बीती रात

बीती रात

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कमली उस रात कमल के खिलते फूलों के सामने खड़ी दलदल को देखते हुए पुरानी यादों में खोई थी,

"कमली सुनो,बाहर खड़े-खड़े क्या देखती रहती है कौन है वहां पर,जिसे रोज सुबह देखा करती है तू।"-

(कमली की मां उससे पूछती है)

"क्या मां हमको पढ़ने लिखने का हक नहीं,? 

हमें भी स्कूल जाना है पढ़ लिख कर उन बच्चों के जैसे बनना है।"

-(कमली उत्साह से अपनी मां से कहते हैं।)

"बेटी हम लोग रेड एरिया में रहते हैं हमको यह हक नहीं, मैं चाहती भी हूं कि तू स्कूल जाएे, पर कोई भी स्कूल तुझे नहीं लेगा, हम बदनसीब लोग हैं।"-

(सिसकती हुए कमली की मां ने कहा।)

नहीं मां मैं कुछ नहीं जानती, मुझे तो स्कूल जाना है,वह यूनिफॉर्म पहनना है,स्कूल बैग और जूते भी चाहिए मुझे तो जाना ही है।-

(कमली पैर पटकते हुए फर्श पर लोटपोट हो रही थी, लगातार बोले जा रही थी।)

मां लगातार प्यार से समझाने की कोशिश कर रही थी।

'कमली ज़िद ही कर रही थी तभी नीचे कुछ महिलाएं एनजीओ के माध्यम से आई हुई थी वह सभी बच्चों को इकट्ठा कर रही थी, कमली को भी बच्चे बुलाने आते हैं थोड़ी नखरे के बाद मां के साथ कमली भी नीचे आ जाती है।'

'देखो बहनों हम एनजीओ के माध्यम से आप लोगों के पास आए है और आप सब के बच्चों को पढ़ाने के लिए सरकार की मदद से हम लोगों व आपके बच्चों को स्लेट पेन और कॉपी किताबें देंगे और रोज आप को पढ़ाने आया करेंगे जिससे आपके बच्चे भी कुछ पढ़ लिख सके हमें आप लोग की सहयोग की आवश्यकता है।'

'सभी बच्चे वह महिलाएं खुश थी अब रोज वह मन लगाकर पढ़ रही थी।'

कुछ ही दिनों में कमली और उसके साथियों सभी बच्चे बहुत अच्छे से पढ़ने लगे थे,एनजीओ की महिलाओं ने भी बहुत मदद और बहुत मेहनत की थी उनको पढ़ाने के लिए प्रेरणात्मक संदेश वह कहानियां सुनाया करती थी इस प्रोत्साहन के कारण ही वे लिखना-पढ़ना सीख चुकी थी, प्राथमिक शिक्षा के लिए एनजीओ की एक छोटी सी संस्था ने स्कूल में एडमिशन दिला दिया था जिससे वह प्राथमिक शिक्षक प्राप्त और अच्छे से कर सकें।

"कमली अब बहुत अधिक खुश थी और वह पूरी मेहनत से पढ़ रही थी।

आज कमली और उसकी कई साथी लड़कियां पढ़ लिख कर काबिल बन चुकी थी।

वे एनजीओ के प्रमुख के पास धन्यवाद देने जाती हैं और उनसे आशीर्वाद लेती हैं उस रात वह खुश होकर बोली---- अब अंधेरी रात छट चुकी है मुझे अब लग रहा है, मानो दलदल में भी बीती रात कमल दल फूले !"


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