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Prabodh Govil

Abstract


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भूत का ज़ुनून-16(अंतिम भाग)

भूत का ज़ुनून-16(अंतिम भाग)

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भटनागर जी को अचंभा हुआ। ये तो उन्हें अब पता चला कि बेटे के कॉलेज में उत्सव है, उन्हें सपरिवार वहां आने का न्यौता दिया गया है लेकिन उन्हें सुबह से ही वहां जाने की इच्छा होने लगी थी और उन्होंने ऑफिस से छुट्टी लेकर वहां जाने की तैयारी भी कर ली। जैसे उन्हें कोई पूर्वाभास हो गया हो।

ज़रूर कोई न कोई परा भौतिक शक्ति काम तो कर रही है। किंतु अच्छी बात ये थी कि इस शक्ति ने अब तक उन्हें कोई नुक़सान नहीं पहुंचाया था। उन्हें मानसिक रूप से चिंता के अतिरिक्त कोई कष्ट तो नहीं हुआ।

चलो, अब कुछ दिन घर- दफ़्तर से बाहर रह कर उनका मन भी शायद बदल जाए।

पत्नी तो उनसे भी ज़्यादा प्रसन्न दिखाई दे रही थीं। कल दोपहर को निकलना था पर उन्होंने बेटे के नाश्ते के लिए ले जाए जाने वाले व्यंजनों की तैयारी तो अभी से शुरू कर दी थी।

थोड़ी देर के लिए भटनागर जी भी भूत बाधा को भुला बैठे थे और पत्नी की ख़ुशी उनकी भी ख़ुशी बन कर उन पर तारी हो गई थी।

बेटे को भी फ़ोन से खबर कर दी गई थी।

बेटा जो हमेशा अपनी पढ़ाई को लेकर दबाव में रहता है अब कितना ख़ुश होगा अपने मम्मी पापा को वहां अपने कॉलेज और शहर में देख कर।

जब से बेटे ने इंजीनियरिंग कॉलेज में प्रवेश लिया था तब से उसकी मम्मी की तो जैसे उसके साथ- साथ फिर से पढ़ाई शुरू हो गई थी।

लगभग रोज़ ही तो मां बेटे फ़ोन पर अपनी क्लास की एक - एक एक्टिविटी डिस्कस करते थे। बेटे को होम वर्क में मम्मी की हेल्प लेने की आदत तो अपने स्कूल के दिनों से ही लगी थी।

इंजीनियरिंग में "कॉग्नो मैकेनिक्स" जैसी ब्रांच लेते समय मां- बेटे ने यही सोचा था कि इस नए विषय में कुछ चुनौती तो रहेगी।

वरना आजकल तो बच्चों और मां- बाप के बीच ये ढर्रा ही बन गया था कि जिस ब्रांच या कोर्स में ज़्यादा अच्छा पैकेज ऑफर हो, वही पढ़ो, चाहे पढ़ने में आनंद आए या न आए।

भटनागर जी ने सोचा कि कुछ दिन बेटा भी हमारे साथ घूमने- फिरने में रहेगा तो उसे अच्छा ही लगेगा।

अगली सुबह भटनागर जी को रविवार जैसा आराम महसूस हुआ। न जल्दी उठना, न नहाने धोने की भागदौड़ और न ऑफ़िस के लिए निकलने की जद्दोजहद।

पत्नी को रसोई में व्यस्त देख कर भटनागर जी ने सोचा, बेटे के लिए लड्डू, मठरी आदि तो बनाए ही जा रहे हैं, क्यों न थोड़ी रबड़ी भी बेटे के लिए पैक करवा ली जाए।

उन्होंने कार निकाली और चल दिए।

आज उन्होंने पूरे दो किलो रबड़ी का ऑर्डर दिया। बेटे के हॉस्टल जाएंगे, उसके यार- दोस्त भी सब वहां होंगे। न जाने कितने लोग हों, कम से कम सौ- दो सौ ग्राम भर रबड़ी तो हिस्से में आए बच्चों के!

आज कुल्हड़ से काम नहीं चलने वाला था। दुकानदार बड़े से डिब्बे में माल तौलने लगा।

भटनागर जी पैसे देकर गाड़ी की ओर लपके तो सामने का दृश्य देख कर चौंक पड़े। वही भिखारिन गाड़ी के पास खड़ी उनके इंतजार में थी।

लेकिन आज उसका भेस ज़रा बदला हुआ था। आज किसी दरियादिल महिला ने पुरानी, मगर चटख लाल रंग की चुनरी उसे दे दी थी जिसे उसने मैले- कुचैले कपड़ों के ऊपर से डाल लिया था।

शायद उसे याद था कि इन साहब से उसे पहले भी दो रुपए भीख मिली थी, इसीलिए वो दुगनी आशा से फ़िर इंतजार में खड़ी थी।

भटनागर जी की जेब में पांच से छोटा सिक्का नहीं था। भिखारिन के नसीब खुल गए।

गाड़ी सर्र से आगे बढ़ गई।

घर पहुंचते ही उन्होंने देखा कि बेटे का फ़ोन आया हुआ है और मां- बेटा बातें कर रहे हैं। भटनागर जी को देखते ही पत्नी ने फ़ोन को स्पीकर पर ले लिया। अब बेटे की बुलंद आवाज़ आ रही थी।

वह कह रहा था कि "कॉग्नो मैकेनिक्स प्रोजेक्ट" में उसे फर्स्ट प्राइज मिला है जो इसी समारोह में दिया जाएगा, आप लोग ज़रूर आ जाना।

भटनागर जी ठहरे कॉमर्स के आदमी, उन्होंने बेटे को बधाई तो दे दी, मगर वो ये समझ नहीं पाए कि बेटे ने किया क्या है? उसे किस बात का इनाम मिला है?

पत्नी पैकिंग करती हुई रबड़ी का डिब्बा सामान में रखती जा रही थीं और भटनागर जी को समझाती जा रही थीं कि संज्ञानात्मक स्थैतिकी एक ऐसी साइंस होती है जिसमें इंफॉर्मेशन टेक्नॉलॉजी से एक चिप बना कर किसी के भी दिमाग़ में रखी जा सकती है।

फ़िर उस व्यक्ति का दिमाग़ नींद में जो कुछ भी देखे, वो सब उस चिप में दर्ज हो जाता है, जिसे बाद में कंप्यूटर की मदद से पढ़ा जा सकता है।

भटनागर जी सिर खुजाते हुए सोच रहे थे कि उन्होंने कई दिन से नाखून नहीं काटे हैं। वो नेलकटर ढूंढने लगे।

(समाप्त)



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