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Arya Jha

Drama

3  

Arya Jha

Drama

बवंडर

बवंडर

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जुलाई के महीनें की एक शाम.... एनजीओ तक पैदल ही जा रही थी कि अचानक आई जोर की बारिश और तूफान से परेशान होकर मैं मार्ग में पड़ रहे रेलवे स्टेशन की ओर मुड़ी। शायद मुझे किसी से मिलना था तभी आज मौसम अचानक बिगड़ा। वहाँ मेरी नज़र एक मासूम सी महिला पर पड़ी जो गोद में बिटिया को चिपकाये हुए हनुमान चालीसा पढ़े जा रही थी।

उसके नजदीक पहुँच कर मैंने पूछा, "अकेली हो?" उसने इशारे से एक 12 वर्षीय लड़के को दिखाया इतनी उम्र तो ना लगती थी कि दो बच्चों की माँ हो। ज्यादा से ज्यादा 26 की होगी। कुछ बोल नहीं रही थी पर चेहरा बता रहा था कि उसके अंदर तूफान नहीं बल्कि बवंडर चल रहा था। उसकी ख़ामोशी मेरी जिज्ञासाएँ जगा रहीं थीं। उसकी बच्ची को अपनी गोद में ले लिया.. माय गॉड! दिखने में गुड़िया सी और छूने में फूल सी बच्ची, रुई के फाहों सी सफ़ेद व हल्की, बिल्कुल सीने से चिपक गयी। बच्ची के अलग होते ही उसकी आँखे बरसने लगीं। लगता था, बिटिया ने ही पेपरवेट की तरह उसकी भावनाओं के पन्नों को ठहराव दे रखा था।

फिर, जो कुछ उसने कहा वह मुझे हिलाने के लिए काफी था। "मेरा नाम राधिका है। पति मुंबई में काम करते हैं, नयी नौकरी है इसलिए अभी बहुत जिम्मेवारियां नहीं उठा सकते। मैं स्कूल में टीचर थी। पर पहला प्रसव मायके में होना चाहिए ये कहकर मुझे ससुराल वालों ने मायके भेज दिया और मायके में हर आने-जाने वालों के प्रश्नों से परेशान होकर मैं, ससुर जी के अनुरोध पर, अपने पिता के साथ, ससुराल आ गयी। यहाँ की आबो हवा मेरी बच्ची के लिए ठीक नहीं है। ये यहाँ बीमार ही रही इसलिए वापस मायके जा रही हूँ |"  

 "पर यूँ अकेली ? ट्रेन का सफर करोगी ? कोई ऐसी-वैसी बात हो गयी तो? कोई बड़ा साथ तो होना चाहिए। अपने पिता या भाई को बुला लेतीें?" मैंने कहा। "दीदी ! छोटे देवर का साथ है। चार महीनें पति के बिना ससुराल में रही हूँ।

पति तो बहुत बड़ी ढाल होता है। चाहे जैसा भी हो। बहुतों से सुरक्षा मिलती है। मैं क्या करती हूँ क्या नहीं, मेरी हर गतिविधि पर सबकी नज़रें टिकी रहतीं। मानों घर ना हो कोई मॉल हो जहाँ सीसीसी कैमरे में मैं क़ैद हूँ। सुरक्षा देती नज़रों और अनकम्फर्टेबल करती नज़रों का फ़र्क़ समझ गयीं हूँ। "

उम्र में बड़ी देख कर जाने कब वह छोटी बहन बन बैठी थी। उसकी बातों पर मुझे हँसी आ गयी। "ऐसा क्या हुआ ससुराल में ?" मैंने पूछा ? "कुछ नहीं दीदी! बस घर जैसी सुरक्षा नहीं महसूस होती। सासूमाँ बीमार रहतीं हैं। ससुर जी का ही बोल-बाला है। काश! मेरी सास इतनी स्वस्थ व दृढ होतीं कि वह अपने और घर की सभी महिलाओँ के सम्मान के लिए आवाज उठातीं। कम से कम बहुओं के लिए सुरक्षित माहौल तो होता।

जहाँ माँ या सास मज़बूत होतीं हैं वहीँ बहु-बेटियाँ खुशहाल रह सकतीं हैं। वहाँ रहते हुए एक ही बात बार-बार मेरे जेहन में घूमती रही -"मेरे पति यहाँ नहीं पर कहीं तो हैं। आज नहीं तो कल वो मुझे लेने आएंगे फिर सबकुछ पहले जैसा खुशहाल हो जायेगा पर फौजियों की विधवाओं का क्या? वे कैसे जीती होंगी जिन्हे पिया के लौटने की उम्मीद भी ना हो। इन चार महीनों में मैं बहुत मज़बूत हो गयी। अब भीड़ में भी खुद को सुरक्षित महसूस कर रही हूँ।"

उसकी मासूमियत भरी बातें और विरह का दर्द मेरी आँखों से बहने लगा था। उसे सांत्वना देने चली थी फिर रोकर कमज़ोर कैसे पड़ सकती थी। उसका "पेपरवेट" उसके हवाले कर मैं वाशरूम की ओर भागी। वापस लौट कर आयी तो राधिका जा चुकी थी। शायद उसकी ट्रेन आ गयी थी। मैंने आँखें बंद कर लीं और ध्यान करने लगी। ईश्वर उस युवा माँ को उसके गंत्वय तक सुरक्षित पहुँचाए। मैंने तो बस उसका दुःख सुना था, पर उसने देखा था और जाते-जाते जो सन्देश वह मुझे दे गयी वह लाख टके का था। अब मुझे एक उद्देश्य मिल गया था। फौजियों की युवा विधवाओं के पुनरूद्धार पर काम करना होगा।

यही विचार कर मैं अपने एनजीओ की ओर चल पड़ी। राधिका के जाते ही मौसम थम गया था। ईश्वर माँ -बेटी की रक्षा करे और उसे जल्दी ही अपने पिया का साथ मिले। मेरी दुआओं में वो दो चेहरे शामिल हो गए थे। दोस्तों एक नहीं, कई राधिकाएँ हैं जो संघर्ष करती हुयी बच्चों को बड़ा करती हैं। प्रसव पीड़ा की वेदना देखने के बाद वह इतनी बहादुर हो चुकी होती हैं कि उनमें जीवन -मृत्यु के खेल का भय समाप्त हो जाता है।


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