Shweta -

Abstract


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अविश्वसनीय प्रकृति

अविश्वसनीय प्रकृति

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आज भी अन्धियारी रात में चकोर पक्षी की भाँति चॉंद को निहारते हुए मेरा मन उस रात की खोज में निकल पड़ता है जब मैंने इस विशालकाय,अलौकिक प्रकृति की गोद में अनुपम आनंदमय दृश्य अनुभव किया था ।

उस दिन मेरा चित्त अत्यधिक व्यथित था और चिन्ता के सागर में गोतें लगा रहा था । मुझे तनिक शान्ति के क्षणों की लालसा थी जो मुझे यमुना नदी की ओर खीच ले आई । वहाँ के अविस्मरणीय वातावरण ने जैसे मेरी सभी इन्द्रियों को कुछ सांत्वना दी।

 वहाँ पास ही में एक सर्वसाधारण नौका थी । जो मुझे कृष्ण की बांसुरी की तरह अपने पास बुला रही थी। मैं बिना किसी विलंब के उसपर सवार हुई।सवार होकर मैंने अपनी दुर्गम यात्रा का आरम्भ किया ।

वहाँ वायु शनै: शनै: चल रही थी जैसे की आकाश में रस घोल रही हो।यही वायु जब तटों पर खड़े ऊंचे-नीचे वृक्षों से टकरा रही थी तो ऐसा लग रहा था कि स्वयं तानसेन अपनी संगीत कला का अभ्यास कर रहें हैं।गीली मिट्टी की सुगन्ध ने तो जैसे मुझे मोहित ही कर डाला ।आखिर जिस मिट्टी में कृष्ण लीला का वास हो भला वह मोहित क्यों न करे ?

मैं इन सभी प्राकृतिक क्रियाओं से अपने मन को प्रफुल्लित कर ही रही थी कि मेघों से वशीभूत आकाश में से चंद्रमा प्रकट हुआ। चंद्रमा ने तो जैसे वहाँ चार चांद लगा दिए। उस अँधेरी रात में उस चांद की चांदनी से सब ऐसे जगमगा गया जैसे अयोध्या श्री राम के पुनरागमन पर जगमगा रही थी। मिट्टी केवल मिट्टी न रही,वह तो चांदनी की भाँती चमक उठी। उसपर बने पदचिह्न किसी दीवीय शक्ती के चिह्नों की तरह उभरकर आ रहे थे। उसकी रोशनी के वश में आकर कुछ पक्षी अपनी निद्रा भंग कर शशि कि ओर एकटक होकर देख रहे थे जैसे कि उनकी पलक झपकाने पर वह गायब हो जायेगा।

चांद प्रेम का प्रतीक है और यदी मैं उस वक्त अपने प्रेम को याद न करती तो शायद यह सर्वाधिक गलत होता।अपने प्रियतम को याद करते ही मेरे हृदय की गति जैसे कई गुना बढ़ जती है, वह व्यथित भी हो उठता है और शान्त भी।भले ही वह उस वक्त मेरे साथ ना हो पर उनके द्वारा पहनाई गई अंगूठी मुझे सदैव यह ही बतलाती है कि वे मेरे साथ ही है जिसके विचार मात्र से मैं प्रसन्न हो उठती हूं।सर्वदा यह ही तो प्रेम है चाहे वह व्यक्ति आपके साथ हो या ना हो उनका विचार ही अभिराम के पुष्पों को खिलाने का सामर्थ्य रखता है और उनकी बहुमूल्य खुशी की प्रर्थना करता है।

जब मैं अपने प्रेम रस से बाहर निकली तो तब मेरा मन कुछ जल क्रीड़ाये करने की ओर बहका ।चंद्रमा जल में उतर चुके थे तो इसका मतलब की अब वक्त आ गया था कि मामा श्री को कुछ परेशान करा जाए।ऐसा लगा कि मैं भूतकाल में जाकर फ़िर वो बालक बन चुकी हूं जो सबकी नाक में दम करती रहती थी।फ़िर मैंने तो जैसे अपने हाथों से डूबे चन्द्रमा में कोलाहल ही मचा डाला ।पानी की बूंदें पहले गेन्द की तरह ऊपर उछलती थी तत्पश्चात सीता माता से प्रेरित हो अपनी जननी में समा जाती थी।

मैं इन सभी क्रियाओं में अंतर्धयान हो चुकी थी कि तभी वायू की एक तेज़ वेघ ने मेरा ध्यान भंग किया।

मुझे मेरे सभी सामाजिक एवं घरेलु कार्य याद आए जो मैं इस मायावी कुदरती द्वारका में भूल गई थी।अपनी नौका को तट पर लगाकर अपनी कलपनाओं में डूबी हुई अपनी प्रेरणाओं को संचयकर मैं अपने घर की ओर भागी और मेरे मन के सभी भावों को शब्द रूपी स्मृतियों में पिरोहकर अपना कार्य सम्पन किया।उसके बाद मैं अपनी यादों की सौंदर्यशली लताओं में झूलते हुए निन्द्रामग्न हो गई।


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