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chandraprabha kumar

Classics

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chandraprabha kumar

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अवधूत दत्तात्रेय उपाख्यान

अवधूत दत्तात्रेय उपाख्यान

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     जब भगवान् श्रीकृष्ण परम धाम जाने लगे तो यादवों का आसन्न विनाश और भयावने शकुन देखकर ,उद्धव जी , जो भगवान् श्रीकृष्ण के बड़े प्रेमी और भक्त थे, श्रीकृष्ण के पास एकांत में गए, उनके चरणों पर अपना सिर रखकर प्रणाम किया और हाथ जोड़कर उनसे प्रार्थना करने लगे। उन्होंने कहा -“आप सब देवों के अधीश्वर हैं। आप की लीलाओं के श्रवण-कीर्तन से से जीव पवित्र हो जाता है ।मैं आधे क्षण के लिए भी अगले चरणकमलों के त्याग की बात सोच भी नहीं सकता। आप मुझे भी अपने धाम में ले चलिए।”

    उद्धव जी के इस प्रकार प्रार्थना करने पर भगवान श्री कृष्ण ने अपने अनन्यप्रेमी सखा एवं सेवक उद्धव जी से कहा-“ महाभाग उद्धव ! पृथ्वी पर देवताओं का जितना काम था उसे मैं पूरा कर चुका। आज से सातवें दिन समुद्र इस द्वारिका पुरी को डुबो देगा। थोड़े ही दिनों में पृथ्वी पर कलियुग का बोलबाला हो जाएगा।जब मैं पृथ्वी का त्याग कर दूँ, तब तुम अनन्य प्रेम से मुझमें मन लगाकर समदृष्टि से पृथ्वी पर स्वच्छंद विचरण करो। ज्ञान और विज्ञान से भलीभाँति संपन्न होकर तुम अपनी आत्मा के अनुभव में ही आनंदमग्न रहो। इससे किसी भी विघ्न से तुम पीड़ित नहीं हो सकेंगे।”

  जब भगवान श्रीकृष्ण ने इस प्रकार आदेश दिया तो भगवान के परम प्रेमी उद्धवजी ने कहा-प्रभो !मेरी मति मूढ़ हो गई है। कामनाओं का त्याग अत्यंत कठिन है।अतः मेरे लिये आत्म तत्व का उपदेश सरल रीति से कीजिये। मैं आपकी शरण में आया हूँ।”

  भगवान श्रीकृष्ण ने कहा-“ समस्त प्राणियों का विशेषकर मनुष्य का आत्मा अपने हित और अहित का उपदेशक गुरू है। मनुष्य अपने प्रत्यक्ष अनुभव और अनुमान के द्वारा अपने हित -अहित का निर्णय करने में पूर्णतः समर्थ है। अनेक प्रकार के जीव हैं। उसमें मुझे सबसे अधिक प्रिय मनुष्य का ही शरीर है। इस मनुष्य शरीर में एकाग्रचित्त तीक्ष्ण बुद्धि मनुष्य मुझ ईश्वर को साक्षात् अनुभव करते हैं। इस विषय में महात्मा लोग एक प्राचीन इतिहास कहा करते हैं,वह तेजस्वी अवधूत दत्तात्रेय और राजा यदु के संवाद के रूप में है। वह मैं तुम्हें सुनाऊँगा ।”

   अनेक भागवत् के विद्वान महापुरुषों के निश्चय से भागवत् के एकादश स्कन्ध में यदु और दत्तात्रेय का सम्वाद सारी भागवत् का सार है जो परमार्थ के साधकों के लिये परम हितकारी है। 

 ये राजा यदु नहुष पुत्र राजा ययाति के देवयानी से उत्पन्न ज्येष्ठ पुत्र थे। यदु ने पिता की वृद्धावस्था लेकर अपनी युवावस्था देना अस्वीकार कर दिया था। पर शर्मिष्ठा से उत्पन्न छोटे पुत्र पुरु ने पिता को अपनी युवावस्था सहर्ष प्रदान कर दी। तब ययाति ने यदु से कहा-“ तुमने ज्येष्ठ पुत्र होकर भी पिता के प्रति अपने कर्तव्य को पूर्ण नहीं किया , अतः तुम्हें राज्याधिकार से वंचित कर अपना राज्य पुरू को देता हूँ ।”

   बाद में ययाति ने पुरु को युवावस्था लौटाकर वैराग्य धारण किया। यदु से यदुवंश चला। इसी यदुवंश में श्रीकृष्ण का अवतार हुआ था।ये ही राजा यदु श्रीकृष्ण के पूर्वज थे।

  श्रीकृष्ण ने अवधूत दत्तात्रेय एवं राजा यदु का संवाद उद्धव जी को सुनाया। और कहा- हमारे पूर्वज महाराज यदु की बुद्धि शुद्ध थी, और उनके हृदय में ब्राह्मण भक्ति थी।

  एक बार धर्म के मर्मज्ञ राजा यदु ने देखा कि एक त्रिकालदर्शी तरुण अवधूत ब्राह्मण निर्भय विचर रहे हैं ,तब उन्होंने उनका सत्कार करके उनसे यह प्रश्न पूछा-

“ ब्रह्मन् ! आप कर्म तो करते नहीं, फिर आपको यह अत्यन्त निपुण बुद्धि कहाँ से प्राप्त हुई ? जिसका आश्रय लेकर आप परम विद्वान् होने पर भी बालक के समान संसार में विचरते हैं। आप जड़ के समान रहते हैं , न तो कुछ करते हैं और न चाहते ही हैं। मालूम होता है कि आप मुक्त हैं। आप तक काम और लोभ की ऑंच भी नहीं पहुँच पाती।जैसे कोई हाथी वन में दावाग्नि लगने पर उससे छूटकर गंगा जल में खड़ा हो। आपको अपने में ही ऐसे अनिर्वचनीय आनंद का अनुभव कैसे होता है ,कृपा कर बताइए।”

  प्रश्न पूछकर अवधूत दत्तात्रेय जी का अत्यंत सत्कार करके महाराज यदु बड़े विनम्र भाव से सिर झुकाकर उनके सामने खड़े हो गए ।

       इस प्रकार से यदु के द्वारा पूछे जाने पर दत्तात्रेय जी ने कहा-“राजन् ! मैंने अपनी बुद्धि से बहुत से गुरुओं का आश्रय लिया है, उनसे शिक्षा ग्रहण करके मैं इस जगत में मुक्त भाव से स्वच्छंद विचरण करता हूँ। उन गुरुओं के नाम और उसे ग्रहण की हुई शिक्षा मैं तुमको सुनाऊंगा ,हर किसी से मैंने कुछ न कुछ शिक्षा ली है।

      मेरे गुरुओं के नाम हैं-१ .पृथ्वी, २. वायु ,३.आकाश ,४ .जल ,५.अग्नि ,६.चन्द्रमा ७.सूर्य ,८.कबूतर ,९.अज़गर ,१०.,समुद्र, ११. पतंग, १२,भौंरा या मधुमक्खी ,१३.हाथी ,१४.शहद निकालने वाला ,१५.हरिन, १६.मछली ,१७.पिंगला वेश्या,१८.कुरर पक्षी ,१९बालक ,२०,कुँवारी कन्या , २१,बाण बनाने वाला ,२२,सर्प ,२३,मकड़ी ,और २४.भृंगी कीट । 

     मैंने इन्हीं चौबीस गुरुओं का आश्रय लिया है और इन्हीं के आचरण से इस लोक में अपने लिए शिक्षा ग्रहण की है।ययातिनन्दन ! मैंने जिससे जिस प्रकार से जो कुछ सीखा है, वह सब ज्यों का त्यों तुमसे कहूँगा।”

    दत्तात्रेय जी ने राजा यदु से कहा- हे राजन् ! मैंने पृथ्वी के द्वारा क्षमा की शिक्षा प्राप्त की है। जिस प्रकार से प्राणियों के द्वारा नाना प्रकार से कष्ट पहुँचाने पर भी पृथ्वी सबका आघात सहन करती रहती है और अपने क्षमा गुण का का त्याग नहीं करती, उसी प्रकार बड़ा संकट आने पर भी अपना क्षमा गुण न त्यागना मैंने पृथ्वी से सीखा है। इसलिये पृथ्वी मेरी प्रथम गुरु है।  

                     क्रमशः-


 

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