बेटा या दामाद।
बेटा या दामाद।
"सविता मैं यहां नहीं रहूंगा, हमारी तो कोई पूछ ही नहीं हो रही, तुम तो अपनी बहन की शादी में मस्त हो कर बैठी हो, ना बच्चों की चिंता ना ही मेरी। मुझे तो यह लगता है तुम इस घर की सौतेली बेटी हो। ना तो तुम्हें कुछ शादी में दिया, हमारे समय तो यह लोग भिखारी बन गए थे। अब कैसे गायत्री को मोटरसाइकिल देंगे। तुम तो अंदर बैठकर अपनी बहनों से बतिया लो, या घर का काम कर लो। मैं कल से देख रहा हूं, रात को तुम्हारा छोटा भाई कमल तुम्हारी छोटी बहन सावित्री के पति विनय को बुला कर बाहर ले गया। उसके हंसने और बोलने की आवाज भी काफी रात तक आती रही थी। मैं देख रहा हूं अब भी इस घर के असली दामाद इस विनय के लिए तो अभी चाय भी आई है और मैं साथ में बैठा हूं मुझसे किसी ने पूछा भी नहीं"। राजेश शादी वाले घर में बेइंतेहा चिल्लाए जा रहा था और सविता कुछ कर नहीं पा रही थी।
रामप्रसाद जी की 3 बेटियां थी। सबसे बड़ी सविता, सावित्री और गायत्री। उनका एक पुत्र भी था जो कि छठी क्लास में पढ़ता था। रामप्रसाद जी समीप की कंपनी में सुपरवाइजर का काम करते थे। अपनी दोनों बड़ी बेटियों की शादी कर चुके थे और कल गायत्री की शादी थी। दोनों दामाद 2 दिन पहले ही आ गए थे। राजेश ने अपनी शादी के समय तो कुछ भी मांग नहीं की थी लेकिन शादी के बाद वह हमेशा सविता के घर से कुछ ना कुछ पाने की इच्छा रखता ही था। जब भी वह ससुराल आता, शायद ही कभी ऐसा हुआ हो कि वह बिना लड़े घर से गया हो। सविता के कारण सब चुप ही रहते थे। लेकिन अब तो और भी सारे लोग घर में इकट्ठा हुए थे, राजेश के इस व्यवहार के कारण सविता बहुत शर्मिंदा हो रही थी। जब से राजेश को यह पता चला कि ससुर जी गायत्री को मोटरसाइकिल भी दे रहे हैं तब से तो उसका गुस्सा संभाले नहीं संभल रहा था। कुछ भी बोलने का मौका वह हाथ से जाने नहीं दे रहा था।
इसके विपरीत विनय अपने ससुर जी को पिता के समान ही सम्मान देता था। इसी कारण घर में उसकी जगह एक बेटे के समान ही थी। रामप्रसाद जी बिना उसकी सलाह के कोई भी काम नहीं करते थे। विनय रसोई में भी काम करने में कोई शर्म नहीं समझता था। जहां राजेश सवेरे से उखड़ा उखड़ा घूम रहा था वही विनय सवेरे से घर के कामों में भी हाथ बंटा रहा था, अभी उसने रसोई में थोड़ा सर दर्द होने के कारण सावित्री को चाय बनाने के लिए कहा वह बाहर आकर बैठ गया था, सावित्री ने किसी के हाथ से उसके लिए चाय भिजवाई तो सावित्री को यह नहीं पता था कि बड़े जीजाजी भी बाहर ही बैठे हैं।
ससुर जी के लिए अपमानजनक भाषा का प्रयोग करते हुए और तमाशा बनाते हुए देखने पर विनय ने राजेश को प्यार से समझाते हुए चुप रहने के लिए कहा। साथ में उसने अपनी चाय राजेश को ही पकड़ानी चाही और मजाक के लहजे में बोला आप बैठो भाई साहब आपके लिए मैं चाय के साथ कुछ नाश्ता भी बना लाता हूं। इसके विपरीत राजेश ने उसे भी अपशब्द बोलने शुरू किए। साथ ही उसे कहा तू तो बेवकूफ है, तू नौकर के जैसे इस घर में काम कर सकता है। इस परिवार का दामाद ना तो तू है, और ना ही मैं, तुझे कौन सा कुछ दिया है इन्होंने? देख, अपनी गायत्री को तो यह मोटरसाइकिल भी दे रहे हैं। दामाद को अपनी इज्जत खुद करवानी आनी चाहिए। तुझे मेरा साथ देना चाहिए या कि मुझे ही रोकना चाहिए।
विनय ने तभी बड़े प्यार से राजेश को कहा "आप सही कहते हो भाई साहब मैं इस घर का दामाद हूं ही नहीं। मैं तो इस घर का बेटा हूं। घर का दामाद(आप) खुश रहे मैं तो सिर्फ यही चाहता हूं। कल रात को भी जब छोटे साले साहब मुझे बुलाने आए थे तो कारण यह था कि मैंने नीचे जाकर बूंदी के लड्डू बनवाने में हलवाई की सहायता करनी थी। आप तो ऐसा करते नहीं, इसलिए किसी ने आपको बुलाया नहीं। मैं आपको कुछ बताना नहीं चाहता था पर क्योंकि आप चुप नहीं होंगे इसलिए घर के बड़े दामाद जी, आपके ससुर जी ने आपको अपनी बेटी दी आपने क्या उसकी कद्र की। यह जो आप बार-बार मोटरसाइकिल का जिक्र कर रहे हैं यह अपनी छोटी बहन गायत्री को मैं भेट दे रहा हूं। और दामाद जी आप इस घर से क्या इच्छा रखते हैं मुझे बतला दीजिए हो सका तो कोशिश करूंगा कि आपके मान सम्मान में भी कहीं कमी ना रह जाए। आप बिल्कुल सही कह रहे हैं कि दामाद को अपनी इज्जत करवानी आनी चाहिए। यह शादी का घर है और मैं सिर्फ अपनी बड़ी सविता दीदी का ख्याल करके चुप हूं वरना शादी तो आपके बिना भी हो सकती है दामाद का और बेटे का मैं दोनों का ही काम संभाल सकता हूं।" तब तक सविता और सारे लोग बाहर आ चुके थे।
पाठकगण शायद राजेश को कुछ समझ ही आ गया होगा क्योंकि उसके बाद गायत्री की शादी हो कर विदा होने तक राजेश ने एक बार भी लड़ाई नहीं की और शादी के हर कार्यक्रम में शांति से हिस्सा लिया।
