति का गला यह कहते कहते भर चुका था और आँखें पानी से तर्र थी। 

"तुमलोग आज के ज़माने के हो देखो जब तक तुम इसका बहिस्कार नहीं करोगे कोई कानून कुछ नहीं कर पायेगा। तुम्हे आगे बढ़के लड़ना होगा।

लड़ना, बहिष्कार , दीदी आप को क्या लगता है कभी किसी ने आवाज़ नहीं उठाई इसके खिलाफ। उठायी पर जानते हैं क्या होता है उसके साथ ?

क्या होता है ? सहमी आवाज़ में मैंने श्रुति से पुछा।"

तभी कुछ दूर में काफी भीड़ दिखाई दी और शोर हो रहा था। रोने की आवाज़ें भी आ रही थी। हम तीनो तुरंत वहां गए। देखा तो एक लड़की की लाश ज़मीन पर पढ़ी थी और कुछ औरतें उसके पास बैठी रो रही थी। 

श्रुति और सुष्मिता वहां की भाषा में उनसे पूछ -ताछ करने लगी। जाने क्या कहा उन लोगों ने की सुष्मिता रोती हुई वहां से भाग गयी। मैं सुष्मिता के पीछे भागने लगी थी की श्रुति ने मेरा हाथ पकड़ लिया।

उसे जाने दो दीदी, उसे कुछ देर अकेले छोड़ दो उसे यह सब की आदत पढ़ना ज़रूरी है। यह उसका पहली बार है। अभी देखेगी समझेगी तो बरदाश्त करना सीख लेगी।

"पर हुआ क्या है ? मैंने पुछा।

दीदी हमारी एक सहेली की सांप के काटने से मौत हो गयी। वो भी कल रात झोपड़ी में थी। 

उसके भी माहवारी थी ? मैंने घबराकर फिर पुछा।

नहीं दीदी। 

आपके सवाल का जवाब शायद आपको मिल गया होगा दीदी। वो सवाल जो कुछ देर पहले आप मुझसे पूछ रही थी। "

मैं सुन्न पढ़ गयी थी। पॉंव से ज़मीन निकल गयी थी। समझ चुकी थी की बहिष्कार का अंजाम क्या था।

कितने नियम -कानून , संस्थाएं, हमारी मदद के लिए आ चुकी हैं पर कोई फायदा नहीं । शहरों में तो सब ठीक है पर गाओं में कुछ नहीं बदला। चलती हूँ दीदी, किस्मत रही तो फिर मिलेंगे। आप अश्मिता दीदी की शादी के बाद चले जाना यहाँ से।

श्रुति मायूस सा चेहरा ले कर वहां से चली गयी। उसकी भुझी सी आंखें उसका दर्द ब्यान कर रही थी।

मैं भी वहां से वापस सुष्मिता के पास लौट गयी सुष्मिता अपनी झोपड़ी में रो रही थी। तभी अश्मिता मुझे ढूंढती हुई आयी और अपने साथ ले गयी। शादी थी उस दिन उसकी। मैं हर ख्याल को नज़रअंदाज़ कर उसकी शादी के समारोह में शरीक हुई। सब अच्छे से हो गया, अश्मिता की बिदाई भी। सुष्मिता हर रिवाज़ को दूर से खड़ी देखती रही बस अपनी बहन को विदा करने भी ना आ सकी।

अश्मिता की बिदाई के बाद मैंने भी घर वापस जाने का मन बना लिया और सुबह की ही टिकट भी काट ली। रात भर सोई नहीं हर ख्याल दिल में खौफ्फ़, गुस्सा, और बेबसी छोड़ जाता। 

यह रिवायत यह परंपरा के नाम पर होता अन्धविश्वास यह कब तक इंसानो की बलि लेता रहेगा ? आखिर कब हम समझ पाएंगे की हर रिवाज़ इंसान की सहूलियत के लिए बनाया गया था? प्रतारणा के लिए नहीं बिलकुल नहीं। 

अगले दिन सुबह अश्मिता के माता पिता को प्रणाम कर मैं घर के लिए निकली। जाने से पहले सुष्मिता की झोपड़ी के पास गयी सुष्मिता फिर से वहां नहीं थी। मैं समझ गयी वो श्रुति के पास होगी। मैं तुरंत श्रुति की झोपड़ी की ओर मुड़ी।

श्रुति की झोपड़ी के बाहर भीड़ लगी थी। मेरे पैर कांपने लगे, हाथ से सामान से लदा बक्सा भी छूट गया। कल जो भी कुछ मैंने देखा था वो सब मेरी आँखों के सामने दौड़ रहा था। हाथ की मुट्ठी को कास कर दबाये, ठण्ड में पसीने से तर्र कांपते हौले कदमो से मैं भीड़ के पास गयी।

सुष्मिता ज़ोर ज़ोर से चीख कर रो रही थी। मेरा डर सच में तब्दील हो चुका था। हाँ श्रुति की लाश ज़मीन पर पढ़ी थी। मैं यह देख कर ज़मीन पर सदमे से गिर गयी।

जाने क्या हुआ मुझे उस पल वहां से तुरंत उठ भागने लगी, अपना सामान उठाया और ज़ोर से भागी। कुछ दूर पर मेरा गाड़ी चालक इंतज़ार कर रहा था। 

मैं भागती हुई उसमे जा बैठी। गाड़ी चालक ने गाड़ी शुरू की मैं डर से हांफ रही थी। 

"मैडम जी आप ठीक हैं ना? सब ठीक है ना ?"

उसे बिना जवाब दिए मैं पीछे मुड़ कर देखा। सुष्मिता रोती हुई मुझे अलविदा कहने के लिए हाथ हिला रही थी। मेरे अंदर कुछ टूट गया उस लम्हा।

क्या मैं सुष्मिता से वापस मिल पाऊँगी ? यह सोचते सोचते खुद को संभाल रही थी। मेरी गाड़ी हीँ गलियों से गुजर रही थी। फिर से दिखाई दी एक झोपड़ी और उसके बाहर बैठी मायूस आँखों से देखती लड़कियां।


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