Sneha Dhanodkar

Drama Inspirational


4.1  

Sneha Dhanodkar

Drama Inspirational


भाई बहन का प्यार

भाई बहन का प्यार

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महक की शादी के बाद पहली राखी थी उसके भैया उसे लेने आने वाले थे। महक की शादी बड़े घर में हुई थी। बहुत ठाट बाट से रहती थी वो। ससुर नीरज जी ने बेटे राजीव और पत्नी नमिता जी को पहले ही आदेश दे दिया था कि बहु शादी के बाद पहली बार मायके जाएगी तो सबके लिये तोहफ़े और मिठाई जरूर भेजना और उसमें कोई कमी नहीं रहनी चाहिये।

नीरज जी सिर्फ दौलत ही नहीं बल्कि दिल से भी बड़े और नेक इंसान थे। उन्होंने महक को बिल्कुल पिता की तरफ ही रखा। और तो और कम्पनी में महक अब उनका हाथ भीं बटाने लगी थी। वो कहते थे अच्छा है, अब मेरा बोझ कम हो जायेगा। राजीव और महक मिलकर मेरा कारोबार संभालेंगे। महक भी बहुत खुश थी, उसे लगता ही नहीं था कि उसकी शादी को सिर्फ पांच महीने ही हुए हैं।

वो इतनी खुश थी कि घर जाकर सबसे मिलेगी सबको सब बताएंगी। महक का भाई मोहित उसे लेने आया था उसका बहुत अच्छे से सबने अभिवादन किया। महक के साथ इतना सामान था कि मोहित की गाड़ी में नही आ रहा था, तो राजीव ने सारा सामान दूसरी गाड़ी में भिजवा दिया।

महक बहुत खुश थी, लेकिन मोहित के चेहरे से खुशियाँ गायब सी दिख रही थीं। महक ने पूछा भी क्या हुआ, पर उसने कुछ नहीं बताया। घर आकर महक इतनी चहक रही थी उसने सबको पहले तोहफ़े दिये। फिर सबको सारी बातें बताईं। सब खुश थे लेकिन ना जाने क्यूँ मोहित मुँह लटका के बैठा था।

अब तो महक ने बोल ही दिया, "बताओ ना मोहित भैया क्या बात है? आप तब से ऐसे क्यूँ बैठे हो ? मेरा आना आपको अच्छा नहीं लगा क्या?"

मोहित बोल पड़ा "तेरा आना तो अच्छा लगा, पर इस तरफ तेरे ससुर जी को इतना दिखावा करने की क्या जरूरत थी? इतना सब कुछ देकर अपनी अमीरी का दिखावा करना जरूरी था क्या?

महक अवाक उसे देखने लगी।

"भैया ऐसा कुछ भीं नहीं है, वो तो मैं पहली बार यहाँ आयी हूँ इसलिए। और वो ये कहते हैं कि शादी में आप सब ने बहुत किया, अब उनका भी तो कुछ बनता है। आखिर अब दोनों परिवार एक ही हैं ना।"

बीच में ही मोहित बोल पड़ा "तो इतना सब देने की क्या जरूरत है हमें दिखाने के लिये?"

महक बोली "भैया आप गलत समझ रहे हैं।"

"मैं बिलकुल सही समझ रहा हूँ। इन बड़े लोगों की आदत होती है दिखावा करने की, पहले दे देंगे फिर सुनाएंगे।"

"भैया आप मेरे ससुराल वालों का अपमान कर रहे हैं।"

मोहित खड़ा हो गया, "वाह बेटा, थोड़े ही दिन में तू उनकी हो गयी? हम कुछ नहीं लगते ना तेरे?"

"भैया ऐसा कुछ नहीं है, आप तो जिंदगीभर मेरे ही रहोगे। पर अब वो भी मेरा घर है और उनकी इज्जत, अब मेरी इज्जत है। अगर आपको ये सब ठीक नहीं लगता तो मैं वापस ले जाउंगी, पर इस तरह उनका अपमान होते मैं नहीं देख सकती" और महक रोने लगी।

महक के पापा अमित जी जो अभी आये थे उन्होंने महक को गले लगाया और चुप कराया बोले, "बेटा मुझे गर्व है कि तुम मेरी बेटी हो।"

फिर मोहित से बोले "बेटा दिखावे और प्यार में अंतर समझना सीखो। ये उन लोगों का प्यार है जो वो हमारी बेटी को दे रहे हैं। हमें खुश होना चाहिये कि हमारी बेटी उस घर में भी खुश है।" 

मोहित चुपचाप अंदर चला गया और अमित जी अपनी बेटी को समझाने में लग गए। बेटा मोहित भीं तेरा या उनका अपमान नही कर रहा हैं। बस उसे फ़िक्र हैं तेरी, तू तो जानती ही हैं ना तेरे बिना उसका कोई काम नहीं होता। तुम दोनों का प्यार ही ऐसा हैं लड़ाई करे बिना पेट नहीं भरता ना दोनों का। 

महक चुपचाप अपने कमरे मे जाकर बैठ गयी गुमसुम सी सोचने लगी की भईय्या ऐसा क्यूँ सोच रहे हैं। भईय्या के बिना घर मे राखी कैसे मनेगी। उधर मोहित भीं यही सोचा रहा था की पहली बार वो आयी और मैं भीं क्या लेकर बैठ गया अब वो उदास रहेगी तो राखी कैसे मनेगी। 

थोड़ी देर बाद मोहित आया और धीरे से आकर महक को उसने सॉरी बोला तो महक ने भीं सॉरी बोला और दोनों गले लग गए। 

पापा खडे मुस्करा रहे थे। देखा मैंने कहा था ना तुम दोनों एकदूसरे के बिना नहीं रह सकते। आओ मेरे बच्चों चलो खाना खाने। दोनों ख़ुशी ख़ुशी पापा के साथ हो लिये। 


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