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Ravindra Shrivastava Deepak

Drama

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Ravindra Shrivastava Deepak

Drama

भरोसा...एक बंधन (अंतिम भाग)

भरोसा...एक बंधन (अंतिम भाग)

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पिताजी और घरवाले के बार-बार बोलने के बावजूद तुषार नें ये ठान लिया था कि चाहे कुछ भी हो पर शादी सिर्फ और सिर्फ कुसुम से ही करूँगा। इधर कुसुम के ऊपर तो दुःखों का पहाड़ ही टूट पड़ा था। जिंदिगी और मौत के बीच फंसकर बाहर तो निकल आयी थी लेकिन शायद उसे और परीक्षा देना था। धीरे-धीरे उसके स्वास्थ्य में सुधार आने लगा। आपरेशन के बाद उसका चेहरा पहले की तरह तो नहींहुआ लेकिन कुछ हद तक ठीक हुआ लेकिन वो बदरूप हो गई थी। 

पापा, क्या मुझे तुषार के घरवाले इस रूप में स्वीकार करेंगे ? बेटा कुसुम, तुम चिंता बिल्कुल न करो। शादी उसी तारीख पर होगी। तुषार आज भी तुम्हें उतना ही चाहता है जितना पहले। (कुसुम अपने पापा से बात कर रही होती है तभी फ़ोन आता है)

हैलो, आप कौन बोल रहे है ? मैं कुसुम का पिता। जी, आपको दुःख के साथ कहना पड़ रहा है कि तुषार का एक्सीडेंट हो गया है जिसकी वजह से उसे गहरी चोट आई है। अभी वो हॉस्पिटल में है। 

कौन था पापा ? उसने क्या कहा ? क्या बताऊँ कुसुम। कैसे कहूँ। भगवान ये कैसी परीक्षा ले रहा है। बताइये न पिताजी। बार-बार पूछने पर बोले - तुषार का

एक्सीडेंट हो गया है। नही....! ऐसा नहींहो सकता। (कुसुम जोर से चिल्लाती है)

उधर डॉ का कहना है कि एक्सीडेंट में पेट मे गहरी चोट और ज्यादा ड्रिंक लेने से लगभग किडनी काम नहींकर रही। रिपोर्ट बता रहे है कि काफ़ी दिनों से ये मानसिक तनाव में थे। इसका सीधा असर इनके दिमाग पर पड़ा है। उसी के चक्कर में इन्होंनें एल्कोहल का ओवरडोज़ भी लिया। इससे काफी क्षति हुई। अगर कोई अपनी किडनी देने को तैयार है तो इन्हें हम बचा सकते है वरना बचाना मुश्किल है।

सब के सब परेशान। अब करे तो क्या करे। कौन देगा अपनी किडनी। तभी कुसुम और उसके पिता भी आ जाते है। शैलेन्द्र सिंह देखते ही बोल उठे। जब से ये रिश्ता तय हुआ है तभी से हमारे और बेटे पर मुसीबतें आने लगी है। ये लड़की कुलक्षणी है। हमारे घर की बहू तो क्या किसी के घर की बहू बनने लायक नही। जबान संभाल कर बात कीजिये शैलेन्द्र जी। (कुसुम के पिता) अब क्या बात करें। ये शादी तो अब होने से रही। हमें ये शादी मंजूर नही। कुसुम बोली, पिताजी, तुषार कहाँ है ? बस एकबार मुझे देख लेने दीजिए। फिर मैं दुबारा नहींमिलूंगी। चलो, जाओ यहाँ से, अब मिलने की जरूरत नही। धुधकारते हुए शैलेंद्र सिंह नें कुसुम को भगा दिया। 

ऐसा अपमान सहने के बाद भी कुसुम वहां से गई नही। उसने डॉ से मिलकर तुषार के बारे में खोज-खबर ली। उसे तब पता चला कि तुषार को किडनी की जरूरत है जो काम नहींकर रहा। उसने डॉ से कहा कि मैं अपनी किडनी देने को तैयार हूं लेकिन एक वादा कीजिये कि उसके घरवालों को पता नहींचले। डॉ मान गया। उसने तुषार के पापा को बताया कि कोई है जो तुषार को अपनी किडनी देना चाहता है। अब फिक्र मत कीजिये। आपके लड़के की जान बच जाएगी। शैलेन्द्र सिंह के बार-बार पूछने पर भी डॉ ने नहींबताया कि किडनी कौन दे रहा है। सिर्फ इतना बताया कि एक मददगार है। जो भी हो भगवान उसे हमेशा खुश रखें। (शैलेन्द्र सिंह)

इधर, कुसुम तुम ये क्या कर रही हो ? सोच समझकर काम करो। पापा, मैंने सोचा लिया है। मेरे ऊपर लगे दाग को धोने का अब यही एक रास्ता है। ठीक है बेटी। जैसा तुम ठीक समझो। 

डॉ ने ऑपरेशन को सफलतापूर्वक सम्पन्न किया। कुछ दिनों के बाद तुषार को होश आया। अब वो बिल्कुल ठीक था। शैलेन्द्र सिंह ने सारी बातें उसे बताई। एक्सीडेंट होने के बाद लगभग हमलोग आशा छोड़ चुके थे कि तुम हमें दुबारा मिलोगे। लेकिन एक फरिश्ते नें अपनी किडनी देकर तुम्हारी जान बचाई। 

तुषार नें पूछा कि वो कौन है ? कोई जवाब न दे सका। उसने डॉ से पूछा। डॉ साहब..! वो कौन था जिसने मुझे जीवन दिया ? डॉ पर बार बार जोर देने पर उसने बताया कि उन्होंने मुझे बताने के लिए मना किया था लेकिन अब बताता हूँ। ये मोबाइल न. है। आप खुद बात कर लीजिए। 

दिए हुए मोबाइल न. तुषार ने फ़ोन किया। हैलो। आप कौन ? उधर से धीमे से आवाज़ में पूछा ? अब आप कैसे है ? तबियत कैसी है आपकी ? इतना सुनते ही तुषार के आँखों से आंसुओ की धारा बह निकली। कुसुम....तुमनें ऐसा क्यों किया ? मर जाने देती मुझे। इतना तुम्हे कष्ट मिला, फिर भी तुमने मुझे बचाया। मैंने तुम्हें नहींअपनी जान बचाई है। इस बात पर दोनों रोने लगते है।

इतना जानने के बाद शैलेन्द्र सिंह अपनें नज़रों में गिर गए। उन्होंने कुसुम से रोते हुए माफी मांगी। बेटी, मुझे माफ कर दो। मैं तुम्हारी महानता को समझ नहींसका। अनजाने में क्या कुछ नहींकहा। माफ कर देना बेटी। साथ ही उन्होंने ये वादा भी किया कि अब शादी तय समय पर तुमसे ही होगी जिसे पूरी दुनिया देखेगी। दुःख के बादल छंट चुके थे। दोनों परिवारों में अब सिर्फ खुशियां ही खुशियां थी। 


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