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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

Inspirational

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Dr. Vijay Laxmi"अनाम अपराजिता "

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बुन्देलखण्ड का मिनी वृंदावन 3

बुन्देलखण्ड का मिनी वृंदावन 3

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वीर सिंह जूदेव महल।यह दतिया शहर के पश्चिमी किनारे पर यह महल एक सूनसान चट्टान पर स्थित है । इस महल को अन्य नामों से भी जाना जाता था सतखंडा महल,नृसिंह महल ,गोविंद महल ,वीर सिंह जूदेव महल के नाम से भी जाना जाता है ।


महाराज वीर सिंह जू देव व शहजादा सलीम(अकबर पुत्र जहांगीर)की मित्रता का प्रतीक यह महल मध्यकालीन स्थापत्य काल का उत्कृष्ट नमूना कहा जाता है ।वीर सिंह जूदेव विख्यात बुंदेला नरेश मधुकर शाह के चौथे पुत्र थे । इनकी माता का नाम कुवंर गणेशी बाई था ।

यह महल किला चौक से लगभग 10 मिनट पैदल रास्ते में पड़ता है । यह महल उसी स्थान पर बनाया गया है जहां अकबर पुत्र सलीम से वीर सिंह जू देव ने मुलाकात की थी।


महल में लगभग 450 कमरे हैं बीच-बीच में आंगन है ।महल की छत से दतिया शहर बड़ा ही खूबसूरत और भव्य दिखता है । महल में गंदगी का अंबार है इमारत भव्य व आकर्षक होते हुए भी उपेक्षित है ।कोई टिकट भी नहीं है ।


इस महल के बारे में कहा जाता है कि इसके 7 खंड जमीन से ऊपर और 2 खंड जमीन से नीचे हैं । (कुल खंड 9 हैं) स्वास्तिक के आकार के इस सतखण्डे महल के प्रत्येक खंड में चार चौके व बीच में एक मंडप है । इसके चारों कोनों पर अष्टकोणीय मीनारें हैं । विभिन्न प्रकार की छतरी और गुंबद भी बने हुए हैं ।

इसकी वास्तुकला राजपूताना व मुगलकालीन शैली से प्रभावित है । महल का एक भाग अपूर्ण है जिससे अनुमान लगाया जाता है कि हो सकता है कि महाराजा वीर सिंह ने इसका निर्माण अपने अंतिम समय में कराया हो और बीच में ही उनकी मृत्यु हो जाने के कारण यह महल पूरा न हो अधूरा रह गया हो ।

इस महल में आश्चर्य का विषय है कि कहीं भी लकड़ी या लोहे का प्रयोग नहीं किया गया है ।पूरा महल पत्थर से ही निर्मित है ।

1676 में उनकी मृत्यु के बाद राज्य 1802 बेसिन की संधि के तहत बुंदेलखंड के अन्य क्षेत्रों के साथ ब्रिटिश नियंत्रण में चला गया था । वीर सिंह जूदेव ने 52 महल बनवाए थे उन में यह सबसे बड़ा और भव्य है ।


इस महल में शाही परिवार का कोई भी सदस्य कभी नहीं रहा है । इस महल को अकबर पुत्र शहजादा सलीम ने वीर सिंह जूदेव को ही भेंट कर दिया था महल की बुंदेला चित्रकारी, इंटीरियर, मेहराब ,सुंदर व आकर्षक भित्ति चित्र हैं। यह लगभग 400 साल पुराना है।


कहते हैं इस महल के निर्माण में 9 वर्ष का समय लगा और 35 लाख रुपए खर्च किए गये ।महल के कुछ भाग अपूर्ण है ।महल का पूरबी भाग सर्वाधिक भव्य तथा आकर्षक है ।महल के सभी छतों पर चित्रकला भित्ति चित्र तथा पत्थर पर उकेरी गई कलाकृतियां आज भी मनोहारी हैं ।


महल के पूर्वी भाग में ही प्रवेश द्वार स्थित है ।महल में पत्थर की जालियों पर की गयी नक्काशी अत्यंत आकर्षक व सुंदर है । इस महल की विशेषता यह भी है कि चारों तरफ से एक जैसा है । इसमें एक मंजिल से दूसरी मंजिल पर जाने के लिए अनेक रास्ते व सीढ़ियां हैं ।पर अब इन सब को बंद कर दिया गया है ।

पर्यटक अक्सर यहां रास्ता भटक जाते हैं । इसे भूल भुलैया महल भी कहते हैं ।वर्तमान में वीर सिंह जूदेव महल को पुरातत्व विभाग के संरक्षण में सौंप दिया गया है। मै कोविड के पहले ही गयी थी।शायद अब यहां टिकट लगने लगा है


राज गढ़ पैलेस 


यह दतिया बस स्टैंड से थोड़ी दूर राजगढ़ किला चौक के पास है ।दतिया किला आम किलों की तरह न होकर शहर के अंदर ही है । राजगढ़ पैलेस दतिया के किले के अंदर ही बना है।

यहां का किला अभी उत्तराधिकारियों के अधिकार मे ही बताया जाता है ।अंदर प्रवेश मार्ग के दाहिनी ओर एक तोप रखी है ।राज परिवार अभी यही रहता है ।यह आम जनता के लिए बंद कर दिया गया है ।यह पीताम्बर पीठ के नजदीक ही है ।इसी के पास सीता ताल है ।आज सब ये भग्नावस्था मे ही है ।


राजगढ़ महल को बुंदेला राजा शत्रुजित जी ने बनवाया था ।इसे राजगढ़ पैलेस भी कहते हैं । राजगढ़ पैलेस जनता के लिए बंद कर दिया गया है । पूरा महल ईटों पत्थरो व चूना से ही बनाया गया है।

चित्र गूगल से साभार। 


इसके प्रवेश द्वार पर बड़ी माता का मंदिर (विजय काली पीठ) है ।ये राजपरिवार की कुलदेवी हैं ।इसके सामने ही लक्ष्मी नारायण मंदिर है ।

महल के पास में ही पुरातत्व संग्रहालय की बिल्डिंग है । जिसका कोई अलग से टिकट भी नहीं है । पर अब यह कहीं दूसरी जगह बदल दिया गया है ।

और भी बहुत से स्थान है पर आज भग्नावशेष मात्र ही अपनी भव्यता के गौरव पर आंसू बहा रहे है ।


हनुमानगढ़ी 

हनुमानगढ़ी के नाम से यहां पर एक प्राचीन हनुमान जी का मंदिर है । इस प्रतिमा की विशेषता है बजरंगबली शनिदेव को अपने पैरों में दबाए हुए हैं । यहां पर 30-35 सीढ़ियां चढ़कर ऊपर जाना पड़ता है ।यहां एक सेल्फी प्वाइंट भी बनाया गया है कि पर्यटन को बढ़ावा मिले ।

करन सागर 

पितांबरा पीठ से 3 किमी.की दूरी पर एक खूबसूरत तालाब है किनारे पर दतिया राज घराने के शासकों के बैठने की सुन्दर छतरियां बनी हैं ।जो किसी समय बहुत ही आकर्षक रही होंगी। 

पंचम कवि की टोरिया

यह ऊंची पहाड़ी पर है घने जंगल के बीच मे ।यहां सीढ़ियां बहुत है ।हनुमान जी वह बाबा भैरव नाथ के मंदिर हैं । इस पहाड़ी से पूरे दतिया शहर का नजारा दिखाई पड़ता है। यहां से वीर सिंह जू देव का महल भी दिखाई पड़ता है ।


गणेश जी का मंदिर है बहुत ही सुंदर बना हुआ है ।यहां पर अधिक भीड़ नहीं होती है ।मंदिर के अंदर एक बावड़ी( कुंड) है।


सभी स्थान उचित रख-रखाव के बिना अपनी दुर्दशा पर आंसुओ मे डूबी इमारत नजर आते हैं। 


तंत्र में 10 महाविद्याओं का विशेष महत्व है । इनकी उपासना साधना विशेष फलदायिनी कही गई है । 10 महाविद्याओं में से सात दतिया में अलग-अलग स्थानों पर है । छह दतिया शहर में सातवीं बड़ौनी कस्बे में हैं । 

1--मां धूमावती 

2--मां बगलामुखी दोनो मां पीतांबरा पीठ में ।

3--तारा मां पंचम कवि की टोरिया में 4--काली मां हनुमानगढ़ी में 

5--मां त्रिपुर सुंदरी बख्शी के शंकर जी के मंदिर में (भांडेर रोड)

6-- छिन्नमस्ता मां बरौनी कस्बा में 7--भैरवी गांगौटिया मंदिर सीता सागर के पास में ।

हो सकता है उस समय तंत्रोपासक राजा रहे हों ।

इन मे से 3-4 स्थान समयाभाव के कारण नही जा सकी।

हां किला चौक पर कुल्हड चाय का आनन्द लिया था बहुत अच्छी थी पर दूकान का नाम नही याद आ रहा ।वहीं समीप मे स्वादिष्ट चाट भी खाई थी ।


दतिया मे पर्यटन स्थल की बहुत ही अच्छी संभावनाए है बस थोड़ा ध्यानाकर्षण की आवश्यकता है ।ये एक ऐतिहासिक व आध्यात्मिक तांत्रिक व जैन संप्रदाय का प्रसिद्ध स्थल है ।



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