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Prabodh Govil

Abstract

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Prabodh Govil

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बसंती की बसंत पंचमी- 16

बसंती की बसंत पंचमी- 16

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धीरे- धीरे दिन निकलते जा रहे थे। दुनिया बदलती जा रही थी। घर - घर की कहानी एक सी ही होती जा रही थी। परिवार सिमट- सिकुड़ कर घर में ही कैद रह गए थे।

लोग भूलने लगे थे कि कभी उनके पास घर के कामकाज के लिए घरेलू नौकर, ड्राइवर, काम वाली बाई आदि हुआ करते थे।श्रीमती कुनकुनवाला भी कई दिन तक बेटे के फ़ोन की जासूसी करने के बाद अब लापरवाही से सारी बात भुला बैठी थीं। क्या करतीं, उन्हें वैसा कोई संकेत मिला ही नहीं कि बेटा किसी प्रेम - वेम के चक्कर में है। फ़िर बिना बात ख़ुफ़िया तरीके से उसके फ़ोन सुनने का क्या मतलब था।

बेटा जॉन फ़ोन करता ज़रूर था, मगर वो किसी एक लड़की के ही संपर्क में नहीं था। कभी कोई, कभी कोई आवाज़ उसके फ़ोन से आती। अब अगर जवान लड़का रोज़ - रोज़ कई - कई लोगों से बातें करता रहेगा तो वो किसी की आशिक़ी के चक्कर में तो नहीं ही होगा। चाहे उससे बातें करने वाले लड़के हों, या लड़कियां।

जाने दो, श्रीमती कुनकुनवाला को क्या करना? अब बच्चे सारा दिन घर में बंद रहेंगे तो कुछ तो करेंगे ही। हो सकता है उनका बेटा जॉन भी किसी प्रोजेक्ट के बाबत सोच रहा हो और कोई काम करने की योजना बना रहा हो।

अब धीरे- धीरे स्थिति सामान्य होने लगी थी। कभी- कभी खबरें आतीं कि सरकार एक- एक करके सेवाओं को, बाजारों को खोलने की अनुमति देती जा रही थी। 

श्रीमती कुन कुनवाला ने देखा कि अब आसपास के घरों में काम वाली बाइयों ने आना शुरू कर दिया है।उनका माथा ठनका। अब उनके दिल में भी आस उठी कि उन्हें भी कोई काम वाली मिल जाए।उन्होंने एक- एक करके अपनी सभी सहेलियों की टोह लेने की कवायद भी शुरू कर दी। किसकी बाई काम पर लौटी, किसकी नहीं लौटी।लेकिन सबको एक बात की बड़ी हैरानी थी।



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