सविता प्रथमेश

Abstract


3.0  

सविता प्रथमेश

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और भला क्या चाहिए ?

और भला क्या चाहिए ?

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नेहा के घर पहुंचने से पहले ही पोनी घर पर थी। नेहा को अंदेशा भी यही था।जिस तरह से पोनी ने फ़ोन पर ज़ोर-ज़ोर से दहाड़े मार ज़मीन-आसमाभन एक कर दिया था नेहा को पक्का मालूम था कि पोनी उसे घर पर ही मिलेगी।

लोकल मायका होने का यही तो फ़ायदा है।सुख-दुख चाहे बेटी का हो या मां-बाप का बेटी तुरंत हाज़िर। वरना आज के समय में कौन बेटा पास में रहता है ?सब दूर जा बसे हैं।

 नेहा को देखते ही पोनी छोटी बच्ची जैसी लिपट गई। नेहा चाहकर भी उसकी बिटिया पीहू को गोद में ले न सकी।मां को समझाए कि बिटिया को ?

जब मन भर गया पोनी ख़ुद से अलग हो गई और कुर्सी पर निढ़ाल पड़ गई।

नेहा को उसकी आदत मालूम थी।इसलिए उसने सिर्फ़ उसे ख़ुद से लिपटे रोने दिया।तनाव निकालने का इससे बड़ा माध्यम और क्या हो सकता है भला ?

"अब क्या हुआ भला ?"

पीहू को गोद में लेते नेहा ने पूछा।यह जानते हुए भी कि आशीष और पोनी के बीच लड़ाई-झगड़ा निहायत ही आम है।बच्चों की तरह लड़ते -झगड़ते हैं।इतना लड़ना कि लगता जानी दुश्मन हों। 

नेहा ने हज़ार बार समझाया पोनी को ग़ुस्सा कम किया कर।

"आपकी ही आदत है मम्मी कैसे जाएगी ?"पोनी जब कहती तो नेहा को अहसास होता वाकई यह उसी का तो ग़ुस्सा है जो पोनी को ट्रांसफर हो गया है। पचास बरस की होने को आई उससे नहीं छूटा तो भला पच्चीस बरस की पोनी तो अभी दुनिया दारी समझ रही है। लोगों को परख रही है।इतने बड़े परिवार से निभाना हंसी -खेल थोड़े ही है ?

आख़िर अब जाकर तो परिवार मिला है उसे।नहीं तो अब तक मां और बेटी।बस यहीं तक था दोनों का परिवार।

"मम्मी इतने बड़े परिवार में मुझे नहीं करनी है शादी"।नेहा के परिचित ने जब आशीष के परिवार के बारे में बताया तो पोनी भड़क उठी।

"कैसे एडजस्ट करुंगी मैं इतने लोगों के साथ ? दिनभर घरवालों को खुश करते बीता दो।यही तो होता है बड़े परिवार में।अपना तो कुछ रह ही नहीं जाता।"पोनी के तर्क मानो नेहा को भी निमंत्रण दे रहे हों। अनेक मौक़ों पर वह डगमगा जाती।

"सही तो है पोनी।बचपन से उसने परिवार के नाम पर सिर्फ़ मांं को ही तो जाना है।बड़ी हुई तो फ्रेंड्स।और दोस्त भी कभी परिवार हो सकते हैं भला ?"

" देख नेहा,तू पोनी की बातों में आई तो समझ ले तू बहुत बड़ी ग़लती कर रही है।" अमिता बार-बार टोककर उसे रास्ते पर लाती।आख़िर उसी ने तो आशीष का रिश्ता लाया था। आशीष को वह बचपन से जानती थी।और नेहा को ?

 यह भी कैसी कहानी है ? अमिता को याद करते न करते पच्चीस बरस जीवित हो उठे।तन-मन से आहत नेहा समाज से कट गई थी। समाज ही नहीं बल्कि परिवार से भी।पच्चीस-छब्बीस बरस की युवती वो भी एक बच्ची की मां अपनी मर्जी से पति से अलग रहे समाज और परिवार आसानी से कहां अपना पाते हैं ?वह भी उस पति से जिससे सभी से लड़झगड़ कर उसने शादी की हो ?

दोनों ही बार तो उसने परिवार को धोखा दिया था।उनकी इज्ज़त मिट्टी में मिलाई थी

"यह बात तू अपने दिमाग़ से निकाल दे।"अमिता बार-बार उसे समझाती।

"ऐसा सोचकर तू पोनी के साथ अन्याय कर रही है।उसका पालन-पोषण सही तरह से नहीं कर पा रही है तू।"

"लेकिन यह सच्चाई है।"नेहा उस अपराध बोध से आज तक नहीं निकल पाई।

"है तो है।"बिंदास स्वर में अमिता ने कहा।"इसे बदल सकती हो तो बदल लो।लेकिन ऐसा होगा नहीं। उस समय तुझे जो ठीक लगा तूने किया। और अब वही कर जो ठीक है। और आज की तारीख़ में पोनी का सुरक्षित भविष्य ही तेरे और उसके लिए ठीक है।"

नेहा को लगता अमिता ने उसके लिए जो किया है उतना तो नेहा ने स्वयं के लिए नहीं किया है। अमिता नहीं होती तो उसकी ज़िंदगी जाने किस करवट बैठती।

 ज़िंदगी भी न।जाने कब,कहांं,किस मोड़ पर लोगों को मिला देती है समझ से परे है।

क्यों मिला देती है ?

परिपक्व होने पर अब जाकर नेहा को समझ आ रहा है।

"ज़रुर कुछ न कुछ कारण होता ही है।" शरद के मुंह से यह बात कितनी अच्छी लगती ।

शरद की याद से अंदर तक कुछ हिल गया नेहा का।

 शरद से मुलाकात ने उसकी ज़िंदगी बदल दी हमेशा-हमेशा के लिए।नहीं तो वह ऐसी तो कभी नहीं थी।

आज भी उसे याद है वह मुलाकात। सहमी -सिकुड़ी नेहा में जाने क्या नज़र आया शरद को कि मुलाकातों का सिलसिला चलता रहा, बढ़ता गया और एक दिन दोनों ने शादी जैसा अहम् फ़ैसला भी ले लिया।

"मेरे घरवाले तो किसी भी कीमत पर नहीं मानेंगे।"नेहा अपने घरवालों के व्यवहार के प्रति आश्वस्त थी।

"मैं भी अपने घरवालों को अच्छे से जानता हूं।"हंसते हुए शरद ने कहा,"वे भी इस शादी को मंजूरी नहीं देंगे।"

"फिर ?"

"हम बालिग़ हैं।कोर्ट में कर लेंगे।"शरद का आत्मविश्वास नेहा को हमेशा आकर्षित करता। 

" यह क्या नाटक चल रहा है ?" कोर्ट का पत्र पाकर घर में हंगामा मच गया।

नाक की सीध पर चलने वाले सीधे-साधे परिवार के लिए मानो यह पुलिस की गिरफ़्तारी का समन हो।

हंगामा धीरे-धीरे,लड़ाई-झगड़े के रास्ते होता शांति की नाव पर सवार हो गया।

"अब इस टॉपिक पर कोई बात नहीं।" मेरी ज़िद देख पापा ने भी अपना फ़ैसला सुना दिया।

पापा एकदम ही सीधे साधे नेकदिल इंसान थे।अपने काम से काम रखते।दुनियादारी से कोई मतबल नहीं। और जानकारी भी नहीं। लेकिन उसूलों के पक्के।

 "नेहा ने फ़ैसला कर लिया और वह अपने फ़ैसले पर अड़ी है तो मेरा भी फ़ैसला है।अब से इस विषय पर कोई बात नहीं।"पापा की दृढ़ता से भरी आवाज़ आज भी याद करते गूंजने लगती है।

"लेकिन अब से उसके लिए इस घर के दरवाज़े बंद"

पच्चीस बरस हो गए उस दहलीज़ पर गए। नेहा ने जाने कितनी कोशिश की। उसे मालूम था पापा का उस पर कितना प्यार है ?यह तो नेहा की ही ग़लती थी।एक बार घरवालों से बात तो किया होता ?हठात घर पर कोर्ट के पत्र से घरवालों को नाराज़गी तो होगी ही।

 " पोनी अगर ऐसा करती तो ?" 

 कुछ परिस्थितियां स्वयं उस स्थिति में होने पर ही समझ आती हैं। आज अगर वह मां नहीं बनती तो शायद ही अहसास होता कि पापा को,मम्मी को और भाई-बहनों को उसने कितना दुख दिया। वैसे भी पापा की वह लाड़ली थी।पापा को बताती तो हो सकता उसे भी हल्दी ,मेंहदी लगती।भर-भर हाथों में लाल-लाल चूड़ियां सजतीं।पैरों में पायल की रुनझुन।

ऑफ़िस की फ़ाइलों के बीच नीरस वातावरण में दो-चार दोस्तों के साथ माला पहनाकर शादी करना भी कोई शादी होता है ?धूमधड़ाका, गाना-बजाना,रुठना-मनाना न हो तो शादी का मज़ा कहां ?

लेकिन वास्तविकता तो यही थी कि दो-चार दोस्तों और सरकारी अधिकारियों के बीच नेहा और शरद ने एक-दूजे को हार पहनाए और हो गए एक-दूजे के ।न शरद के घर वालों ने पूछा न नेहा के ही घरवालों को तरस आया।

 शरद को पाकर नेहा ने सब को भूला बैठी नेहा। शायद शरद के साथ भी ऐसा ही हो।ज़िंदगी ने अपनी रफ़्तार पकड़ ली।आरंभिक ख़ुमारी के बाद ज़िंदगी पटरी पर आ रही थी। दोनों के अपने काम।रोज़ सुबह निकलना शाम ढले लौटना। असल ज़िंदगी अब सामने थी।

केवल ज़िंदगी ही क्यों ?

समय के साथ असल व्यक्ति भी तो असल रुप में आता है।प्याज़ के छिलकों की तरह शनैः-शनैः परतें उघड़ती जाती हैं। 

प्याज़ की तीख़ी गंध मानो नाक में समा गई हो।आंखों से बह निकली पानी की धार।।

यह पानी ही तो है आंखों से निकले अश्रु। बस थोड़ा नमकीन।

पच्चीस लंबे बरस।उसके हिस्से आए नमकीन अश्रु ही। रो-रोकर जाने कितनी रातें उसने तकिया भिगोया है ?

शरद से विवाह क्या सचमुच उसका ग़लत फ़ैसला था ? 

क्या सचमुच उसने शरद को समझने में भूल की ?

या ख़ुद नेहा ने रिश्तों को समझने में भूल की ?

कहीं यह जल्दबाजी में लिया गया फ़ैसला तो नहीं था ?

शरद ने तो चूं से चां नहीं किया था जब नेहा ने अंतिम रुप से अलग होने का फ़ैसला लिया।

"ये तुम क्या कर रही हो सोचा भी है ?" बस एक वाक्य और उसके बाद पच्चीस बरस लंबी चुप्पी।

"भला ! ऐसा भी क्या अबोला ?" कभी जब नेहा शांत दिमाग़ होती तो सोचती।

"क्या शरद को कभी अहसास नहीं हुआ कि बहुत हो चुका।अब नए सिरे से सब कुछ शुरू किया जाए ? क्या शरद का यह अहं है ? 

पर शरद के व्यवहार से तो उसे कभी नहीं लगा

" मैं तुम्हारे साथ ज़बरदस्ती तो नहीं कर सकता।लेकिन मैं फिर भी चाहता हूं कि तुम एक बार फिर सोचो।"बड़े ही संयमित तरीक़े से शरद ने कहा था।

"इसके बाद भी अगर तुमने डिसाइड कर ही लिया है तो मैं तुम्हारे फ़ैसले का सम्मान भी करता हूँ।"

ग़ुस्से से लबालब नेहा को शरद की शांत मुद्रा से ऊबासी सी हो आई।

"भला ऐसा भी क्या ? बंदे को ग़ुस्सा भी नहीं आता ? चिड़चिडा़हट नहीं होती ? सिर पटकने को नहीं होता ?" ऐसा अजूबा भी क्या दुनिया में हो सकत है।

शरद से अलग होने के बाद पहली रात उसने सोचा। साल भर की पोनी नींद की आग़ोश में थी।लेकिन नेहा के लिए तो जैसे एक-एक पल भारी।

मम्मी पापा को पता चलेगा तो क्या सोचेंगे वे ?

लोगों को क्या बताएगी ?

आपस में मत भेद और छोटे-मोटे लड़ाई-झगड़े किसी दंपति में न हो तो रिश्ते में कमी सी रहती है।बल्कि रिश्ता चाहे जो भी हो जान तो इसी छोटी-मोटी टकराहट से आती है।नेहा का यह दृढ़ विश्वास था।

लेकिन छोटी सी बात से निकली बात पच्चीस बरस तक खींच जाएगी ?

साल भर की पोनी आज ख़ुद दो साल की बिटिया की मां बन बैठी है। एक पीढ़ी जवान हो गई। कितना कुछ बदल गया।

बदल दिया था नेहा ने भी शहर।नए लोगों के बीच शायद उसे आसानी जाए।ऐसा हुआ भी। 

नेहा शरद नाम आसानी से लोगों की ज़ुबान पर चढ़ गया। धीरे-धीरे संबंध बनने लगे।ऑफ़िस में,कॉलोनी में,शहर में।

ख़ुद के नाम के आगे "तलाकशुदा" लगता देख शुरु-शुरु में अपसेट हो जाती नेहा।लोगों की दबी-छुपी बातें भीतर तक हिला देती उसे।

लेकिन हक़ीकत इतनी आसानी से स्वीकृत हो जाए तो वह भला हक़ीकत कहां रह जाए ?

बामुश्किल नेहा शरद के अहं ने स्वीकारा। शरद अब सिर्फ़ उसके नाम के साथ है जीवन में नहीं।और अब उसकी सामाजिक स्थिति तलाकशुदा की है।एक ऐसी औरत जिसके पास एक बच्ची की ज़िम्मेदारी भी है।

नेहा शरद ने बाख़ूबी ज़िम्मेदारी निभाई भी।पोनी को देख कोई नहीं कह सकता कि वह सिंगल मदर की परवरिश है। नेहा ने कभी अहसास भी होने नहीं दिया।

लेकिन न जाने क्यूं शरद के बारे में पोनी से बात करना उसे भाता था।आख़िर और था भी कौन जिससे नेहा अपना दुख-सुख बांटती ?

"भला ! ये भी कोई वज़ह है अलग होने की ?"नेहा ने जब अपने और शरद के झगड़े की बात बताई तो छूटते ही पोनी ने कहा।

"ऐसी बातों पर लोग इतना बड़ा क़दम उठाने लगे तो हो गया'।

 वाकई बात तो कुछ नहीं थी।लेकिन बात से बात बढ़ती गई और ऐसा मोड़ आ गया कि बस।।

 कभी -कभी नेहा को लगता उसे चुप कर जाना था।ग़ुस्सा थोड़ा कम करना था।अकड़ थोड़ी कम करनी थी।

ये सब कल की बातें थीं।जबकि हक़ीकत यही है कि उसने अपने तलाकशुदा होने को स्वीकार लिया है। अब उसे कोई प्राब्लम नहीं। पोनी को भी उसने इसी वास्तविकता से बड़ा किया है उसमें भी किसी प्रकार की हिचक या संकोच नहीं।

" ममा"उठो।पोनी की आवाज़ से नेहा चौंक सी गई।

"क्या आंख लग गई थी उसकी ?"नेहा को तो पता ही नहीं चला।कब पोनी से बात करते-करते वह पच्चीस बरस पहले पहुंच गई और एक नींद भी ले ली।

 "मैं निकल रही हूं।" पोनी ने कहा।"दरवाज़ा बंद कर लो।"

"निकल रही हो ? कहां" नेहा का स्वर अकस्मात कड़ा हो गया।

"हां।अपने घर"शायद पोनी ने नेहा के स्वर का कड़ापन नहीं समझा था।अपने में मस्त कहे जा रही थी,"आशीष का फ़ोन आया था।"

"लेकिन मुझसे तो फ़ोन पर ऐसे रो रही थी मानो आशीष से बुरा इस दुनिया में कोई नहीं ? क्या ज़रुरत है वहां जाने की" ?पच्चीस बरस पुरानी नेहा लौट आई थी।

"जब उसे तेरी फिक्र नहीं तो तुझे भी उसकी फिक्र क्यों करनी चाहिए ?"बेटी के लिए तड़प स्पष्ट तौर पर नज़र आ रही थी। आख़िर आए भी क्यों न ?

बड़ी कठिनाई से पोनी को उसने तैयार किया था।आर्थिक, सामाजिक, भावनात्मक।।।हर तरह टूट चुकने के बाद नेहा ने ख़ुद को सम्हाला,पोनी को सम्हाला।

 आशीष से ऐसे व्यवहार की उम्मीद नहीं थी नेहा को। आशीष की समझदारी के सभी का़यल हैं।

"लेकिन पुरुष तो आख़िर पुरुष ही होता है।"समय सबकी असलियत सामने ला देता है। फ़ोन पर जिस तरह से पोनी ने रो-रोकर नेहा को अपनी और आशीष की लड़ाई के बारे में बताया था नेहा ने कुछ डिसाइड कर लिया था।

और अब ये पागल लड़की उसी आशीष के एक कॉल पर पिघल गई और चट जाने को तैयार।

 "तुम भूल गई लड़ाई ?"

"नहीं।"

"फ़िर यह जाने का क्या ? तेरा घर है।जब तक तू चाहे रह।"

" नहीं मम्मा।" पोनी ने दृढ़ता से कहा।"मेरा घर है कहकर ही आई थी।जितना ज़रुरी था रही।पर अब नहीं।"

" तो लड़ाई क्या नाटक थी ?"

"नहीं। मम्मा। वह भी सच थी।और यह भी सच है कि लड़ाई मैं भूली नहीं हूं।लेकिन वह भी वैसी ही लड़ाई है जैसी मेरी तुम्हारे साथ।"पोनी कहे जा रही थी।

"तुमसे कितनी बार,किस-किस तरह से लड़ा है मैंने ? क्या तुमने मुझे छोड़ा ? या मैंने तुम्हें ?" नेहा तो बस सुने जा रही थी।

"और फिर छोटी सी बात के लिए हमेशा के लिए रिश्ता कैसे तोड़ दूं मम्मा ? हम दोनों एक-दूसरे को समझते हैं।पच्चीस बरस से तुम्हें देख रही हूं। तुम न कहो।तुम मजबूत बनने का स्वांग रचो। लेकिन तुम्हारी पीड़ा मैंने देखी है।तुम्हारी आंखों ने अनेकों बार पश्चाताप की चुगली की है।कैसे भूल पाऊंगी वे आंखें ?" 

पोनी न जाने और क्या से क्या कहे जा रही थी। उसको कुछ सुनाई नहीं दे रहा था। आंखों से अविरल अश्रु बह निकले।"पोनी बड़ी हो गई है। और क्या चाहिए भला ?"


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