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Priyanka Saxena

Drama Children


4.5  

Priyanka Saxena

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भानु का पर्वत भ्रमण

भानु का पर्वत भ्रमण

3 mins 315 3 mins 315

भानु आज बहुत खुश है। गर्मी की छुट्टियां पड़़ चुकी हैं, वह अपने माता-पिता और बाबा-दादी के साथ उत्तराखंड घूमने जा रहा है। काठगोदाम एक्सप्रेस ने सुबह छह बजे के करीब उन्हें काठगोदाम पहुंचा दिया।

काठगोदाम पहाड़ की तलहटी में बसा तराई का एक जाना माना शहर है। यह ट्रेन का इस लाइन पर आखिरी स्टेशन है। इसके बाद पहाड़ की चढ़ाई शुरू हो जाती है। बस या प्राइवेट टैक्सी से भीमताल, नैनीताल और अन्य पर्वतीय दर्शनीय स्थलों के लिए जाया जाता है।

भानु के पापा ने अपने शहर से ही प्राइवेट टैक्सी ऑनलाइन बुक कर ली थी।

पर्वतों की नैसर्गिक खूबसूरती को निहारते वे लोग भीमताल पहुंचे। दो दिन उनका भीमताल रुकने का प्रोग्राम है जिसके लिए लेक व्यूह साइड में एक रिसॉर्ट आरक्षित पहले ही करवा लिया था।

भीमताल की झील के बारे में कहा जाता है कि वनवास के समय जब पांडव यहां पहुंचे तब भीम की गदा के प्रहार से यानि भीम के द्वारा गदा को जमीन में मारने पर इस झील का निर्माण हुआ था। भीमताल की झील के किनारे भीमेश्वर महादेव का मंदिर है जो भगवान शिव जी का एक माना हुआ मंदिर है। भीमताल में झील में सबने पैडल बोटिंग की और झील के बीच में छोटे से टापू पर बने एक्वेरियम में विभिन्न प्रकार की मछलियों, कछुओं और अन्य जलीय जीवों को देखा।

अगले दिन सुबह सुबह वे सातताल गए‌ वहां सात छोटे-छोटे ताल हैं, सभी को बहुत मज़ा आया।

लंच डाॅट पर एक रेस्टोरेंट में कर वे लोग नौकुचिया ताल चले गए। नौकुचिया ताल में झील में नौ कोने हैं, वहां सबने नौकायन किया।

लौटते वक्त सीढ़ी नुमा खेतों पर शाम को लौटती भैंसों को देख कर उन्हें बड़ा आश्चर्य हुआ क्योंकि पहाड़ के सर्पाकार खेतों में सभी भैंसें पंक्तिबद्ध तरीके से जा रही थीं। टैक्सी के लोकल ड्राइवर ने बताया कि पहाड़ पर आदमी तो आदमी , जानवर भी घुमावदार रास्तों पर चलने के अभ्यस्त हैं।

अगले दिन वे सभी नैनीताल पहुंचे । तीन दिन में नैनी झील में बोटिंग, नैना देवी मंदिर, फ्लैट से शाॅपिंग, टिफ़िनटाॅप , स्नो व्यूह, चाइना पीक सभी जगह घूम लिया। तीसरे दिन बादल‌ घिर आए, रुक रुक कर दिन भर बारिश होती रही।

माॅल रोड पर घूमते-घूमते भानु ने देखा कि जगह जगह भुट्टे वाले गर्मागर्म भुट्टे बेच रहे हैं। फिर क्या था हल्की हल्की बारिश में सभी ने‌ नींबू नमक लगे भुट्टों का आनन्द उठाया। बाबा-दादी के लिए उबले हुए भुट्टे के दाने यानि उबले कार्न के दोने लिए। रात को सभी थके हारे बिस्तर पर पड़ कर सो गए।

इसके अगले दिन शाम तक काठगोदाम पहुंचकर रात को काठगोदाम एक्सप्रेस से वे अपने शहर वापस लौट आए।

पहाड़ की सुनहरी यादों को फोटोज़ में देखकर भानु कहता है कि अगले साल भी यहीं घूमने आएंगे। भानु ने अगली गर्मियों की छुट्टियों का इंतजार करना शुरू कर दिया है...


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