Saroj Prajapati

Inspirational


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Saroj Prajapati

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अटूट बंधन

अटूट बंधन

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आज जैसे ही आरती की जॉब का लेटर आया, सारा परिवार खुशी के मारे झूम उठा। आरती की तो खुशी का ठिकाना ही ना था। इतने सालों से वह इसकी तैयारी कर रही थी और आज उसका सपना साकार हुआ था। सब खुश थे, लेकिन माता-पिता को थोड़ी चिंता थी क्योंकि आरती की नौकरी दूसरे शहर में लगी थी।

रिश्तेदारों को जब पता चला तो सभी कहने लगे, जवान लड़की को अकेले दूसरे शहर नौकरी पर भेजना सही नहीं। आरती के भाई भाभी जो अलग रहते थे, वह भी उसको बाहर भेजने के खिलाफ थे।

सुभाष जी के दो ही बच्चे थे। बड़ा बेटा नीरज व छोटी आरती। सुभाष जी ने दोनों को समान परवरिश दी थी। दोनों ही बच्चे पढ़ाई में बहुत होशियार थे। नीरज की इंजीनियरिंग करते ही नौकरी लग गई और उसने अपने साथ जॉब करने वाली सुविधा से शादी कर ली और कुछ दिनों बाद ही दोनों ने अपनी अलग गृहस्थी बसा ली। साथ ही साथ उसने अपने माता-पिता से भी दूरी बना ली थी।

सुभाष जी को इसका बड़ा अफसोस था। एक ही बेटा और वह भी अलग रहने लगा। उन्होंने नीरज को साथ रहने के लिए बहुत मनाया लेकिन दोनों ही पति पत्नी को माता-पिता से ज्यादा अपनी आज़ादी प्यारी थी।

आरती को भी अपने भाई के इस व्यवहार से बहुत दुख हुआ। सुभाष जी की तो जैसे कमर ही टूट गई थी। आरती और उस की मां उन्हें बहुत समझाते। आरती ने मन ही मन सोच लिया था कि वह पढ़कर अपने पापा का सहारा बनेगी और आज भगवान ने उसे यह अवसर दिया था।

अपने पापा को लोगों की बातों से चिंतित देख वह बोली " पापा क्या आपको मुझ पर भरोसा नहीं! जो लोग इतनी बातें बना रहे हैं, कल जरूरत पड़ने पर हमारे काम आएँगे और भैया भाभी ने तो हमारी कभी चिंता कि नहीं। फिर आज उन्हें इतनी फ़िक्र क्यों! पापा आप जो कहोगे, मैं वही करूंगी!"

उसकी बात सुन सुभाष जी बोले "बेटा मुझे तुझ पर पूरा भरोसा है। मुझे बस चिंता यही है कि तू अकेली दूसरे शहर में कैसे रहेगी। कैसे अपनी देखभाल करेगी!"

"पापा आप चिंता मत करो। मैं पहली लड़की थोड़ी ना हूं, जो अकेली दूसरे शहर में नौकरी करने जा रही है। आप भरोसा रखो। मैं सब मैनेज कर लूंगी!"

अपनी बेटी की बात सुन सुभाष जी आश्वस्त हो गये।

वह उसकी जॉइनिंग के लिए उसके साथ गए। आरती के ऑफिस का कैंपस बहुत बड़ा था और उसी में रेजिडेंशियल एरिया भी था। देखकर आरती के पापा को थोड़ी तसल्ली हुई।

आरती का ऑफिस में आज पहला दिन था। अंदर से वह कुछ डरी हुई थी। ज्वाइन करने के बाद ऑफिस के वरिष्ठ कर्मी ने सबसे उसका परिचय कराया और उसे उसकी टेबल तक पहुंचाया। उसकी टेबल के साथ ही अमन की भी टेबल थी। उन्होंने उसे आरती को सारा काम समझाने के लिए कह दिया। अमन एक हंसमुख व बातूनी लड़का था। अमन ने हल्के-फुल्के अंदाज़ में उसे सारा काम समझा दिया। दिन भर अमन के साथ काम व बात करते हुए आरती को ऐसा लगा ही नहीं कि आज ऑफिस में उसका पहला दिन था।

घर पहुंच कर फ्रेश होने के बाद वह अपने पापा के साथ दिन भर की बातें कर ही रही थी कि अमन अपनी पत्नी व मां के साथ उसके घर पहुंचा। उसे देख कर खुश होते हुए आरती ने कहा "पापा यह अमन जी है जिनके बारे में, मैं बता रही थी।"

उनसे मिलकर अमन के पापा खुश होते हुए बोले "आरती आपकी बहुत तारीफ कर रही थी।"

अमन की मम्मी ने उनसे कहा "भाई साहब आरती यहां अकेली नहीं है। हम सब हैं इसके साथ। आप इसकी चिंता ना करें और इसकी ओर से बेफिक्र रहें।"

सबसे मिलकर आरती के पापा का दिल बहुत हल्का हो गया।

रक्षाबंधन पर आरती दो दिन पहले ही अपने घर चली गई।

रक्षाबंधन के बाद, जब वह वापस ऑफिस आई तो उसे अमन कुछ नाराज़ लगा। पूछने पर पहले तो वह कुछ नहीं बोला। आरती के ज्यादा जोर देने पर उसने अपनी सूनी कलाई आगे कर दी। यह देख आरती बोली "अरे अमन भैया रक्षाबंधन पर, आपकी कलाई सूनी कैसे!"

"तुम्हारे कारण!"

" मतलब!"

"तुम्हें पता है ना! मेरी कोई बहन नहीं है और मैं तुम्हें बहन मानता हूं। इतने दिनों से मैं रक्षाबंधन का इंतजार कर रहा था और तुम हो कि बिना बताए चली गई तो मैं किससे राखी बंधवाता?"

यह सुन आरती के आँसू निकल गए।

एक यह है। जिससे खून का रिश्ता नहीं, फिर भी उसकी इतनी फिक्र करता है और एक अपना सगा भाई , जो राखी वाले दिन उसका इंतजार किए बगैर सुबह ही अपनी पत्नी के साथ उसके मायके चला गया और अगले दिन तक भी ना आया था। उसी के लिए तो आरती छुट्टी लेकर गई थी और वही!!!!!

कितना रोई थी वह! मम्मी पापा भी तो नीरज की इस बात से कितना दुखी हुए थे। शाम को आरती की ट्रेन थी और वह उस बिन बंधी राखी को लेकर वापस आ गई। उसने भावुक होते हुए अमन से माफ़ी मांगी। शाम को वह उसी राखी व मिठाई के साथ अमन के घर पहुंची और अमन की कलाई पर राखी बांधी। हां, वही तो इसका असली हक़दार था।

पूरे परिवार ने उसका बेटी व बहन की तरह सम्मान किया। ऑफिस की पहली मुलाकात से जुड़ा यह रिश्ता भाई बहन के अटूट बंधन में बंध गया।

5 साल बाद आरती की शादी तय हुई। आरती की शादी में अमन ने भाई के सारे फर्ज़ निभाए और आज भी दोनों इस अटूट रिश्ते को दिल से निभा रहे हैं।

दोस्तों यह कहानी एक सच्ची घटना पर आधारित है। जहां खून के रिश्ते दगा दे जाते हैं वहां ऐसे ही दिलों के रिश्ते काम आते हैं।



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